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Bhamashah Kavadia

∗दानवीर श्री भामाशाह कवाडिया

भामाशाह का जन्म राजस्थान के मेवाड़ राज्य में 29 अप्रैल, 1547 को हुआ था| इनके पिता का नाम भारमल था, जिन्हें राणा साँगा ने रणथम्भौर के क़िले का क़िलेदार नियुक्त किया था| कालान्तर में राणा उदय सिंह के प्रधानमन्त्री भी रहे| भामाशाह बाल्यकाल से ही मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार रहे थे| भामाशाह दानवीर के साथ काबिल सलाहकार, योद्धा, शासक व प्रशासक भी थे| महाराणा प्रताप हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून, 1576 ई.) हार चुके थे, लेकिन इसके बाद भी मुग़लों पर उनके आक्रमण जारी थे| धीरे-धीरे मेवाड़ का कुछ इलाका महाराणा प्रताप के कब्जे में आने लगा था| किन्तु बिना बड़ी सेना के शक्तिशाली मुग़ल सेना के विरुद्ध युद्ध जारी रखना कठिन था. सेना का गठन धन के बिना सम्भव नहीं था| राणा ने सोचा जितना संघर्ष हो चुका, वह ठीक ही रहा. यदि इसी प्रकार कुछ और दिन चला, तब संभव है जीते हुए इलाकों पर फिर से मुग़ल कब्जा कर लें| इसलिए उन्होंने यहाँ की कमान अपने विश्वस्त सरदारों के हाथों सौंप कर सन 1578 ईस्वी में गुजरात की ओर कूच करने का विचार किया| प्रताप अपने कुछ चुनिंदा साथियों को लेकर मेवाड़ से प्रस्थान करने ही वाले थे कि वहाँ पर उनके पुराने साथी व नगर सेठ भामाशाह उपस्थित हुआ|

भामाशाह Bhamashah in Hindi (3)

भामाशाह ने अपने साथ परथा भील लाये थे. उसके बारे में महाराणा को बताया कि, “परथा ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर पूर्वजों के गुप्त ख़ज़ाने की रक्षा की और आज उसे लेकर वह स्वयं सामने उपस्थित हुआ है. मेरे पास जो धन है, वह भी पूर्वजों की पूँजी है. मेवाड़ स्वतंत्र रहेगा तो धन फिर कमा लूँगा. आप यह सारा धन ग्रहण कीजिए और मेवाड़ की रक्षा कीजिए.” भामाशाह और परथा भील की समर्पण, ईमानदारी और देशभक्ति देखकर महाराणा प्रताप का मन द्रवित हो गया. उन्होंने दोनों को गले लगा लिया. महाराणा ने कहा “आप जैसे सपूतों के बल पर ही मेवाड़ जिंदा है. मेवाड़ की धरती और मेवाड़ के महाराणा सदा-सदा इस उपकार को याद रखेंगे. मुझे आप दोनों पर गर्व है.” “भामा जुग-जुग सिमरसी, आज कर्यो उपगार। परथा, पुंजा, पीथला, उयो परताप इक चार।।” – महाराणा प्रताप – अर्थात “हे भामाशाह! आपने आज जो उपकार किया है, उसे युगों-युगों तक याद रखा जाएगा. यह परथा, पुंजा, पीथल और मैं प्रताप चार शरीर होकर भी एक हैं. हमारा संकल्प भी एक है.” भामाशाह ने मेवाड़ के अस्मिता की रक्षा के लिए दिल्ली गद्दी के प्रलोभन भी ठुकरा दिया था. उन्होंने अपनी निजी सम्पत्ति में इतना धन 20,000 सोने के सिक्के व 25,00,000 रुपये दान दिया था कि जिससे 25,00,0 सैनिकों का बारह वर्ष तक निर्वाह हो सकता था. इसी धन की बदौलत 1578 से 1590 तक वे गुप्त रूप से छापामार युद्ध तथा कई बार प्रगट युद्ध करते हुए विजय की ओर बढते रहे. सन 1591 से 1596 तक का समय मेवाड़ और महाराणा के लिए चरम उत्कर्ष का समय कहा जा सकता है|

महाराणा प्रताप सिंह ने भामाशाह को प्रधानमंत्री पदोन्नत किया था| हल्दी घाटी के युद्ध के बाद भामाशाह के भाई ताराचंद कवाडिया जिन्होंने भामाशाह के साथ कंधे से कंधा मिलकर लडे थे, उनको गोडवाड का राज्यपाल सौप दिया| ताराचंद ने अपने मृत्यु के समय तक गोडवाड की रक्षा की|ताराचंद के काम को देखकर लोगों ने उन्हें “ठाकुर” के नाम से संबोधित किया|“सादडी” ग़ाव ताराचंद ने खोजा था , जहाँ उन्होंने कई इमारते का निर्माण किया| “सादडी” को मेवर और मारवाड़ के बीच का द्वार कहा जाता है|ताराचंद लोकगच्छ संप्रदाय एक महान सरक्षंक थे| उन्होंने श्री केसरिया जैन तीर्थ का नवीकरण किया था| इसके 1 वर्ष बाद महाराणा प्रताप निधन हो गया था| तथा 2 वर्ष बाद 52 वर्ष की आयु में भामाशाह का देहांत हो गया था| भामाशाह की दानशीलता के चर्चे उस दौर में आस-पास बड़े उत्साह, प्रेरणा के संग सुने-सुनाए जाते थे. इनके लिए पंक्तियां कही गई है-

वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला।

उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला।।

बेमिसाल दानवीर! आत्मसम्मान और त्याग की यही भावना भामाशाह को स्वदेश, धर्म और संस्कृति की रक्षा करने वाले देश-भक्त के रुप में शिखर पर स्थापित कर देती है. भामाशाह अपनी दानवीरता के कारण इतिहास में अमर हो गए. भामाशाह के सम्मान में भारत सरकार ने सन 2000 में तीन रुपये डाक टिकट जारी किया. उनके नाम पर कई सरकारी योजनाओं, संस्थानों व स्थानों का नामकरण भी किया गया है.

भामाशाह Bhamashah in Hindi

मित्रों, भामाशाह का नाम महाराणा प्रताप के साथ वैसे ही इतिहास में दर्ज हो चुका है, जैसे राम के साथ हनुमान का. राम के मंदिर में हनुमान की मूर्ती जरूर लगती है, परन्तु हनुमान का मंदिर बिना राम की मूर्ती के पूर्ण माना जाता है. आज राजस्थान ही नहीं बल्कि देश और दुनिया में भामाशाह, दानदाता का पर्यायवाची बन चुका है. युगों – युग तक धन अर्पित करने वाले दानदाता को दानवीर भामाशाह कहकर उसका स्मरण-वंदन किया जाता रहेगा|

भामाशाह Bhamashah in Hindi (4)

उदयपुर में स्तिथ भामाशाह का पुतला

 

Rani Abbakka Chowta

अब्बक्का रानी : एक जैन वीरांगना जिन्होंने पोर्तुगीजों को पराभूत किया !

