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श्री चमत्कारी पार्श्वनाथ जैन तीर्थ

bakra road tirth

मंदिर का दृश्य |

श्री चमत्कारी पार्श्वनाथ जैन तीर्थ (बाकरा रोड)


               अंग्रेजों के शासन काल में बाकरा गाँव के ठाकुर श्री धोकलसिंहजी के प्रयास  से समदड़ी-रानीवाडा रेलवे लाइन का कार्य संपन्न हुआ| उस समय संयोग से विहार करते हुए सन १९३० में आचार्यदेव श्रीमद्विजय तिर्थेन्द्रसूरीश्वर्जी म.सा. का आगमन इस क्षेत्र में हुआ| ठाकुर साहब ने भव्य स्वागत कर यहीं पर एक कमरे में ठहरने की व्यवस्था करवाई| आस-पास गांवो के लोग एवं बाकरा रोड के समस्त जाती व व्यापारीगण पूज्यश्री के प्रवचन सुनने आने लगे|

               उस समय बाकरा रोड पर चीटियाँ बहुत निकलती थी, जिससे जीव हिंसा होती थी| इस विषय में लोगों द्वारा पूछने पर गुरुदेव ने फरमाया की “यहाँ पर भविष्य में महान विशाल तीर्थ बनेगा तथा जितनी यहाँ पर निकल रही है, उतनी ही विशाल संख्या में यहाँ पार लोगों का आवगमन होगा|” उस भविष्यवाणी को आज हम यहाँ साक्षात देख रहे है|

              गुरुदेव ने यहाँ पर तिर्थेन्द्रसूरी ज्ञान भंडार की स्थापना की| गुरुदेव के दो शिष्यों, मुनि लब्धिविजयजी(लब्धिचन्द्रसूरीजी) व मुनि कमलविजयजी ने दूरदृष्टी रखकर यहाँ बड़ा भूखंड क्रय करवाया| एक बार विहार दरम्यान यहाँ पधारे तब आचार्य श्री लब्धिचंद्रसूरीजी ने इस भूमि पर नाग-नागिन के जोड़े को देखा| उसी समय उनके मन में यहाँ भगवान पार्श्वनाथ का दिव्य मंदिर बनाने की भावना हुई|

              रेवतड़ा के चातुर्मास में कार्तिक सुदी १० को गुरु जयंती के अवसर पर उन्होंने संघ समक्ष जिनालय बनाने की भावना व्यक्त की, जिसे उपस्थिति श्री संघ ने सहर्ष स्वीकार किया| एवं मात्र दो वर्ष की अल्पा विधि में चमत्कारी पार्श्वनाथ तीर्थ का निर्माण हुआ| प्रतिष्ठा आपके ही शुभहस्तों से वि.सं. २०५४ माघ सुदी ६ को संपन्न हुई| प्रतिष्ठा के दिन अधिष्ठायक नागदेवता समय पर पधारे व दिनभर गुरुभक्तों ने श्रद्धापूर्वक दर्शन का लाभ लिया| प्रतिष्ठा के बाद तीर्थ प्रगति की ओर निरंतर अग्रसर हो रहा है|

              मुनिराज श्री जयानंदविजयजी म.सा. की पावन निश्रा में वि.सं. २०६८ , दी. २०-१-२०११ को पार्श्व प्रभु के गणधर श्री शुभ स्वामी एवं आर्यघोषस्वामी की अंजनशलाका एवं प्रतिष्ठा इस तीर्थ पर संपन्न हुई| पूज्यश्री की निश्रा में उपधान, सामूहिक चातुर्मास आदि कई धार्मिक अनुष्ठान हुए, जिससे यह तीर्थ लोगों की आस्थाओं के साथ विशेष रूप से जुड़ा| आज यह तीर्थ विकास की ओर अग्रसर है|

श्री तिर्थेन्द्रसूरी स्मारक ट्रस्ट , तिर्थेन्द्र नगर, बाकरा रोड, जिला – जालोर (राज.) ३४३०२५


 

मुमुक्षु भंवरलालजी दोशी का भव्य दीक्षा मोहत्सव संपन्न

 

मुमुक्षु भंवरलालजी दोशी का भव्य दीक्षा मोहत्सव संपन्न

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अहमदाबाद – ३१/०५/२०१५  जिनशासन के इतिहास का यादगार दिन| जब राजनगर अमदाबाद मे संयम जहाजपे बैठकर एक धन कूबेरने अपनी सारी धन दौलत शानो शोकत|त्यागकर सच्चे जैन श्रमण भगवंत बनके संयम का त्याग का जिवदया का जयणाका अहिंसा परमो धर्मको स्वीकार किया| ऐसे भंवरलाल से “भव्यरत्न विजयजी “ बने मुनि भगवंत को कोटि कोटि वंदन……

दिल्ली के अरबपति व्यापारी भंवरलाल जैन दोशी रविवार को जैन संत भव्यरत्न विजयजी महाराज बन गए। दीक्षा से पहले अपनी करोड़ों की दौलत जनता को लुटाने के बाद रविवार सुबह हजारों मुमुक्षु व संतों की उपस्थिति में भंवरलाल ने संयम जहाज पर सवार होकर मोह व माया का त्याग किया।

भंवरलाल दोशी राजस्थान के सिरोही जिले के छोटे से गांव मंडार के हैं। वर्ष १९५६ की २६ मई को जन्मे दोशी ने वहां से निकलकर देश व दुनिया में ५०० करोड़ रुपये से भी अधिक का कारोबार फैलाया। इसके साथ ही वह समाजसेवा व धार्मिक आयोजनों से जुड़े रहे। दर्जनों समाजसेवी व धार्मिक संस्थाओं के प्रमुख होने की वजह से दोशी को जैन संतों के सानिध्य में रहने का मौका मिला।

