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About Parshvanath Bhagwan

Life of Parshvanath Bhagwan


Life of Parshvanath Bhagwan - Parshvanath Bhagwan

“श्री पार्श्वनाथ भगवान”

केवलज्ञान

पार्श्वनाथ प्रभु को दीक्षा लिए ८४ दिन व्यतीत हो चुके थे| परमात्मा पृथ्वीकाल को पावन करते हुए आश्रम पद उधान में पधारे| वहां धाव वृक्ष के नीचे अपनी आत्म-साधना में मग्न बने हुए थे| उस समय पार्श्वप्रभु शुक्ल ध्यान में आरूढ़ हुए…उस शुक्ल ध्यान के द्वारा उन्होंने घाति कर्म के बंधनों को तोड़ डाला और उसी समय उन्हें केवलज्ञान पैदा हो गया|


तीर्थ स्थापना

केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद इंद्रा व देवताओं ने आकर समवसरण की रचना की|प्रभुने धर्मदेशना दी| जिससे प्रतिबोध पाकर अनेकों ने भागवती दीक्षा अंगीकार की| प्रभुने चतुर्विध संघ की स्थापना की|

परमात्मा ने अनेक आत्माओं को धर्म का उपदेश देकर अनेकों का उधार किया| प्रभु के माता पिता ने भी दीक्षा ली|


निर्वाण कल्याणक

७० वर्ष तक पृथ्वीकाल पर विचरण कर पार्श्वनाथ प्रभु सम्मेतशिखर पर्वत पर पधारे| वहां ३३ मुनियों के साथ एक मॉस का अनशन व्रत स्वीकार किया तत्पश्चात श्रावण सूद अष्टमी के शुभदिन विशाखा नक्षत्र के साथ चन्द्र का योग होने पर मोक्ष में गए|


प्रभु प्रतिमा पर सर्प क्यों?

पार्शवनाथ प्रभु जब छद्मस्थ अवस्था में थे, तब मेग्माली ने उनके ऊपर भयंकर उपसर्ग किया था| उस समय धर्नेंद्र ने आकर प्रभु पर आये उस उपसर्ग का निवारण किया था|

मेघमाली ने भयंकर वृष्टि कर प्रभु की नासिका तक पानी ला दिया था|उस उपसर्ग निवारण हेतु धरनेंद्र ने फणों से युक्त सांप का रूप किया था|

धरनेंद्र की अनन्य भक्ति की स्मृति में ही पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा पर ७ फणों देखने को मिलती है| कहीं कहीं ५,९,२७,१०८ और १००८ फनें भी दिखाई देती है|


विशेष जानकारी

नाम: पार्श्वकुमार                        प्रथम पारणा : कोपटक

माता : वामादेवी                          दीक्षा-शिबिका : विशाला

पिता : अश्वसेन राजा                   केवलज्ञान : फागन वदी ४

वर्ण : नील                                    केवलज्ञान तप : तीन उपवास

लांछन : सर्प                                  केवलज्ञान भूमि : वाराणसी

गर्भकाल : नौ मास, छ दिन            निर्वाण तप : ३० उपवास

च्यवन कल्याणक : फागन वदी ४    निर्वाण कल्याणक : श्रावण सूद ८

जन्म कल्याणक : मगसर वदी १०   निर्वाण भूमि : सम्मेतशिखर

जन्म राशी : तुला                           यक्ष : पार्श्व

दीक्षा कल्याणक – मगसर वदी ११    यक्षिणी : पद्मावती

दीक्षा-तप : तीन उपवास

दीक्षा-भूमि : वाराणसी

दीक्षा-वृक्ष : अशोक

सह-दीक्षित : ३००


पार्श्वनाथ प्रभु का परिवार

आर्यदिन्न आदि : १६००० साधु

पुष्प चुला आदि : ३८००० साध्वियां

सुव्रत आदि : १,६४,००० श्रावक

सुनंदा आदि : ३,२६,००० श्राविकाएं

                    १००० केवल ग्यानी मुनि

                    ११०० वैक्रिय लब्धिधारी मुनि

                    १४०० अव्धिज्ञानी मुनि

                    २,००१ केवलज्ञानी साध्वियां

                    १००० मुक्तिगामी साधु

                    २,००० मुक्तिगामी साध्वियां

                     ६०० ऋजुमती साध्वियां

                    ७५० विपुलमती मन:पर्यवज्ञानी

                     १२०० अनुत्तर विमानगामी मुनि

 

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