“रानी ऑफ़ उल्लाल से संबोधित किया जाता था”

१. परिचय

अब्बक्का रानी अथवा अब्बक्का महादेवी तुलुनाडूकी रानी थीं जिन्होंने सोलहवीं शताब्दीके उत्तरार्धमें पोर्तुगीजोंके साथ युद्ध किया । वह चौटा राजवंशसे थीं जो मंदिरों का शहर मूडबिद्रीसे शासन करते थे । बंदरगाह शहर उल्लाल उनकी सहायक राजधानी थी ।

२. बचपन

चौटा राजवंश मातृसत्ताकी पद्धतिसे चलनेवाला था, अत: अब्बक्काके मामा, तिरुमला रायने उन्हें उल्लालकी रानी बनाया । उन्होंनेने मैंगलोरके निकटके प्रभावी राजा लक्ष्मप्पा अरसाके साथ अब्बक्काका विवाह पक्का किया । बादमें यह संबंध पोर्तुगीजों हेतु चिंताका विषय बननेवाला था । तिरुमला रायने अब्बक्काको युद्धके अलग-अलग दांवपेचोंसे अवगत कराया । किंतु यह विवाह अधिक समयतक नहीं चला और अब्बक्का उल्लाल वापिस आ गर्इं । उनके पतिने अब्बक्कासे प्रतिशोध लेनेकी इच्छासे बादमें अब्बक्काके विरुद्ध पोर्तुगीजोंके साथ हाथ मिलाया ।

३. बहादुरी

पोर्तुगीजोंने उल्लाल जीतनेके कई प्रयास किए, क्योंकि रणनीतिकी दृष्टिसे वह बहुत महत्वपूर्ण था । किंतु लगभग चार दशकों तक अब्बक्काने उन्हें हर समय खदेडकर भगा दिया । अपनी बहादुरीके कारण वह ‘अभया रानी’ के नामसे विख्यात हो गर्इं । औपनिवेशक शक्तियोंके विरुद्ध लडनेवाले बहुत अल्प भारतीयोंमेंसे वह एक थीं तथा वह प्रथम भारतीय स्वतंत्रता सेनानी मानी जाती थीं ।

रानी अब्बक्का भले ही एक छोटे राज्य उल्लाकी रानी थीं, वह एक अदम्य साहस एवं देशभक्तिवाली महिला थीं । झांसीकी रानी साहसका प्रतीक बन गई हैं, उनके ३०० वर्ष पूर्व हुई अब्बक्काको इतिहास भूल गया है ।

पोर्तुगीजोंके साथ उनकी साहसपूर्ण लडाईयोंका ब्यौरा ठीकसे नहीं रखा गया । किंतु जो भी उपलब्ध है, उससे इस उत्तुंग, साहसी एवं तेजस्वी व्यक्तित्वका पता चलता है ।

४. व्यक्तिगत जीवन

स्थानीय किंवदंतियोंके अनुसार अब्बक्का एक बहुत ही होनहार बच्ची थीं, तथा जैस-जैसे वह बडी होती गर्इं, एक द्रष्टा होनेके सारे लक्षण उनमें दिखाई देने लगे; धनुर्विद्या तथा तलवारबाजीमें उनका मुकाबला करनेवाला कोई नहीं था । इस हेतु उनके पिताजीने उन्हें उत्तेजना दी, परिणामस्वरूप वह हर क्षेत्रमें प्रवीण हो गर्इं । उनका विवाह पडोसके बांघेरके राजाके साथ हुआ । किंतु यह विवाह अधिक चला नहीं, तथा अब्बक्का पतिद्वारा दिए हीरे-जवाहरात लौटाकर घर आ गर्इं । अब्बक्काके पतिने उनसे प्रतिशोध लेने हेतु तथा उनसे युद्ध करने हेतु एक संधिमें पोर्तुगीजोंसे हाथ मिलाया ।

उल्लालका स्थान अब्बक्काके राज्यकी राजधानी उल्लाल किला अरब सागरके किनारे मंगलोर शहरसे मुछ ही मीलोंकी दूरीपर था । वह एक ऐतिहासिक स्थान तथा एक तीर्थस्थल भी था, क्योंकि रानीने वहां शिवका सुंदर मंदिर निर्माण किया । वहां एक नैसर्गिक अद्वितीय शिला भी थी, जो ‘रुद्र शिला’ के नामसे जानी जाती थी । उसपर पानीकी बौछार होते ही हर पल उस शिलाका रंग बदलता रहता था ।

५. ऐतिहासिक पार्श्वभूमि

गोवाको कुचलकर उसे नियंत्रणमें लेनेके पश्चात पोर्तुगीजोंकी आंख दक्षिणकी ओर तथा सागरके किनारेपर पडी । उन्होंने सबसे पहले १५२५ में दक्षिण कनाराके किनारेपर आक्रमण किया तथा मंगलोर बंदरगाह नष्ट किया । उल्लाल एक समृद्ध बंदरगाह था तथा अरब एवं पश्चिमके देशोंके लिए मसालेके व्यापारका केंद्र था । लाभप्रद व्यापारकेंद्र होनेके कारण पोर्तुगीज, डच तथा ब्रिटिश उस क्षेत्रपर एवं व्यापारी मार्गोंपर नियंत्रण पाने हेतु एक दूसरेसे टकराते रहते थे । किंतु वे उस क्षेत्रमें अधिक अंदरतक घुस नहीं पाए, क्योंकि स्थानीय सरदारोंद्वारा होनेवाला प्रतिरोध बडा दृढ (मजबूत) था । स्थानीय शासकोंने जाति एवं धर्मसे ऊपर उठकर कई जाली गठबंधन बनाए ।

अब्बक्का भले ही जैनी थीं, उनके शासनमें हिंदू एवं मुसलमानोंका अच्छा प्रतिनिधित्व था । उनकी सेनामें सभी जाति एवं संप्रदायके लोग, यहांतक कि मूगावीरा मच्छीमार भीसम्मिलित थे । उन्होंने कालिकतके जामोरीन तथा दक्षिण तुलूनाडूके मुसलमान शासनकर्ताओंके साथ जाली गठबंधन बनाए । पडोसके बंगा राजवंशसे विवाहबंधनसे स्थानीय शासनकर्ताओंके गठबंधन और दृढ हो गए ।

Life Size statue of the Chowta Queen Abbakka in Ullal

६. पोर्तुगीजोंके साथ युद्ध

हालांकि अब्बक्का विश्वास से एक जैन थी, उनको हिंदुओं और मुसलमानों द्वारा अच्छी तरह प्रतिनिधित्व किया था। उनकी सेना भी सभी संप्रदायों और जातियों के लोग शामिल थे।

६ अ. प्रथम आक्रमण

पोर्तुगीजोंने १५२५ में दक्षिण कनारा तटपर पहला आक्रमण कर मंगलोर बंदरगाह नष्ट किया । इस घटनासे रानी सतर्क हो गर्इं तथा अपने राज्यकी सुरक्षाकी तैयारीमें जुट गर्इं ।