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आचार्य गुणरत्न सूरीश्वरजी के संपर्क में आकर त्यागा मोह

आचार्य गुणरत्न सूरीश्वरजी के संपर्क में आने के बाद भंवर लाल ने भी माया मोह त्याग कर अध्यात्म में रम जाने का प्रण लिया। रविवार को अहमदाबाद एजुकेशन सोसायटी के प्रांगण में लाखों धर्मावलंबियों के बीच उन्होंने दीक्षा ग्रहण की। सुबह छह बजे धार्मिक मंत्रोच्चार के साथ दीक्षा विधि प्रारंभ हुई। करीब 11 बजे आचार्य गुणरत्न सूरीश्वरजी ने भंवरलाल का नामकरण भव्यरत्न विजयजी होने का एलान किया। कार्यक्रम में भाग लेने वाले अतिविशिष्ट लोगों की वीवीआइपी, वीआइपी, वीआइपी 1, 2 व 3 करके पांच श्रेणियां रखी गई थी।

4

 

* वर्षो याद रहेगा यह वर्षीदान

भंवर लाल के भव्यरत्न विजयजी महाराज बनने से पहले अहमदाबाद में हुआ भव्य वर्षीदान महोत्सव वर्षों याद रहेगा। भंवर लाल ने इसमें नोट, सोने चांदी के सिक्के, फ्लैट की चाबी तक दान कर दी। वर्षीदान में हाथी, घोड़े, ऊंट, रथ देखते ही बन रहे थे। मुंबई, कच्छ व राजस्थान से पहुंचे कलाकार धार्मिक भजन और गीतों से श्रोताओं का मन मोह रहे थे। वहीं भंवर लाल दोनों हाथ से दौलत लुटा रहे थे।

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* माया त्याग अध्यात्म की मेहंदी रचाई

दीक्षा से पहले भंवर लाल दोशी ने माया मोह त्यााग दिया। जैन संतों की उपस्थिति में उन्होंने बाल त्यागे। दीक्षा के मौके पर उनके हाथों पर मेहंदी सजी थी। यह मेहंदी भी उनके गांव के पास सोजत से मंगाई गई थी। गुरु भगवान के सानिध्य में आने के बाद भंवर लाल का जीवन पूरा बदल गया था। उनकी दीक्षा के लिए परिवार वाले भी खुशी-खुशी तैयार हो गए।

* सब से बड़ा त्याग अहंकार का त्याग होता है

भंवरजी के लिए ऑफिस और बहार की दुनिया में इतना मान सम्मान था की उनके पहुंचते ही सारे लोग खड़े हो जाते थे आज वो गुणरत्न सुरीजी के १०८ वे शिष्य बने है अब उन्हें उनसे दीक्षा पर्याय में बड़े सभी साधुओ की पंक्ति में सबसे छोटे साधू के रूप जाना जायेगा और उन्हें अपनी उम्र से बड़े या छोटे सभी साधुओ को वंदन करना होगा कल तक उनके एक इशारे पर ३२ पकवान थाली में सजकर आ जाते थे अब उन्हें घर घर घूमकर अपने और अन्य साधुओ के लिए गोचरी लानी होगी कल्पना कीजिये ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में कोई आम करोड़पति की भाषा और व्यव्हार कैसा होगा, भवरलालजी ने बरसो पुरानी आदतो को और भौतिक सुखो ही नहीं त्यागा है उन्होंने विनय गुण को भी अंतर में उतारा है जिस ५५ वर्षो की उम्र में आदतो को बदलना ना मुमकिन माना
गया है उस उम्र में भवरलालजी त्याग की एक उत्तम मिसाल बने है ये गुरु कृपा से ही संभव हो सकता है।

 

श्री पावापुरी तीर्थ – सिरोही

श्री पावापुरी तीर्थ – जीव मैत्री धाम

Shri Pavapuri Jain Tirth-Sirohi

मंदिर का दृश्य|


 

pavapuri sirohi

मुलनायक भगवान

श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान |


परिचय :

राजस्थान के सिरोही जिले में बसा हुआ पावन पवित्रधाम श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम, के. पी. संघवी ग्रुप द्वारा विकसित किया गया है। इस तीर्थ धाम में जैन तीर्थ (मंदिर संकुल) और जीव रक्षा केंद (एनिमल वेलफेयर सेंटर) भी बने हुए हैं। इस तीर्थ का नामकरण वहाँ के पावाडा कृषि  कुऐ के नाम से किया गया है।

श्री कुमारपाल भाई वी. शाह ने के. पी. संघवी ग्रूप के स्थापक स्व. संघवी हजारीमलजी पुनमचंदज (बाफना) और संघवी बाबुलालजी पुनमचंदजी (बाफना) को पावापुरी में तीर्थधाम बनवाने की प्रेरणा दी। इस तीर्थधाम का निर्माण और विकासकार्य ३० मई १९९८ शनिवार, ज्येष्ठ शुक्ल १५ वि स २०५४ के शुभ दिन को शुरु किया गया।

प्रारभं में १०० मवेशियों के लिये गौशाला बनवाने का विचार किया गया था। किंतु आज प्रभुकृपा से यहाँ ५०० बीघा से ज्यादा जमीन पर इस प्रतिष्ठान का विस्तार हुआ है। ७१,००,००० चौरस फिट फैले जीव रक्षा केंन्द्र (एनिमल वैलफेयर सेंटर) में आज ६१०० मवेशियाँ आश्रित हैं। साथ ही मंदिर संकुल का विस्तार ३१,००,००० चौरस फीट है।

