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Aacharya Shree Himachalsuriji Marasaheb

 

मेवाड़ के राजा आचार्य श्री हिमाचलसूरीश्वर्जी गुरुदेव का गौरवशाली जीवन ज्योत

अनंत उपकारी प.पू. प्रात: स्मरणीय व्याख्यान वाचस्पति ज्योतिषचार्य अंजनशलाका प्रतिष्ठाचार्य जगतगुरु हीरसुरिश्वर्जी म.सा. के १७वे पट्टधर परम वंदननीय बालभ्रह्मचारी आचार्य भगवंत १००८ श्रीमद् विजय हिमाचलसुरिश्वर्जी म.सा. का जन्म राजस्थान प्रांत के मेवाड़ अंचल के वोराट क्षेत्र में अरावली पर्वत की गोद में स्तिथ वीर प्रसुता धन्यधरा केलवाड़ा नगर में सं. १९६४ में हुआ|

माता का नाम पन्नाबाई और पिता का नाम गुलाबचंदजी था| आप जन्म से होनहार और तीक्षण बुद्धिवाले थे| इसी भूमि पर हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराणा प्रताप ने जन्म लिया था| माता द्वारा बचपन से ही धार्मिक संस्कारों की शिक्षा के कारण आप बाल्यकाल में ही आपकी माताजी ने गाँवगुडा में बिराजित गौतमगुरु के पास शिक्षा के लिए सौप दिया| गौतम गुरुने बालाक को होनहार जानकर और अपनी उम्र को ध्यान में रखकर पू. गुरुदेवश्री को घाणेराव में बिराजमान प.पू. पंन्यासजी श्री हीतविजयजी म.सा. को सौप दिया| पूज्य गुरुदेवश्री ने आपकी तीक्षणबुद्धि को जाना और उन्होंने मात्र १६ वर्ष की अल्प आयुं में ही घाणेराव श्री संघ उपस्थिति में दीक्षा दे दी और उन्होंने इनकी दीक्षा के पश्चात् आप का नाम हीरालाल से हिम्मतविजय हुआ|इनकी विद्धता को परखकर अल्प समय में ही घाणेराव श्री संघ ने आपको पंन्यास पद से अलंकृत किया| इसके बाद कुछ ही समय में आपकी ओजस्वीवाणी एवं व्याख्यान की शैली चारों दिशाओं में गूंजने लगी| सूरी पद की पूर्ण आराधना करने के बाद आ[को संवत् २००१ में घाणेराव नगर में श्री संघ की अनुमति से गुरु भ्राता श्री कमलविजयजी म.सा. द्वारा आचार्य पद से विभूषित किया|

फिर आपने श्री नाकोड़ाजी तीर्थ की तरफ विहार किया और श्री नाकोड़ा तीर्थ की जीर्ण दशा व आशातना देख आपका मन दुखी हुआ और आपके मन में इस तीर्थ का उद्धार करने की जिज्ञासा जागी जो आज हमारे सामने है| आपने अपने संयम जीवन में कुल २३२ से भी अधीक अंजनशलाका प्रतिष्ठाएं करवाई और अनेक स्थानों में प्रेरणा देकर उपाश्रय-मंदिर-ज्ञान मंदिर पाठशाला का निर्माण कराया और आपकी प्रेरणा से ही घानेराव नगर में कीर्तिस्तंभ तीर्थ की स्थापना हुई व बाद में चारभुजा चौराया पर हिमाचल नगर का निर्माण हुआ| इस प्रकार आपका जीवन सैदेव अन्यों के लिए प्रेरणादायक बना रहेगा|

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