६ आ. द्वितीय आक्रमण

अब्बक्काकी रणनीतिसे पोर्तुगीज अस्वस्थ हो गए थे, तथा चाहते थे कि वह उनके सामने झुक जाएं, उनका सम्मान करें, किंतु अब्बक्काने झुकना अस्वीकार किया । १५५५ में पोर्तुगीजोंने एडमिरल डॉम अलवरो दा सिलवेरिया को रानीसे युद्ध करने भेजा क्योंकि उन्होंने उनका सम्मान करना अस्वीकार किया था । तदुपरांत हुए युद्धमें रानीने एक बार पुन: स्वयंको बचाया तथा आक्रमणकारियोंको सफलतापूर्वक खदेड दिया ।

६ इ. तृतीय आक्रमण

१५५७ में पोर्तुगीजोंने मंगलोरको लूट कर उसे बर्बाद कर दिया । १५५८ में पोर्तुगीजोंने मंगलोरके साथ प्रचंड क्रौर्य कर बडा पापकर्म किया, कई युवा एवं बूढे स्त्री-पुरुषोंकी हत्या की, एक मंदिरको लूटा, जहाज जलाए तथा अंतमें पूरे शहरमें आग लगा दी ।

६ र्इ. चतुर्थ आक्रमण

१५६७ में पोर्तुगीजोंने पुन: उल्लालपर आक्रमण किया, मृत्यु एवं विनाश की वर्षा की । महान अब्बक्काने इसका भी प्रतिकार किया ।

६ उ. पांचवां आक्रमण

१५६८ में पोर्तुगीज वाईसराय एंटोनियो नोरान्हाने जनरल जोआओ पिक्सोटो के साथ सैनिकोंका एक बेडा देकर उसे उल्लाल भेजा । उन्होंने उल्लालपर नियंत्रण किया तथा राजदरबारमें घुस गए । किंतु अब्बक्का रानी भाग गर्इं तथा एक मस्जिदमें आश्रय लिया । उसी रात उसने २०० सैनिकोंको इकट्ठा कर पोर्तुगीजोंपर आक्रमण किया । लडाईमें जनरल पिक्सोटो मारा गया तथा ७० पोर्तुगीज सैनिकोंको बंदी बनाया गया, कई सैनिक भाग गए । बादमें हुए आक्रमणोंमें रानी तथा उसके समर्थकोंने एडमिरल मस्कारेन्हसकी हत्या की और पोर्तुगीजोंको मंगलोर किला खाली करनेपर बाध्य किया ।

६ ऊ. छठां आक्रमण

१५६९ मे पोर्तुगीजोंने केवल मंगलोर वापिस लिया इतना ही नहीं अपितु कुंडपुर (बसरुर) पर विजय प्राप्त किया । यह सब पानेके पश्चात अब्बक्का रानी खतरेका स्रोत बनी हुई थीं । रानीके विभक्त पतिकी मददसे वे उल्लालपर आक्रमण करते रहे । घमासान युद्धके पश्चात अब्बक्का रानी अपने निर्णयपर अटल थीं । १५७० में उन्होेंने अहमदनगरके बीजापुर सुलतान तथा कालिकतके झामोरीनके साथ गठबंधन किया, जो पोर्तुगीजोंके विरुद्ध थे । झामोरीनका सरदार कुट्टी पोकर मार्कर अब्बक्काकी ओरसे लडा तथा पोर्तुगीजोंका मंगलोरका किला उध्वस्त किया किंतु वापिस आते समय पोर्तुगीजोंने उसे मार दिया । निरंतरकी हानि तथा पतिके विश्वासघातके कारण अब्बक्का हार गर्इं, वह पकडी गर्इं तथा उन्हें कारागृहमें रखा गया । किंतु कारागृहमें भी उन्होेंने विद्रोह किया तथा लडते-लडते ही अपने प्राण त्याग दिए ।

पारंपारिक कथनानुसार वह बहुत ही लोकप्रिय रानी थीं, जिसका पता इस बातसे चलता है कि वह आज भी लोगसाहित्यका एक हिस्सा हैं । रानीकी कहानी पीढी-दर-पीढी लोकसंगीत तथा यक्षगान (जो तुलुनाडूका लोकप्रिय थिएटर है)द्वारा पुन:पुन: दोहराई जाती है । भूटा कोला एक स्थानीय नृत्य प्रकार है, जिसमें अब्बक्का महादेवीके महान कारनामे दिखाए जाते थे । अब्बक्का सांवले रंगकी, दिखनेमें बडी सुंदर थीं; सदैव सामान्य व्यक्तिजैसे वस्त्र पहनती थीं । उन्हें अपनी प्रजाकी बडी चिंता थी तथा न्याय करने हेतु देर राततक व्यस्त रहती थीं । किंवदंतियोंके अनुसार ‘अग्निबाण’ का उपयोग करनेवाली वह अंतिम व्यक्ति थीं । कुछ जानकारीके अनुसार रानीकी दो बहादुर बेटियां थीं, जो पोर्तुगीजोंके विरुद्ध उनके साथ-साथ लडी थीं । परंपराओंके अनुसार तीनों-मां तथा दोनों बेटियां एक ही मानी जाती हैं ।

७. एक महान रानीकी याद

अब्बक्काको उनके अपने नगर उल्लालमें बहुुत याद किया जाता है । हर वर्ष उनकी स्मृतिमें ‘वीर रानी अब्बक्का उत्सव’ मनाया जाता है । ‘वीर रानी अब्बक्का प्रशस्ति’ पुरस्कार किसी अद्वितीय महिलाको दिया जाता है । १५ जनवरी २००३ को डाक विभागने एक विशेष कवर जारी किया । बाजपे हवाई अड्डेको तथा एक नौसैनिक पोतको रानीका नाम देने हेतु कई लोगोंकी मांग है । उल्लाल तथा बंगलुरूमें रानीकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है । ‘कर्नाटक इतिहास अकादमी’ने राज्यकी राजधानीके ‘क्वीन्स रोड’ को ‘रानी अब्बक्का देवी रोड’ नाम देनेकी मांग की है ।

Jain Sangeetkar Jitendra N. Kothari

Bhakti Sangeet Ratna &  Bhakti Sangeet Shiromani 

Shri. Jitendra N. Kothari

श्री जीतेन्द्र निहालचंदजी कोठारी का जन्म २५ जनवरी १९६७ को बीसलपुर(राजस्थान) में हुआ था | जब जितेंद्रजी ८ साल के थे तब उन्होंने उनकी स्कूल में किसी एक कार्यक्रम में बहुत ही प्रसिद्ध गीत वीरोसा इनने अवसरिये वेगा आवजो” गाके सबका दिल जीत लिया था|

फिर धीरे धीरे आपने अपनी संगीत में अपनी रूचि दिखाई और इसमें ही और बेहतर होते गए| आप १९८३ में मुंबई आये और एक प्रोफेशनल जैन संगीतकार बनने के प्रयास में थे||