४०० शिल्पकारों की ढ़ाई साल की रोजाना कड़ी मेहनत का फल बुधवार ७ फरवरी २००१(माघ शुक्ल १४, वि. स. २०५७) को प्राण- प्रतिष्ठा पुजा के रुप में प्राप्त हुआ। प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में सम्मलित होने आए भक्तगण मंदिर के निर्माण कार्य को देख गदगद हो उठे।

सिरोही, भारत के उत्तर- पश्चिमी राज्य राजस्थान के पवित्र यात्रा स्थलों में एक है , जिसके इर्द गिर्द १४ जैन मंदिर है। सदियों से इन देव मंदिरों ने अनगिनत भक्तों को प्रेम, शांति और आनंद का संदेश प्रदान किया है। ऐसी अनगिनत पवित्र परंपराओं को जीवित रखते हुए श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम भक्तजनों और वर्तमान युग की नई पीढ़ी के लिए आंतरिक सुख-शांति प्राप्त करने का अनुठा दैविक स्थान बन चुका है।

श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम जैन मंदिर शिल्पविधान व सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका है।कला व शिल्प का संमिश्रण साधे हुए पवित्रता और मूल्यबोध करवाता यह क्षेत्र मन, शरीर व आत्मा को शांति प्रदान करता है। इसकी एक झलक शरीर, मन और आत्मा को तृप्त कर देती है।

ध्यानस्थ योगी जैसी अरावली पर्वतमाला के चिंतन, प्रेरक, शांत, सुंदर पर्यावरण में बसा हुआ श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम बड़ा ही लुभावना लगता है। यहाँ जो मन की प्रसन्नता,आंतरिक सुख व आत्मशांति मिलती है, उसे शब्दों में बया नहीं किया जा सकता सिर्फ महसुस किया जा सकता है|

जलमंदिर :

चौमुखा जल मंदिर प्रतिषठा आचार्य श्री हेमचंद्रससूरिशवरजी एवं ६ आचर्य भगवंतो, ५० साधु एवं १५० साधवीजी  भगवंतो की निश्रा में १ मई २००९ को सम्पन्न  हुई|

मंदिर संकुल के दुसरे अहाते में कुल देवता और देविओं के मंदिर बनाये गए है जिन में श्री वीर मणिभदजी, श्री नाकोड़ा भैरवजी, माँ पद्मावती, कुल देवी माँ सचिया ( औसियाँ ) और मॉ सरस्वती का मंदिर है|

सचिया माताजी -ओसवालकीकुलदेवी :

प.पू .श्री . रतनप्रभा सूरिजी के उपदेशों और सद्गुणों का पालन करते हुए ओसियाँ के राजा और क्षत्रियोंने जैन धर्म धारण किया और माँ दुर्गा के चरणों में पशुबलि चढाना बंद कर दिया किन्तु वे माताजी की पुजा अर्चना जरुर करते रहे। तब से इन माताजी को सचिया माता के नाम से अपनी कुलदेवी के रुप में स्थापित कर उनकी पुजा करते है।

मंदिर प्रतिष्ठान में कई गुंबज प्रकार के छोटे मंदिर बने हैं जो विविध देवी देवताओं को समर्पित हैं। इन की शोभा दर्शनीय है। इन मंदिरों के गुंबज सुवर्णमडित कलशयुक्त हैं। ये गुलाबी मंदिर और उनके सुनहरे कलश जैसे आध्यात्मिक स्वर्ग स्थान का अहसास दिलाते हैं। मंदिर प्रतिष्ठान और गौशाला परिसर का दूर से दर्शन करने पर पूरा स्थान पिंकसिटी समान नजर आता है। सोने पे जैसे सुहागा, उद्यान और जलाशय – दोनों से इस स्थान का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्तव कई बढ़ जाता है|

इस तीर्थ की पानी की आवश्यकता की पूर्ती हेतू चेक डेम बनवाया गया है। जिस में बारिश का पानी संग्रहित होता है और आवश्यकता नुसार पुजा एवं पक्षाल में इस्तमाल किया जाता है।

इस तीर्थ की प्रत्येक व्यवस्था का आयोजन और डिजाईन यहाँ आनेवाले सभी भक्तगणों की सुविधा और आराम को मध्ये नजर रखते हुए किया गया है ताकी वे यहाँ की मानसिक शांति और मधुर स्मृतियाँ ले कर वापस लौटें|


 ट्रस्टीज

संस्थापकट्रस्टी 

स्व. श्री संघवी हंजारीमल पुनमचंदजी बाफना ,श्री संघवी बाबुलाल पुनमचंदजी बाफना (अध्यक्ष),श्री संघवी किशोरभाई हंजारीमलजी बाफना ,श्री संघवी किर्तिभाई  हंजारीमलजी बाफना ,श्री संघवी नितिनभाई  हंजारीमलजी बाफना ,श्री संघवी अरविन्दभाई हंजारीमलजी बाफना ,श्री संघवी दिलीपभाई हंजारीमलजी बाफना ,श्री संघवी अमरीशभाई बाबुलालजी बाफना ,श्री संघवी समीरभाई बाबुलालजी बाफना

श्री पावापूरी तीर्थ – जीव मैत्री धाम (सिरोही)

 

