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Beda

 

बेड़ा

 

                          आर्य भूमि भारतवर्ष के राजस्थान प्रांत के दक्षिण में विश्व प्रसिद्ध देलवाडा तीर्थ से उत्तर की ओर अरावली पर्वतमालाओ की तराई में पाली जिले की बाली तहसील में जवाई बांध के निकट जवाई नदी के सुरम्य तट पर, पश्चिम रेलवे के मारी बेडा स्टेशन से करीब ४ किलोमीटर की दुरी पर बसा हुआ है| राजपूत काल का इतिहास देखे तो बड़ा नगर का इतिहास सैकड़ो वर्ष पुराना है और महाराणा सांगा तक इसके तार जुड़े हुए है| उदयपुर राजघराने के साक्ष्य के अनुसार महाराणा प्रताप के छट्ठे पुत्र श्री शेखासिंह को बेड़ा और नाना की जागीर दी गयी थी |

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मंदिर का दृश्य |

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श्री दादा पार्श्वनाथ भगवान

जैन व् हिन्दू ओनो मतावालियों के लिए बेडा का विशेष महत्त्व है| बेडा से पूर्व की ओर करीब चार किलोमीटर की दूरी पर अतिप्राचीन और चमत्कारिक श्री दादा पार्श्वनाथ का भव्य मंदिर बना हुआ है| इस तीर्थ की महिमा कई पुराने शिलालेख में मिलती है वाही पुराणिक गीतों में भी इसका उल्लेख मिलता है |ध्यान साधना के लिए यह तीर्थ बहुत ही उपयुक्त है और यहाँ का वातावरण भी रमणीय है|हिन्दुओ का प्राचीन भगवान श्री राम मंदिर बेडा में आया हुआ है जिसका गुणगान कीवदंतियो में बेडा रामजी बावशी के नाम से होता है, सारे राजस्थान से अन्यधर्मावलंबी यहाँ दर्शनार्थ आते रहते है|

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मंदिर का दृश्य |

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श्री सम्भवनाथ भगवान

प्राचीन दादा पार्श्वनाथ तीर्थ, जुना बेडा सड़क मार्ग से जुड़ा है और देलवाडा से बामनवाडा नाना हथुंदी राता महावीर-राणकपुर आदि तीर्थो की यात्रा इसी मार्ग से होकर की जाती है| यहाँ पर धर्मशाला व उपाश्रय भवन बने हुए है जिनका उपयोग समय-समय पर धार्मिक व साधर्मिक कार्यो के लिए होता रहता है| अट्ठम, ओली व् उपधान तप आदि धार्मिक कार्यो के लिए यह स्थान अधीक उपयोगी है| संघ आदि के आगमन पर यहाँ श्री संभवनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ बेड़ा की ओर से समूचित व्यवस्था की जाती है|

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श्री विमलनाथ भगवान

बेडा नगर का मुख्य आकर्षण श्री संभव चौक है जहा पर श्री संभवनाथ भगवान का बावन जिनालय युक्त प्राचीन और विशाल मंदिर बना हुआ है, मंदिर में प्रवेश करते ही श्री संभव जिनेश्वर के दर्शन करने पर मन प्रफुल्लित हो उठता है| मान्यतानुसार श्री संभवनाथजी मंदिर, श्री दादा पार्श्वनाथजी मंदिर और प्रभुश्रीजी रामचंद्रजी मंदिर की प्रतिष्ठा एक ही दिन एक ही समय अकबर बादशाह प्रबोधक जगत गुरु आचार्य श्री हीरसूरीश्वर्जी महाराज साहब द्वारा कराई गयी थी| मंदिर के पास ही पंजाब केसरी आचार्य श्री विजयवल्लभसूरीश्वर्जी महाराज का गुरु मंदिर आया हुआ है| पास ही में दो उपाश्रय, व्याख्यान हाल व पोरवाल न्याती नौरा आये हुए है एवं अतिथि गृह भी पास ही है| दूसरी तरफ भी एक अतिथि गृह व श्री संभवनाथ जैन पेढ़ी आई हुई है| संभव चौक से कुछ दुरी पर विमलनाथ भगवान का मंदिर है| मंदिर के तल मजले पर श्री अमिधरा श्रुत ज्ञान मंदिर है जहा विशाल ज्ञान भंडार के साथ जैन धर्म के अप्राय ग्रन्थ, हस्तप्रत व् पुस्तके है| श्री बेडा नगर के मुख्य बाजार में आत्मानंद जैन सभा लाइब्ररी, आयामबिल भवन व् उपाश्रय आये हुए है| बाजार मही कबुतर चौतरा भवन अरिहंत समय में भी आराधना भवन व धर्मशाला है|