२००२ में आपने अपने प्रोफेशनल संगीत करियर की शुरुआत की थी| आपने “जो जैसा करता है, वैसा फल पाता है” गीत गाया था जो लोगों में बहुत ही प्रसिद्ध हो गया था | फिर आपने कई प्रसिद्ध गाने गाए जिसकी कई लोगों ने काफी तारीफ़ की|

आपके इन्ही परिश्रम के कारण,  २००६ में आपको  “भक्ति संगीत रत्न” की उपाधि से सम्मानित किया और फिर २०११ में “भक्ति संगीत शिरोमणि” के नवाज़ा गया|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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सुराणा कुल की कुलदेवी माँ सुसवाणी की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न

सुराणा कुल की कुलदेवी माँ सुसवाणी की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न

बैंगलोर : बैंगलोर स्थित होसूर रोड पर माँ सुसवाणी के नवनिर्मित माताजी धाम में दिनांक १४ दिसंबर २०१६ को विधि-विधान से पांच देवी प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा वैदिक मंत्रोचार के साथ संपन्न हुई| सुराणा कुल की कुलदेवी माँ सुसवाणी सहित अंबामाता, सच्चियाय माता, पद्मावती माता लक्ष्मी माता की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित होते ही उपस्तिथ जनों ने बधाइयो का दौर शुरू हो गया| उपस्थित सभी जनों ने प्रसन्नतापूर्वक भक्तिमय वातावरण में माँ से अपना कुल, समाज राष्ट्र एवं समस्त भूमंडल की खुशहाली की कामना की| श्रीमती भंवरीबाई घेवरचंदजी सुराणा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं सुराणा संघ के तत्वाधान में मंदिर का निर्माण सुराणा परिवार द्वारा ही संपन्न कराया गया|

इसी क्रम में पांच दिवसीय इस भव्य दिव्य मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा प्रसंग के तहत १४ दिसंबर, बुधवार की प्रात: छह बजे पार्श्व सुशिल धाम में विराजित सुसवाणी धाम में मुहरत प्रदाता आचार्य श्री अशोकरत्नसूरीश्वर्जी व अमरसेनसूरीश्वर्जी म.सा. से आशीर्वाद लेकर दिलीप सुराणा व आनंद सुराणा ने सपत्नीक धार्मिक अनुष्ठान शुरू कराया| आचार्य पं. चन्द्रशेखर शर्मा व अन्य विधान पंडितों ने विभिन्न प्रतिमाओं की विधिवत पूजा कर स्थापना करवाई तथा लाभार्थी परिवार द्वारा मंदिर के शिखर पर कलश स्थापना व ध्वजारोहण किया गया| इस दौरान हेलीकाप्टर से पुष्प वर्षा अनूठा आकर्षण बन गई| प्रकाण्ड विधान एवं आचार्य पंडित चन्द्रशेखर शर्मा के सान्निध्य में २५ विप्रो में विभिन्न कार्यक्रमों में १०८ गणपति के व १०० चंडीपाठ तथा रुद्रापारायण संपन्न करवाए |

इसमें हवन में आहुतियाँ व नौ कुंवारी कन्याओं का पूजन, आरती व १०८ दीपों से माँ सुसवाणी माता की महाआरती शामिल थी| सुस्वाणी माता को छप्पन भोग भी अर्पण किया गया| तत्पश्चात माँ के दर्शनार्थ श्रधालुओ की लम्बी कतार लग गई जो करीब तीन घंटों तक सुचारू रूप से चलती रही| स्थानीय सुराणा संघ, सुराणा महासंघ, बालराई जैन संघ व अनेक संघो व संगोठनो द्वारा श्रीमती भंवरीबाई घेवरचंद दिलीप-आनंद सुराणा परिवार द्वारा मंदिर निर्माण व प्रतिष्ठा करवाने के अनुमोदनार्थ उनका अभिनंदन सम्मान किया गया|

उल्लेखनीय है की गुजरात प्रांत के वंशीपहाड़ के लाल पत्थर से निर्मित इस मंदिर में प्रतिष्ठापित पांचो देवियों की मनोरम प्रतिमाएं जयपुर से बनवाकर मंगवाई गई है| माँ सुसवाणी व माँ लक्ष्मी की पप्रतिमा स्थापना मंदिर निर्माणक शा भंवरीबाई घेवरचंदजी सुराणा के द्वय पुत्र दिलीप सुराणा व आनंद सुराणा परिवार द्वारा किया गया| जब की अम्बा माता की स्थापना शांतिलालजी, संजय, अजय सांड परिवार द्वारा, पद्मावती देवी की प्रतिमा पियूष जैन,प्रमोद जैन, दिलीप पुनमिया परिवार द्वाराद्वारा वैदिक मंत्रोश्रारण के साथ प्राण प्रतिष्ठापित की गई| सुसवाणी माँ के मूल धाम मोरखाणा व माउंट आबू स्थित माँ अंबा के धाम से वहा दोनों परिवारों द्वारा ज्योत भी लाइ गई, जो अखंड जलेगी |

समस्त धार्मिक अनुष्ठान की क्रियाओं की पूर्णहुती से पूर्व शाही करबा, ब्रह्मभोज व विशाल महाप्रसादी का आयोजन भी हुआ|

कार्यक्रम में शहर के अनेक गणमान्य व्यक्तियों सहित राजस्थान,हैदराबाद,चेन्नई,मुंबई,कोलकाता से भी श्रद्धालुओ बड़ी संख्या में शिरक्त करने पहुंचे थे| पार्श्व सुशिल धाम व सुसवाणी मंदिर के बीच लोगों के आवागमन से पुरे माहोल में उत्साह छाया रहा और ऐसा लगा रहा था मानो कोई धार्मिक मेला लगा हो| सुराणा संघ के चेयरमैन दिलीप सुराणा, अध्यक्ष सरदारमल सुराणा, उपाध्यक्ष अशोक सुराणा, विजयराज सुराणा, एसवी सुराणा, महामंत्री महिपाल सुराणा , कोषाध्यक्ष कन्हैयालाल सुराणा, सहमंत्री नरेन्द्र सुराणा, भीमराज सुराणा, प्रचार मंत्री उत्तमचंद सुराणा, संघटन मंत्री सुनील सुराणा पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र सुराणा आदि पदाधिकारियों सहित अनेक सदस्यों ने प्रतिष्ठा की विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग दिया| अगले दिन १५ दिसंबर की सुबह मौके प्रथम दर्शनार्थ धाम के भव्य द्वार का उद्घाटन किया गया था|

GTA 6 Wishlist :5 Things that Everyone Want From Grand Theft Auto 6

One of the well known open-world Rockstar’s Grand Theft Auto 6 or additionally broadly known as GTA 6, will be having its entire new form in the closest future. Created by Rockstar Games, the new GTA amusement Grand Theft Auto VI will be having a noteworthy update from the past variant. Aside from the undeniable new story line, fans are supposedly expecting two or three changes inside the up and coming amusement.