Shri Pavapuri Jain Tirth-Sirohi

मंदिर का दृश्य|


 

pavapuri sirohi

मुलनायक भगवान

श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान |


परिचय :

राजस्थान के सिरोही जिले में बसा हुआ पावन पवित्रधाम श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम, के. पी. संघवी ग्रुप द्वारा विकसित किया गया है। इस तीर्थ धाम में जैन तीर्थ (मंदिर संकुल) और जीव रक्षा केंद (एनिमल वेलफेयर सेंटर) भी बने हुए हैं। इस तीर्थ का नामकरण वहाँ के पावाडा कृषि  कुऐ के नाम से किया गया है।

श्री कुमारपाल भाई वी. शाह ने के. पी. संघवी ग्रूप के स्थापक स्व. संघवी हजारीमलजी पुनमचंदज (बाफना) और संघवी बाबुलालजी पुनमचंदजी (बाफना) को पावापुरी में तीर्थधाम बनवाने की प्रेरणा दी। इस तीर्थधाम का निर्माण और विकासकार्य ३० मई १९९८ शनिवार, ज्येष्ठ शुक्ल १५ वि स २०५४ के शुभ दिन को शुरु किया गया।

प्रारभं में १०० मवेशियों के लिये गौशाला बनवाने का विचार किया गया था। किंतु आज प्रभुकृपा से यहाँ ५०० बीघा से ज्यादा जमीन पर इस प्रतिष्ठान का विस्तार हुआ है। ७१,००,००० चौरस फिट फैले जीव रक्षा केंन्द्र (एनिमल वैलफेयर सेंटर) में आज ६१०० मवेशियाँ आश्रित हैं। साथ ही मंदिर संकुल का विस्तार ३१,००,००० चौरस फीट है।

४०० शिल्पकारों की ढ़ाई साल की रोजाना कड़ी मेहनत का फल बुधवार ७ फरवरी २००१(माघ शुक्ल १४, वि. स. २०५७) को प्राण- प्रतिष्ठा पुजा के रुप में प्राप्त हुआ। प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में सम्मलित होने आए भक्तगण मंदिर के निर्माण कार्य को देख गदगद हो उठे।

सिरोही, भारत के उत्तर- पश्चिमी राज्य राजस्थान के पवित्र यात्रा स्थलों में एक है , जिसके इर्द गिर्द १४ जैन मंदिर है। सदियों से इन देव मंदिरों ने अनगिनत भक्तों को प्रेम, शांति और आनंद का संदेश प्रदान किया है। ऐसी अनगिनत पवित्र परंपराओं को जीवित रखते हुए श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम भक्तजनों और वर्तमान युग की नई पीढ़ी के लिए आंतरिक सुख-शांति प्राप्त करने का अनुठा दैविक स्थान बन चुका है।

श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम जैन मंदिर शिल्पविधान व सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका है।कला व शिल्प का संमिश्रण साधे हुए पवित्रता और मूल्यबोध करवाता यह क्षेत्र मन, शरीर व आत्मा को शांति प्रदान करता है। इसकी एक झलक शरीर, मन और आत्मा को तृप्त कर देती है।

ध्यानस्थ योगी जैसी अरावली पर्वतमाला के चिंतन, प्रेरक, शांत, सुंदर पर्यावरण में बसा हुआ श्री पावापुरी तीर्थ जीव मैत्रीधाम बड़ा ही लुभावना लगता है। यहाँ जो मन की प्रसन्नता,आंतरिक सुख व आत्मशांति मिलती है, उसे शब्दों में बया नहीं किया जा सकता सिर्फ महसुस किया जा सकता है|

जलमंदिर :

चौमुखा जल मंदिर प्रतिषठा आचार्य श्री हेमचंद्रससूरिशवरजी एवं ६ आचर्य भगवंतो, ५० साधु एवं १५० साधवीजी  भगवंतो की निश्रा में १ मई २००९ को सम्पन्न  हुई|

मंदिर संकुल के दुसरे अहाते में कुल देवता और देविओं के मंदिर बनाये गए है जिन में श्री वीर मणिभदजी, श्री नाकोड़ा भैरवजी, माँ पद्मावती, कुल देवी माँ सचिया ( औसियाँ ) और मॉ सरस्वती का मंदिर है|

सचिया माताजी -ओसवालकीकुलदेवी :

प.पू .श्री . रतनप्रभा सूरिजी के उपदेशों और सद्गुणों का पालन करते हुए ओसियाँ के राजा और क्षत्रियोंने जैन धर्म धारण किया और माँ दुर्गा के चरणों में पशुबलि चढाना बंद कर दिया किन्तु वे माताजी की पुजा अर्चना जरुर करते रहे। तब से इन माताजी को सचिया माता के नाम से अपनी कुलदेवी के रुप में स्थापित कर उनकी पुजा करते है।

मंदिर प्रतिष्ठान में कई गुंबज प्रकार के छोटे मंदिर बने हैं जो विविध देवी देवताओं को समर्पित हैं। इन की शोभा दर्शनीय है। इन मंदिरों के गुंबज सुवर्णमडित कलशयुक्त हैं। ये गुलाबी मंदिर और उनके सुनहरे कलश जैसे आध्यात्मिक स्वर्ग स्थान का अहसास दिलाते हैं। मंदिर प्रतिष्ठान और गौशाला परिसर का दूर से दर्शन करने पर पूरा स्थान पिंकसिटी समान नजर आता है। सोने पे जैसे सुहागा, उद्यान और जलाशय – दोनों से इस स्थान का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्तव कई बढ़ जाता है|