संभवचौक के पास ही विशाल रावला (ठिकाना) आया हुआ है यहाँ के भूतपूर्व ठाकुर स्व. श्री पृथ्वीसिंहजी विश्व प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी थे| इस घराने का संबध जोधपुर राजघराने से रहा है| ठिकाने के अंदर प्रवेश मार्ग पर ही प्रसिद्ध रामचंद्रजी का मंदिर आया हुआ है|जिसका उल्लेख ऊपर किया है|

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मंदिर का दृश्य |

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श्री वल्लभ गुरु भगवंत

प्रारम्भ से ही बेडा का जैन संघ धार्मिक वृति के साथ साथ उदार व् परमार्थ वृति का रहा है| धार्मिक भावनाओं से ओत प्रोत यहाँ करीब २० मुमुक्षुओं ने आत्मकल्याणनार्थ भगवती दीक्षा व् अंगीकार कर अपने मानव जीवन को धन्य बनाया और श्री बेडा नगर का नाम उज्जवल किया है| जैन समाज के द्वारा अनेक मुनिभगवंतो के चातुर्मास कराये गए है वाही उनकी निश्रा में संघ, उपधान तप, ओली,अट्टम, अभिषेक और उजमने आदि अनेक अनुष्ठान न सिर्फ बेडा नगर में अपितु पालीताणा नाकोडा, ब्रह्माणवाडा, दादा पार्श्वनाथ आदि अनेक तीर्थ स्थानों पर भी करवाकर अपनी लक्ष्मी का सदुपयोग किया है, जिनमे बेडा में स्कूल भवन, विकास समिति के २९ गाँवों के लिए प्रमुख अस्पताल भवन, गाँव में प्याऊ, अम्बेमाता भवन आदि प्रमुख है| यहाँ पर एक बड़ी गौशाला का निर्माण भी हुआ |

 

अन्य धर्मंवलाम्भियो के भी कई महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल है जिनमे, मुख्य बाजार में शिल्प कला के उत्कुष्ट नमूने के रूप में सफ़ेद संगमरमर पत्थर से बना संतोषी माता का मंदिर है| उसके साथ ही श्री गणेशजी, महालक्ष्मीमाता, महादेवजी, तलकेश्वर महादेव और अम्बेमाता के भी सुंदर मंदिर बने हुए है| उनके साथ ही कई धर्मशालाए भी बनी हुई है| मुख्य बाजार की पूर्व की ओर समाप्ति स्थल सूरज पोल के बहार पुराने जल स्तोत्र के रूप में तालाब, बावड़ी और पेंजगा बने हुए है| पास ही में वीर पृथ्वीराज चौक में बेडा नगर के ठाकुरों की स्मृति में छतरिया बनी हुयी है| कभी यह स्थान अत्याधिक चहल पहल का और सांस्कृतिक दृष्टी से महत्त्वपूर्ण था| इस चौक में वर्षो पहले गणगौर का मेला और घुड दौड़ का उत्सव होते थे| बेडा नगर का मुख्य बस स्टैंड भी पहले यही था| यहाँ से होकर ही जुना-बेडा तक सड़क जाती है|

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