A Strong Female Protagonist:

Usually the GTA Characters are assaulted with a solid male hero and with absence of ladies’ depiction. The past renditions of GTA all make them thing in like manner – the male fundamental character. According to the official GTA 6 news  it is said that in regards to time that Rockstar would make a solid female prompt run the show. We had Franklin, Michael, Trevor, Niko and Carl Johnson, yet it is stunning to have Amanda or Paula to make some tumult in the diversion.

Virtual Reality:

Grand Theft Auto VI offers huge amounts of routes for players to take an interest in the storyline, but since of the restriction to the players claim gadgets, very few players can do as such. Rockstar has uncovered that it is presently conceivable to play the diversion essentially through a VR Support on a PlayStation, and this new component will be only astounding and will definitely make the GTA 6 fans go Crazy about the game.

New Location:

Fans are purportedly asking for a totally fresh out of the box new city to investigate, other than the returned to city, for example, San Andreas. GTA 6 has likewise gone similar to London and Alderney, however players are anticipating investigating different urban areas, for example, Chicago, Washington DC and even New Orleans.

Better Realistic Variations:

Rockstar is including more practical components into the up and coming GTA diversion, a request that has been hotly anticipated by fans to be listened. Grand Theft Auto VI will enable players to devastate more dividers and even explode structures utilizing a plane. The amusement will likewise observe places that were beforehand wrecked gets modified, with the presence of development specialists and other appropriate, sensible components.

Synchronous Console and PC Release:

Players are seeking after the PC variant of the following GTA diversion will be discharged in the meantime as its comfort discharge, without the long hold up like the past adaptations. Up until this point, there has been no sign that Rockstar would do as such. Grand Theft Auto VI might be accessible on Xbox One and PlayStation 4 of every 2020, and the PC adaptation will most likely be discharged in the next year.

पंन्यास प्रवरश्री गुणचंद्रसागरजी म.सा. को आचार्य पदवी

पंन्यास प्रवरश्री गुणचंद्रसागरजी म.सा. को प.पू. आचार्यश्री चन्द्राननसागरसूरीश्वर्जी म.सा. के वरद हस्तों से आचार्य पदवी प्रदान

मुंबई : श्री नाकोडा भैरव दर्शन धाम महातीर्थ की पावन धन्य धरा पर जाप-ध्यान निष्ठ, जन-जन की आस्था के केंद्र, महामंग्लिक सम्राट, राष्ट्रसंत प.पू. आचार्यश्री चंद्राननसागरसूरीश्वर्जी म.सा. द्वारा अपने वरद हस्तों से अपने शिष्य प.पू. पंन्यास प्रवार्श्री गुणचन्द्रसागरजी म.सा. को सागर समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री दौलतसागर सुरिश्वर्जी म.सा. की आज्ञा से आचार्य पदवी प्रदान की गई| पूज्य गुरुदेवश्री ने आचार्य पद की सभी क्रियाओं को करवाया एवं नूतन आचार्यश्री को सूरी मन्त्र सुनाया| इस मंगलवेला में गुरुदेवश्री ने फ़रमाया की आचार्य पद नवकार महामंत्र के तीसरे पद को शोभायान करता है| आचार्य पद तीर्थंकरो द्वारा प्रदत संयम जीवन का सबसे बड़े वरदान जैसा है, इस पद के साथ ही देव , गुरु और धर्म की प्रभावना बढ़ाने की जिम्मेदारी बढ़ जाती है| इस पद की गरिमा है की सरलता, सहजता और विनम्रतापूर्वक धर्मानुयागीयों और संघों के साथ जुड़ाव बढ़ाना और धर्म प्रभावना के सक्रुत्यों की प्रेरणा करना| मुनिश्री मननचन्द्रसागरजी म.सा. ने साधु से गणिवर्य, पंन्यासप्रवर और उपाध्याय पद के बाद आचार्य पद तक के जीवन का महत्त्व बताया| इस शुभ प्रसंग पर भारतभर से अनेकों गच्छाधिपति एवं आचार्य भगवंतों के मंगलकामना संदेश आए तथा गुरुदेवश्री एवं अन्य सभी साधु-साध्वीजी भगवंतों ने उनके आचार्य पद की मंगलकामना की | इस पावन मंगलमय वेला में मुनिश्री हरीशचन्द्रसागरजी म.सा., मुनिश्री पुष्पचन्द्रसागरजी म.सा., मुनिश्री जैनेशचंद्रसागरजी म.सा. मुनिश्री मननचंद्रसागरजी म.सा. एवं विदुषी साध्वीजी कल्पिताश्रीजी म.सा., साध्वीजी चारुलताश्रीजी म.सा. साध्वीजी आशिताश्रीजी म.सा. साध्वीजी रिषिताश्रीजी म.सा. का पावन सानिध्य रहा| इस  पावन वेला में नाकोड़ा भैरव दर्शन धाम महातीर्थ के अध्यक्ष कांतिलाल शाह, महामंत्री दिनेश ज्योतिश्चंदजी तेलिसरा, सुरेश जैन, ललित जगावातादी ट्रस्ट मंडल सहित भारत भर से पधारे सभी संघों के पदाधिकारियों एवं गुरुभक्तों की गरिमामय उपस्थिति रही| संगीतकार निखिल सोनीगरा ने भक्ति गीतों से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई

Diksha News

 घाटकोपर के 26 वर्षीय सीए जैनेश जसाणी दीक्षा पश्चात बने मुनिश्री जिनवात्सल्यविजयजी म.सा.

मुंबई : संयम सरगम कार्यक्रम के अंतर्गत दिनांक 16 नवंबर 2016 को घाटकोपर में प.पू. पन्यास प्रवर श्री तत्वदर्शनविजयजी म.सा. के मार्गदर्शन में 26 वर्षीय सीए जैनेश जसाणी ने संयम मार्ग को अंगीकार कर दीक्षा ग्रहण की| ज्ञात हो कि दीक्षा से पूर्व 13 नवंबर को जैनेश जसाणी ने घाटकोपर की सामान्य जनता को कपड़े व अन्नदान किया और 14 नवंबर को घाटकोपर के चिंतामणि जैन मंदिर के प्रांगण में आयोजित टॉक शो विथ दिक्षार्थी में दीक्षा के निर्णय उपरांत भौतिक, शारीरिक तथा मानसिक सुखो के दूसरी तरफ आध्यत्मिक आनदं की अनुभूति का जिवंत परिचय देते हुए कहा कि जैन धर्म और जैन तत्व ज्ञान को समझना आवश्यक है और इसके लिए तप-ध्यान-त्याग द्वारा मोक्ष की प्राप्ति कैसे संभव है आदि समझना चाहिए| प्रत्येक आत्मा साधना से परमात्मा कैसे बन सकती है, यह समझने के लिए भगवान महावीर की शिक्षा अंगीकार करनी चाहिए| घर-परिवार, भौतिक सुख-साधन और मोह-माया का त्याग कर सांसारिक जीवन से दीक्षा लेना, दिव्य कर्तव्य है इसलिए कठोर साधना के साथ गुरु के सानिध्य में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना जरुरी है| जैन दीक्षा निमित्त धार्मिक कार्यक्रम व प्रवचनों के कार्यक्रम किये गये| श्री जसाणी को दीक्षा पश्चात उनका नामकरण कर मुनिराजश्री शुक्लध्यानविजयजी म.सा. के शिष्य के रूप में मुनि श्री जिनवात्सल्यविजयजी म.सा. नूतन नाम प्रदान किया गया|