इस तीर्थ की पानी की आवश्यकता की पूर्ती हेतू चेक डेम बनवाया गया है। जिस में बारिश का पानी संग्रहित होता है और आवश्यकता नुसार पुजा एवं पक्षाल में इस्तमाल किया जाता है।

इस तीर्थ की प्रत्येक व्यवस्था का आयोजन और डिजाईन यहाँ आनेवाले सभी भक्तगणों की सुविधा और आराम को मध्ये नजर रखते हुए किया गया है ताकी वे यहाँ की मानसिक शांति और मधुर स्मृतियाँ ले कर वापस लौटें|


Sirohi

 

अरावली की सिरणवा नामक पर्वतमाला के आँचल में बसने से मक्षर का नाम सिरोही पड़ा| सीर+रूही = तलवार (अर्तार्थ सीर को काटने वाली) सिरोही तलवार का पर्याय है| यहाँ की तलवार कटार और शमशीर प्रसिद्ध रही है| सन १३११ में सर्व प्रथम देवड़ा चौहान राव लुम्भाजी ने अपना राज्य स्थापित किया व वे यहाँ के राजा बने| सन १३२० में राव सहस्त्रमल को अक्षय तृतीया के दिन सिरोही दुर्ग का निर्माण कार्य प्रारंभ किया किंतु उनके पुत्र राव लाखा ने दुर्ग का कार्य पूर्ण करवाया था| राजा सहस्त्रमल से लेकर अंतिम राजा अभयसिंहजी तक कुल २८ राजा हुए| परंतु महाराव सुरताण अत्यंत विख्यात हुए| अपने ५१ वर्ष के शासनकाल में ५२ लड़ाइयाँ लड़ी जिसमे सन १५८३ का दताणी खेत युद्ध इसलिए प्रसिद्द हुआ की उस युद्ध में मुग़ल सेना को हराया|

 

VIJAY-PATAKA mandir

श्री विजय पताका पार्श्वनाथ प्रभु

VIJAY-PATAKA-mulnayak

वर्तमान सार्वजनिक चिकित्सालय की नींव २१ दिसंबर १८९६ को रखी गई व १९२७ में बिजलीघर का निर्वाण हुआ|सन १८९९ में भीष्ण अकाल पड़ा जिसका सामना सिरोहीवासियों ने बड़े धेर्य ओर हिम्मत से किया|

सिरोही में अपने जैनों के करीब १५०० घर है| यहाँ संस्कृति और शूरवीरता का उत्तम सामंजस्य रहा है| यहाँ का इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है| इस क्षेत्र में आबू देलवाडा के जैन मंदिर विश्व विख्यात है| सिरोही शहर में कुल २५ जैन मंदिर है जिनमें से १४ मंदिर एक ही गली में एक कतार में है| जो अपने आप में एक इतिहास समेटे हुए है| एक ही गली में इतने सुंदर जैन मंदिर एक साथ होने के कारण अर्द्ध शत्रुंजय के नाम से अलंकृत किया गया है| यहाँ के राजा एवं रानियों को जैन मंदिर के प्रति अटूट श्रद्धा थी| जैन मंदिरों में दर्शनार्थ आया करते थे| श्री आदेश्वरजी मंदिर की प्रतिष्ठा सिरोही स्थापना से पहले विक्रम सं. १९३९ आषाढ़ शुक्ल ३ मंगलवार को हुयी थी |

1-Adeshwar-ji mandir

श्री आदेश्वर मंदिर

2-Adeshwar-ji mulnayak

सिरोही की स्थापना विक्रम सं. १४६० ई. सं. १४०३ में सिरवणा के पूर्वी ढाल खोबा में महाराज शिवभाण शोभाजी ने की थी| उन्होंने विक्रम सं. १४७५ में थूमब की वाडी श्री जैन संघ सिरोही को अर्पित की थी जिसके शिलालेख में इस प्रकार अंकित है| वर्तमान सिरोही की स्थापना विक्रम सं. १४८२ वैशाख सूद २, गुरुवार को महाराज सहस्त्रमल ने सीरवणा की पश्चिम ढाल पर की थी|

3-NAMI-NATH-JI1 mandir

श्री नमिनाथजी मंदिर

4-NAMI-NATH-JI mulnayak

सिरोही के आसपास कलात्मक जैन मंदिर एवं तीर्थस्थान है| जैसे की मीरपुर, पावापूरी, बामनवाडजी, नांदिया, वरमाण. जीरावाला, जखोड़ा, सुमेरपुर के पास पहाडियों में है| सिरोही रोड जाने वाली सड़क के दायी ओर महाराजा स्वरुपसिंहजी के समय से निर्मित तीनमंजिला सुन्दर महल स्वरुपविलास है| रामपुर मार्ग पर वर्तमान राजघरानें का निवास केसर विलास केसरीसिंहजी ने बनवाया था| सिरोही शहर का शीर्ष स्थल राजमहल सीरवणा पर्वतमाला की गोद में स्तिथ है|

5-sambhaw-nath-ji mandir

श्री संभवनाथजी मंदिर

6-sambhaw-nath-ji mulnayak

सिरोही में कई प्राचीन ऐतिहासिक बावड़ियां बनी हुई है उसमें खारी बावड़ी जो १३वि सदी की है| दूसरी अन्य बावडियों में रतनवाव, चम्पावाव, झालरावाव, सरजावाव, छगवाव आदि करीब २५० वर्षों से भी अधीक पुरानी है| सारनेश्वर दरवाजे के बाहर निरोड़ा तालाब के पास से मात्रुमाता एवी मंदिर जाने का पर्वतीय रास्ता है|