मलाड में आचार्य पदवी समारोह एवं दीक्षा मोहत्सव समारोह संपन्न

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मुंबई : अध्यात्मयोगी प. पू. आचार्य श्री कलापूर्णसुरिश्वर्जी म.सा. के समुदाय्वर्ती प.पू. पंन्यासश्रीजी तत्वदर्शनविजयजी म.सा. को आचार्यपद प.पू. आचार्यश्री तीर्थभद्र म.सा. के शुभ हस्तो से दिनांक १८.११.१६ को भव्य समारोह में अरोइत किया गया | साथ इस अवसर पर १९ वर्षीय मुमुक्षु क्रिश नरेन्द्र गाला ने भगवती प्रवज्या अंगीकार की | आचार्यश्री तीर्थभद्र सुरिश्वर्जी म.सा. के शुभ हस्तो से दीक्षा ग्रहण कर उनका नूतन नामकरण कर मुनिश्री तीर्थसुंदरविजयजी म.सा. के शिष्य रूप में मुनिराज श्री तीर्थघोषविजयजी म.सा. घोषित किया गया | दीक्षा की पूर्व रात्री को सागर चक्रवती के जीवन पर आधारित एक नाटक को मंचन किया गया | राजपथ नामक इस नाटक में सागर चक्रवती की मुख्य भूमिका मुमुक्षु क्रिश ने बहुत ही सटीक रूप से निभाई |


शत्रुंजय महातीर्थ पे आचार्यश्री जयानंदसुरिश्वर्जी म.सा. की निश्रा में ४ दीक्षाए संपन्न

पालीताणा : श्री शत्रुंजय महातीर्थ की शीतल व प्रभावी छात्रछाया में सौधर्मब्रहत्पोगच्छीय जैनाचार्य प.पू. श्रीमद् विजय जयानंदसुरिश्वर्जी म.सा. आदि ठाणा की पावन निश्रा में मार्गशीर्ष वद १०, बुधवार दिनांक २३.११.१६ के शुभ दिवस सौ. मंजुदेवी भूरमलजी बंदामुथा (धागसा), कुमारी पायल कमलचंदजी वाजवत (आहोर), कुमारी सुहानी (सूरत) , कुमारी श्रद्धा संजयजी रामानी (गुडा बालोतान) की भगवती प्रवज्या उल्लासमय वातावरण में संपन्न हुई | नूतन साध्वीजी के नाम क्रमश: साध्वीजीश्री मुक्तिचेत्याश्रीजी , साध्वीजीश्री मुक्तिअभयाश्रीजी , साध्वीजी आदियशाश्रीजी , साध्वीजी श्री  मुक्तिश्रेयाश्रीजी म.सा. का नामकरण हुआ| साथ ही इस शुभ अवसर पर आहोर निवासी शा. छगनराजजी नागराजजी वजावत परिवार की ओर से आचार्यश्री जयानंदसुरिश्वर्जी म.सा. की अज्ञानुव्रती शासन दीपिका प्रवर्तिर्नी  प.पू. साध्वीजी मुक्तिश्रीजी म.सा की शिष्य साध्वीजी श्री कुशलप्रभाश्रीजी , वसंतबालाश्रीजी आदि ठाणा के २०१७ के चातुर्मास की घोषणा उदयपुर में कराने की जय बुलाई गयी है |


 कुक्षी निवासी मुमुक्षु सविता जैन दीक्षा अंगीकार कर बनी साध्वीजी श्री जीतयशाश्रीजी म.सा.

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उज्जैन : कुक्षी निवासी मुमुक्षु सविता जैन ने हजारों श्रावक-श्राविकाओं की मौजूदगी में सांसारिक जीवन का त्यागकर लोकसंत प.पू. श्रीमद्  विजय जयंतसेनसुरिश्वर्जी म.सा. आदि ठाणा के पावन सानिध्य में संयम पथ अंगीकार किया| राष्ट्रसंत श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरिश्वर्जी ने जैसे ही मुमुक्षु सविता जैन को दीक्षा मंत्र के साथ ओघा(चरवला) प्रदान किया तो वे अंतमरण से झूम उठी और सांसारिक चोला छोड़ने के पहले खूब नृत्य किया | फिर केशलोचन के बाद साध्वी वेश धारण किया| राष्ट्रसंत ने ४३ वर्षीय मुमुक्षु सविता जैन को नूतन नामकरण कर साध्वी श्री जीतयशाश्रीजी म.सा. नाम प्रदान किया |उल्लेखनीय यह है की वर्ष १९९८ में राष्ट्रसंत चातुर्मास के लिए कुक्षी आये थे|इमके उपदेशों से प्रेरित होकर कुक्षी निवासी सविता जैन को दीक्षा के भाव जागे थे| राष्ट्रसंत ने दीक्षा मंत्र-सूत्रों का उल्लेख कर दीक्षा विधि संपन्न कराई | राष्ट्रसंत ने मुमुक्षु का नामकरण जीतयशाश्रीजी किया तो पंडाल जिनशासन के जयकारों से गूंज उठा|

साध्वीजी श्री संघवनश्रीजी म.सा.

परम पूज्य साध्वीजी श्री संघवनश्रीजी म.सा.

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जन्म नाम : संघवन

जन्म तिथि : पौष सुदी ४, वि.सं. १९९९

जन्म दिनांक : ३१ दिसंबर १९३२

स्थान : भूति, जिला – जालोर (राज.)

पिता : संघवी चुन्नीलालजी वनेचंदजी वेदमेहता

माता : श्रीमती बदमिबाई चुन्नीलालजी वेदमेहता

पति : मुथा श्री तिलकचंदजी भंसाली

भाई-भाभी : स्व.श्री संपतराजजी-श्रीमती सुमित्रादेवी

श्री नवरतनमलजी – श्रीमती गुणवंतीदेवी

श्री कमलराजजी – श्रीमती प्रेमलतादेवी

श्री राजरतनजी – स्व. श्री जयादेवी

श्री मोतीशाजी – श्रीमती मंजुलादेवी

बहन : श्रीमती पिस्तादेवी जबरचंदजी सिरोया

श्रीमती मुन्नीदेवी राकेशजी जैन

दीक्षा : पौष सुदी पूनम वि.सं. १९२६

स्थान : भूति , जिला – जालोर (राज.)

दीक्षा गुरुणी : आचार्यमह्तरा साध्वी श्री ललितश्रीजी म.सा.

दीक्षा नाम : साध्वी श्री संघवनश्रीजी म.सा.

पदवी : ” सेवाभावी” ई.सं. १९९६

ससुराल : गोल ( अहेम्दाबाद), तेनाली(आ.प्र.)