8-shanti-nath-ji temple

श्री शांतिनाथजी मंदिर

7-shanti-nath-ji mulnayak

यहाँ के महाराजा उम्मेदसिंहजी ने सन १८६३ में राज्य भर में सती प्रथा बंद करवायी और सन १८६६ में सिरोही में दीवानी तथा फ़ौजदारी अदालते स्थापित की| महाराज शिवसिंहजी ने अंग्रेजों साथ संधि की थी व उनका एक पॉलिटिकल एजेंट लगाया|चौधरी लेन स्तिथ सिरोही की स्थापना का साक्षी पत्थर जिसे महावत सहस्त्रमल ने लगा कर सिरोही की स्थापना की थी, वर्तमान में उसे शीशाजी के रूप में पूजा जाता है|

AMBESHWAR-JI-1 mandir

श्री अम्बेश्वर मंदिर

 

सिरोही क्षेत्र की बाली मारवाड़ी, मेवाड़ी, गुजराती का मिश्रण है| यहाँ के मेले, तीज त्यौहार, गणगौर, काका काजरा, गरबा, नृत्य के समारोह व अन्य त्योहार यहाँ की संस्कृति की विशिष्ट पहचान है| उसके अतिरिक्त होली, दीपावली, दशहरा, राखी, पर्युषण महापर्व इत्यादि बड़े हर्षोल्लास से मनाए जाते है| मेलों शादी-विवाह वीर पुरुषों एतिहासिक पात्रों से संबंधित पहाड़ों से उतरते हुए मधुर स्वरों में लोकगीत भी गाए जाते है| गुजरात के नजदीक स्तिथ होने से खान पान, वेशभूषा एवं बोली पर कुछ गुजराती प्रभाव भी देखने को मिलता है|

भीनमाल

राजस्थान की गौरव धरा में भीनमाल शहर की गणना देश के प्राचीन नगरों यथा दिल्ली, विदिशा, श्रुंगवेरपुर, द्वारिका, उज्जैन, अयोध्या आदि में की जा सकती है। यह नगर अनेक बार बसा और नष्ट हुआ – कभी प्रकृति की विभीशका से तो कभी विदेशी आक्रान्ताओं से । मगर इसकी जिजिविशा ने उसको पुनः पुनः संवारा है।

भीनमाल नगर की स्थापना किसने तथा कब की इसका कोई प्रमाण या सर्वसम्मत मान्यता उपलब्ध नहीं है। कुछ की मान्यता है कि ईसा पूर्व ५३५ में जब सिंध – सौवर राज्य, जिसकी राजधानी वीतभयपत्तन थी, में भयंकर प्राकृतिक प्रकोप हुआ जिसके कारण बडी संख्या मे लोग पलायन कर यहा आ बसे व इस स्थान को सुविधाजनक पाकर यही बस गये। दुसरी मान्यता उसी क्षेत्र पर शक आक्रमण के पश्चात हुये पलायन से जुडी़ हुई है। कुछ संदर्भ यह बतलाते है की कि यहॉ कभी भीलो की बसती हुआ करती थी जो विस्तार पाकर भीलमाल या भीनमाल या भीनमाल नगर में बदल गईं। भीनमाल की स्थापना, नामकरण व इसके विस्तार के बारे में विस्तृत मगर अतिरंजीत सूचनरऐं श्रीमालपुराण, जो स्कन्धपुराण का ही एक भाग है, से प्राप्त होती है। इसके अनुसार इसकी रचना विष्णु के आदेश पर विश्व्कर्मा ने की थी । विभिन्न मान्यताओं से परे हटकर हम इतना तो निश्चित रुप से कह सकते है कि भगवान महावीर के समय तक यह नगर स्थापित हो चुका था।

संवत २०१३ में किये गये उत्खनन मे यहॉ से कुशान काजीन हथियार, रोमन घडा आदि प्राप्त हुए हैं जो इस नगर की प्राचीनता को प्रमाणित करते है। दो दशक पुर्व की गई खोज के आधार पर यह माना जा रहा है कि देश की प्रमुख व प्रवित्र नदी सरस्वती, जो अब विलप्त हो गई है, कभी भीनमाल क्षेत्र में प्रवाहित होती थी तथा यहॉ प्राचीन जलमार्ग था। इसके इतिहास से सरोकार रखने वाले तथ्य हमें प्राचीन पुस्तकों, शिलालेखों, वंशावलियो व पटटावलियों, ऐतिहासिक, धार्मिक साहित्यिक रचनाओं, पुराविदों, इतिहास व भूगोलविदो दवारा किये गये शोध प्रबधों तथा विदेशी यात्रियों के वृतांतो में मिलता है। श्रीमालपुराण, प्रबंध चिन्तामणी, कुवलयमाला,निषिथचूर्णी, विमलप्रबंध, भोजप्रबंध, विभिन्न तीर्थमालाओं में इस नगर का उल्लेख है। विदेशी यात्रियों सातवी सदी में व्हेनसांग, ११ वीं में अल्बेरुनी तथा १७ वीं सदी के प्रारंभ में पुफलेट ने भीनमाल का अवलोकन किया था व अपने यात्रा वृतांत में इसका विवरण दिया। बाम्बे गलेटियर (सन १८९१) में इसके खण्डहरों का विवरण तथा इस नगर से संबधित जनश्रुतियों का रोचक संकलन किया गया है।

जितना पुराना यह नगर है उतनी ही पुरानी व यशस्वर यहॉ की जैन परम्परा रही है। एक लेख के अनुसार भगवान महावीर स्वयं भी  यहॉ आऐ थे मगर इसकी पुष्टी किसी अन्य संदर्भ से नहीं होती। इस नगर में जैन धर्म की प्रभावी आहट हमें वीरनिर्वाण संवत ५२ या ५७ में सुनाई पडती है जब विभिन्न बाधाओं को पार करते हुए तीर्थकर भगवान पर्श्वनाथ की पंचम पटटधर स्वयंप्रभसूरि ने इस नगर के राजा जयसेन तथा प्रजा के एक बडे भाग को प्रतिबोधित कर जैनमत का अनुयायी बनाया था व इस नगर में जैन धर्म की नींव डाली थी। इसके पश्चात इस परम्परा के आचार्यो का निरन्तर आगमन इस क्षेत्र में होता रहा ।

यहॉ भगवान पर्श्वनाथ व महावीर के विशाल मंदिरों का निर्माण हुआ जिनकी चमत्कारी प्रतिमाओं के कारण इस नगर को तीर्थरुप में मान्यता मिली। हूण राजा तोमाण, जिसने इस नगर को अपनी राजधानी बनाया, पार्श्वनाथ परपंरा के आचार्य हरिगुप्तसुरी द्वारा ही प्रतिबोधित हुआ था। एकाध अपवाद को छोडकर यहॉ के पष्चातवर्ती राजा भी जैनधर्म के प्रति उदार रहे व जैन संस्कृती को प्रज्जवित होने का पूर्ण अवसर मिला है।

प्राचीन पटटावली व आचार्यो के जीवनवृत्तों से जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार भीनमाल में समय – समय पर अनेक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ था जो कालक्रम में प्राकृतिक कारणों से या विदेशी आक्रान्ताओं के कारण नष्ट हो गये। इन मंदिरों के अस्तित्व का पता हमें उस समय लिखी गई रचनाओं से लगता है। इन मंदिरों की भव्यता के कारण ७-८ वीं सदी में भीनमाल की गणना तीर्थरुप में होने लगी थी। आचार्य उद्योतनसूरी ने ‘कुवलयमाला’ (वि‐ स‐ ८३५) में अपनें गुरु की भीनमाल के यात्रा का उल्लेख किया है। ‘उपमितिभवप्रपंचाकथा’ (वि‐ स‐ ९६२) में भीनमाल के मंदिर का उल्लेख इस प्रकार किया गया है – “जहॉ अतुलनीय रथयात्रा महोत्सव से वर्धित, अखिल देवभवनों के मध्य में श्रेष्ठ उन्नत जयपताका से विभूषित और सतत प्रमुदित करने वाला जिनेन्द्र भगवान का मंदिर विद्यमान है।” आचार्य सिव्दसेनसूरी के ‘सकलतीर्थस्तोत्र’ के अनुसार यहॉ छः जैन मंदिर थे। पं. कल्याणसागर ने ‘पार्श्वनाथ चैत्य परिपाटी’ में यहॉ के गोडी पार्श्वनाथ को सुख का दातार बतलाया है। ११ वीं सदी के महाकवि धनपाल ने ‘सत्यपुरीय महावीर उत्साह’ स्तोत्र में इसकी गणना मुख्य तीर्थो में की है।

पं. शीलविजय कृत ‘तीर्थमाला’ ( सं‐ १७४६) में यहॉ की पार्श्वप्रतिमा को “भिनमाल भयभंजनाथ” का संबोधन दिया है। उपाध्याय मेघविजय ने ‘पार्श्वनाथमाला’ में भीनमाल के सौंदर्य का उल्लेख किया है। अचनगच्छीय आचार्य महेन्द्रसूहर ने सं‐ १४४४ में ‘तीर्थमाला प्रकरण’ की रचना की थी। इसमें भीनमाल को तीर्थ बतलाया है। इसीप्रकार जीनप्रभसूरि ने ‘विविध तीर्थ कल्प’ में इसे भगवान महावीर का तीर्थ कहा है। यहॉ पर प्रतिष्ठित भगवान महावीर की धातुमय प्रतिमा सौराष्ट्र से उस वक्त लाई गई थी जब वल्लभीपूर यवनों व्दारा सं‐ ८४५ में लुटा गया था। इस विशयक एक लेख भी प्राप्त हुआ है। यहॉ की पार्श्वनाथ प्रतिमा को जो एक मंदिर स्थापित थी, मलेच्छो के भय से छिपा दी गई थी, सं‐ १६५१ में खुदाई के दौरान प्राप्त हुई। इसको पुनः स्थापित किया गया। इस प्रतिमा के चमत्कारों के कई किस्से प्रचलित है।