सांसारिक परिवार : पुत्री – मंजुला, भाग्यवती, रेखा, लता

देवर-देवरानी – मोहनलालजी – मणिबेन

पुत्र-पौत्री – रमेशजी,यशवंतजी गौतम,दिलखुश,मंखुश,पाकशाल,हर्ष

विधाध्ययन : समग्र आवश्यक सूत्र , कर्मग्रंथ ,ज्ञानुसार,प्रशमरमि आदि सभी सूत्र संस्कृत, प्राकृत ग्रंथ बुक

विहार क्षेत्र : राजस्थान,गुजरात,महाराष्ट्र,मध्य प्रदेश,आंद्र प्रदेश,कर्णाटका, तमिलनाडु

शिष्य परिवार : साध्वी श्री तत्वलोचनाश्रीजी म.सा.

साध्वी श्री तत्वदर्शनाश्रीजी म.सा. ठाना ९

साध्वी श्री मणिप्रभाश्रीजी म.सा. ठाना ४४

साध्वी श्री विनीतप्रज्ञाश्रीजी म.सा. ठाना २

साध्वी श्री हर्षवर्धनाश्री म.सा. ठाना २

साध्वी श्री त्रिलोक्यरत्नाश्रीजी म.सा.

साध्वी श्री दर्शनरत्नाश्रीजी म.सा. ठाना ३

तपश्चर्या : २ वर्षीतप,  विशस्थानक , पर्वतिथि समस्त आराधना , ८ , ११ , १६, २१

उपवास, मासक्षमन , नवपद ओलीजी , वर्धमान, ४० वर्ष तक सतत तपआराधना

गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद्विजय रविन्द्रसुरिश्वरजी म.सा.

गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद्विजय रविन्द्रसुरिश्वरजी म.सा. का जीवन परिचय

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अर्हत योगी वर्तमानचारी गच्छाधिपति आचार्यदेव श्री रविन्द्रसुरीजी म.सा. आचार्य देवेश श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पात परंपरा के पंचम आचार्य श्री विधाचन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. के शिष्यरत्न थे| अवरित रूप से ध्यान-साधना में लगे रहने से इनकी पहचान अर्हतयोगी के रूप में बनी है|

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पंन्यास पद का वासक्षेप करते हुए आचार्यश्री हेमेन्द्रसूरीजी म.सा.

आपका जन्म सं २०११ की भाद्र्वा सुदी पंचमी अर्थात २ सितम्बर १९५४ को सियाणा(राज.) में प्राग्वट वंशीय श्री तगराजजी तथा श्रीमती रत्नादेवी के धर्मिष्ठ परिवार में हुआ था| आपका गृहस्थ नाम नथमल था| अपने पति के स्वर्गवास के कुछ ही वर्ष पश्चात आपकी माता ने अपने दोनों पुत्रों को आचार्य श्रीमद्विजय विधाचंद्रसूरी को अर्पित कर दीक्षा ग्रहण कर ली व साध्वी श्री पियूषलताश्रीजी के नाम से विख्यात हुई | उस समय्श्री नथमल किशोरवस्था में थे मगर आचार्य श्री विधाचन्द्रसुरीजी के सानिध्य व ध्यान साधना ने इनको प्रौढ़ बना दिया था| अंततः वैशाख सुदी ६ सं २०२६ को आपने आचर्यश्री से सियाणा में प्रवज्या ले ली | कुछ समय पश्चात आपके लघुभ्राता श्री मोहनलाल ने भी पूज्य आचार्यश्री से दीक्षाव्रत लिया| वे अब ज्योतिषसम्राट मुनिप्रवर ऋषभचन्द्रविजय जी म.सा. के नाम से जाने जाते है| इस प्रकार यह सम्पूर्ण परिवार जैन धर्म की सेवा में समर्पित हो गया| दीक्षा पश्चात आचर्यश्री ११ वर्षों तक अपने गुरु का सानिध्य व मार्गदर्शन प्राप्त हुआ|उनके साथ विहार करते हुए अपने व्याकरण,न्याय,वास्तु,ज्योतिष,मंत्र विज्ञान,संस्कृत,प्राकृत भाषा तथा आगमों का ज्ञान अर्जन किया|

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आचार्यपदवी भीनमाल

पूज्य गुरुदेव के स्वर्गवास पश्चात आप उनके उतराधिकारी राष्ट्रसंत शिरोमणि आचार्य श्री हेमेन्द्रसुरिश्वर जी म.सा. की आज्ञा में रहे व उनके साथ या उनकी आज्ञानुसार विहार व चौतुर्मास किये एवं गच्छनायक को संघ संचालन में सहयोग प्रदान किया| सन १९९६ में पालीताणा के राजेंद्र भवन में आचार्यश्री ने आपको आयम्बिल की तपश्चार्य के साथ शास्त्रोतक्त योगोध्हन पूर्वक पन्यास पदवी से विभूषित किया|

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भीनमाल ने मुनि श्री नरेन्द्रविजयजी म.सा. को उपाध्याय पद प्रदान करते हुए आचार्यश्री

आपने संवत् २०४२ का चातुर्मास आचार्यश्री हेमेन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. के साथ जावरा में किया था तब आपने अपनी नियमित क्रियाओं को करते हुए ४२ उपवास की कठिन तपस्या की थी| पालीताणा चातुर्मास में आपने मासक्षमन भी किया | तपस्याए आपको प्रिय है व उपवास,बेले,टेली,आप अक्सर कर लेते है फिर भी आपका मुख्य रुझान ध्यान साधना की ओर रहा|प्राय: एकांत में रहकर महीनों ध्यान लगाना,एक-एक माह तक मौन रहकर साधना करना आदि ने आपको आत्मबल को उच्च स्तर तक पहुंचाया| यह साधना केवल आत्मा कल्याण के लिए ही नहीं, गच्छ तथा लोक कल्याण के लिए भी थी|

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७२ जिनालय प्रतिष्ठा

आचार्यदेवेश राष्ट्रसंत शिरोमणि श्रीमद्विजय हेमेन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. के देवलोकगमन के पश्चात् गच्छ के वरिष्ठ मुनि संयमवय स्थविर श्री सौभाग्यविजय जी म.सा. के निर्देशनुसार आप गच्छ व्यवस्था में संलझ हुए | त्रिस्तुतिक समाज के पवित्रतम तीर्थस्थल श्री मोहनखेड़ा तीर्थ को संचालित करने वाले श्री आदिनाथ राजेंद्र जैन श्वे, जैन पेढ़ी ट्रस्ट ने पुर्वोचार्य के निर्देशनुसार आपको अपना अध्यक्ष चुन लिया व उनके मार्गदर्शन में तीर्थ की व्यवस्था व विकास कार्य को निरंतर रखा| यह उल्लेखनीय है की गच्छ के आचार्य ही ट्रस्ट के अध्यक्ष होते है| फिर भी गच्छनायक का पद रिक्त था अत: श्री संघो ने आप से बार-बार गच्छ का नेतृत्व करने के लिए आचार्य पद लेने का निवेदन किया जिसकी परिणिति भीनमाल के पाटोत्सव के रूप में हुई|

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रतलाम में प्रतिष्ठा

भीनमाल में हजारो श्रावक-श्राविकाओं व कई श्रीसंघो की उपस्थिति में पंचहिनका मोहत्सव पूर्वक २९ अप्रैल २०१२ को आपको आचर्य पदवी प्रदान की गई तथा वे सौधर्मबृहतपागच्छीय परंपरा के ७४वे आचार्य तथा कलिकाल सर्वज्ञ आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय राजेंद्रसूरीश्वर्जी म.सा. के सप्तम पट्टधर बने |

चातुर्मास :

आचार्य पदवी के पश्चात् आपने २०१२ का चातुर्मास नेल्लर में, २०१३ में शोरापुर(कर्नाटक) तथा २०१४ में श्री मोहनखेड़ा तीर्थ में किया| सन २०१५ में आपने ध्यान व तपस्या की दृष्टी से गिरनार को अपना चातुर्मास स्थल चुना| वर्ष २०१६ का आपका चातुर्मास अहमदाबाद में होना निर्धारित था|

प्रतिष्ठाए :

आपने २२ जून २०१४ को नेल्लूर में नूतन चौमुखी जिनालय की अंजनशलाका का सह प्रतिष्ठा संपन्न की| मालवा क्षेत्र में आपके करकमलों से श्री रूचि प्रमोद पार्शवनाथ जिनालय रतलाम की प्रतिष्ठा ६ मई २०१४ को, श्री शंखेश्वर पार्शवनाथ राजेंद्र जैन मंदिर नीमच की प्रतिष्ठा  १५ मई २०१४ को तथा खाचरोड़ में श्री आदेश्वर जैन श्वे. भटेवरा मंदिर  की प्रतिष्ठा १ दिसम्बर २०१४ को संपन्न की | इस मध्य आचार्य श्री हेमेन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. की जन्मभूमि बागरा में आपके द्वारा श्री आदिनाथ हेमेन्द्रसुरि स्मृति मंदिर की प्रतिष्ठा दिनांक ५ जून २०१४ को की| आचार्यदेवेश ने आचार्यपदवी के पूर्व कोष्ठक काल में भीनमाल के विख्यात ७२ जिनालय की प्रतिष्ठा फ़रवरी २०११ को आपकी मुख्यता में संपन्न हुई थी, ६ जून को बड़ावदा(म.प्र.) को दादावाडी में जिनमंदिर की, २० फ़रवरी २०१२ को चौपाटी जावरा पर श्री शंखेश्वर पार्शवनाथ नूतन जिनालय की प्रतिष्ठा आपके कर कमलों में हुई| शत्रुंजय तीर्थ (पालीताणा) में आपने २७ फ़रवरी को गुरु राजेंद्र शताब्दी धाम की प्रतिष्ठा आपके द्वारा की गई थी|

दीक्षा व अन्य :

आचार्यश्री ने मोहनखेड़ा तीर्थ पर तीन मुमुक्षु बहनों को १० नवम्बर १४ को दीक्षा प्रदान की व उनको क्रमश: साध्वी की कीर्तिरत्नाश्री जी म.सा., श्री कुसुमरत्नाश्री म.सा. एवं साध्वी श्री कीर्तिवर्धनाश्री म.सा. नाम कारन किया |आचार्य पद पूर्व आपके कर कमलों से छ: दीक्षाए हुई|

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श्री मोहनखेड़ा में दीक्षादान

आचार्यश्री ने श्रीमोहनखेडा तीर्थ पर २०१४ के गुरुसप्तमी मोहत्सव को अपनी निश्रा प्रदान की| आपने ९-१० अप्रैल को त्रिस्तुतिक जैन समाज के ट्रस्ट के पदाधिकारियों को सम्मलेन आयोजित कर विचार विमर्श किया| आपने विहार के अन्तगर्त दक्षिण भारत,गुजरात,म.प्र. राजस्थान के अनेक ग्रामों नगरों में धर्म प्रभावना की|

२० विहरमान जिनेश्वर परिवार

२० विहरमान जिनेश्वर परिवार को भाव-भरी वंदना

  • कुल २०X ८४ = १६८० गणधर भगवंतों को एवं उन्केद्वारा रचित द्वादशांगी को भावभरी वंदना….

  • २०X१० लाख = २ क्रोड़ केवलज्ञानी भगवंतों को भावभरी वंदना…

  • २०X१ =२० अरब साधू -शाध्विजी भगवंतों को भाव भरी वंदना…

  • २०Xअरबों = अरबों श्रावक-श्राविकाओं को भावपूर्ण प्रणाम….

  • प्रभु के समवसरण में पधारकर वंदन-स्तुति आदि करके प्रभु की देशना सुनने वाले चौसट इन्द्र-इन्द्राणियों, असंख्य देव-देवियों को स्बहुमान प्रणाम….

  • विशों प्रभु के अधिष्ठायक देव-देवियों को भावभरे प्रणाम…

  • समवसरण में पधारकर प्रभु की वाणी का अमृतपान करने वाले देशविरती, सम्यकत्व के सन्मुख ऐसे तिर्थ्यंचो की भी भावभरी अनुमोदना….

 

***** २० विहरमान जिनेश्वर *****

श्री सीमंधर स्वामी – वृषभ

श्री युगमंधर स्वामी – गज

श्री बाहु स्वामी – मृग

श्री सुबाहु स्वामी – मर्कट

श्री सुजात स्वामी – सूर्य

श्री स्वयंप्रभ स्वामी – चंद्र

श्री ऋषभानन स्वामी – सिंह

श्री अनंतवीर्य स्वामी  – गज

श्री सुरप्रभ स्वामी – चंद्र

श्री विशाल स्वामी – सूर्य

श्री वज्रंधर स्वामी – शंख

श्री चंद्रानन स्वामी – वृषभ

श्री चंद्रबाहू स्वामी – पद्म

श्री भुजंगदेव स्वामी – पद्म

श्री ईश्वर स्वामी – चंद्र

श्री नेमीप्रभ स्वामी – सूर्य

श्री वीरसेन स्वामी – वृषभ

श्री महाभद्र स्वामी – गज

श्री देवयश: स्वामी – चंद्र

श्री अजितवीर्य स्वामी – स्वस्तिक


** २० विहरमान जिनेश्वरों की सामान्य जानकारी **

  • देह्वार्ण  – सुवर्ण

  • देहमान  – ५०० धनुष्य

  • जन्म राशि  – धनराशि

  • जन्म नक्षत्र  – उत्तराषाढा

  • च्यवन कल्याणक  – श्रावण वदी १

  • जन्म कल्याणक  – वैशाख वदी १०

  • दीक्षा कल्याणक  – फाल्गुन सुदी ३

  • केवलज्ञान कल्याणक  – चैत्र सुदी १३

  • निर्वाण कल्याणक  – श्रावण सुदी ३


*****वर्तमान तीर्थंकर भगवान सीमंधर स्वामी का परिचय*****

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Vyaktitv(Chief Patron)
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