भीनमाल की जैन परम्परा एक गुलदस्ता है जिसमें सभी गुच्छों के फूल लगे है। यह नगरी विभिन्न आचार्यो की चरणरज से पवित्र तथा प्रभावी हूई है। यहॉ अनेको आचार्यो का जन्म तथा स्वर्गवास हुआ जिनमें जैन शासन की प्रभावना करने वाले आचार्य इन्द्रदेवसूरी, शिवचन्दगणी महत्तर, आ. दुर्गस्वामी, आ. सिद्वर्शि, आ. वीरसूरी, वाचनाचार्य वीरगणी, आ. देवगुप्तसूरी, आ. सिध्दसूरी, आ. धर्मप्रभसूरी, आ. अमररत्नसूरी, आ. भावसागरसूरी, आ. ज्ञानविमलसूरी प्रभावकमुनि न्यायसागर, आ. महेन्द्रसूरी आदि नाम शामिल है। विक्रम की पहली शताब्दी में सुधर्मास्वामी के आठवे्र पट्टधर प्रजस्वामी के इस क्षेत्र में भ्रमण करने के उल्लेख मिलते है। शंखेष्वरगच्छ के चिभिन्न आचार्यो ने भी भीनमाल को आपनी कर्मभूमि बनाया । दशवी में सिध्दश्री व दुर्गस्वामी व उनके शिष्यों ने इस क्षेत्र मे धर्मप्रभवना की। १४ वीं सदी में खरतरगच्छ के आचार्यो का आगमन हूआ। आ‐जिनेश्वरसूरी व्दारा यहॉ प्रतिष्ठा करने व दीक्षा देने के उल्लेख मिलते है। आ. जिनबोधसूरी, आ. जिनचंद्रसूरी, तथा जिनपालोपाध्याय ने भी इस क्षेत्र में भ्रमण किया है|

अचलगच्छ का भीनमाल से अति निकट का संबध रहा । गच्छप्रणेता आर्यरक्षितसूरी का प्रथम श्रावक यशोधन भीनमाल का ही मूल निवासी था। इस गच्छ के आचार्यो एवं साधू – साध्वियों का निरन्तर आगमन इस क्षेत्र में बना रहा। भीनमाल ने इस गच्छ को योग्य आचार्य भी दिये है। ताजे इतिहास में 20 वी सदी के महानायक आ. राजेन्द्रसूरी ने इस नगर में प्रभावी प्रभावना की। विचारधारा की निकटता के कारण अंचलगच्छ से प्रभावित इस क्षेत्र ने राजेन्द्रसूरी को सहज रुप से अपना मार्गदर्शक स्वीकार कर लिया। आज भीनमाल के लगभग प्रत्येक जैन मंदिर में उनकी प्रतिमा स्थापित है। इस गच्छ के अन्य आचार्यो व साधुओं द्वारा भी इस क्षेत्र मे नियमित भम्रण हुआ। आचार्य हेमेन्द्रसूरी की दीक्षा तो इसी नगर में हुई थी। गच्छ के पुर्व आचार्य द्वारा भी इस नगर में प्रतिष्ठाऐं व दीक्षाओं के मांगलिक कार्य हुए है।

भीनमाल जैन समाज की पोरवाल श्रीमाल जातियों का उदय स्थल है जैसा कि ओसिया नगर को ओसवालों का स्थापना नगर माना जाता है। भगवान महावीर यद्यपि वर्ण व जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करते थे मगर धर्म पालन की दृष्टी से आचार्यो ने सामालिक आधार बनाना आवश्यक समझा था। यह कहा जाता है कि आचार्य रत्नप्रभसूरी ने जब भीनमालवासियों को प्रतिबोधित किया था तो उस समय जो लोग नगर के पुर्वभाग में निवास करने वाले कोटयाधिपति थे, वे प्राग्वाट और आगे चलकर पोरवाल श्रावक कहलाने लगे तथा जो अपेक्षाकृत कम धनवान थे वे श्रीमाल श्रावक कहलाये।

जैन परंपरा में अनेक गच्छो का उदय हुआ है। उनमें एक ‘भीनमाल गच्छ’ भी है। यद्यपि इसका जन्म कब तथा कैसे हुआ तथा यह किस गच्छ की शाखा थी- यह स्पष्ट नहीं है मगर माण्डव के तारापुर, तारंगा की कोटीशिला, पाली के नोलखा मंदिर आदि स्थलों के मूर्तिलेख इसके अस्तित्व को प्रमाणित करते है। इसी प्रकार कुछ रचनाओं की प्रशस्तियों व लेखों में ‘भीनमाल कुल’ का उल्लेख मिला है। पार्श्वनाथ परम्परा जो उपकेशगच्छ कहलाती है, में भीनमाल शाखा का प्रारम्भ भी इसी नगर से हुआ था।

बाहय आक्रमण, आंतरिक राजनीतिक परिवर्तन, व्यवसाय या अन्य व्यक्तिगत कारणों से कई परिवार भीनमाल छोडकर अन्यत्र जा बसे। इन भीनमाल पुत्रों व उनके वंशजों ने उनके नये स्थानें पर भी अपने कुल व धर्म का गौरव बनाये रखा व जैन धर्म की प्रभावना में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। यह परम्परा आज भी अविरत है व जैन तीर्थों कि विकास में इनका सर्वाधिक योगदान है। अभी हम कुछ ऐतिहासिक व्यक्तीयों का ही उल्लेख कर रहे है। महामात्य निन्नक , जिसने तथा जिनके वंशजों ने वनराज चावडा तथा उसके पश्चातवतह राजाओं के शासनकाल में महामात्य, दण्डनायक जैसे महत्वपूर्ण पद प्राप्त किये, मूलतः भीनमाल के ही वासी थे। निन्नक ने पाटक तथा नारंगपुर में, उसके पुत्र लहर ने सांडेरग्राम में मंदिरों का निर्माण किया। इन्हीं कि वंशज वितनशाह हूए ,जिसने आबू में विश्वप्रसिध्द ‘विमलवसिंह’ का निर्माण वि‐ सं‐ १०८८ में किया था। कासिन्द्रा के रमणीय मंदिर के निर्माता गोलच्छी पुत्र जज्जूक भी भीनमाल के निवासी ही रहे थे जिसका उल्लेख मंदिर के शिलालेख में हुआ है। ‘भीनमाल कुल ’ के शांति नामक आमात्य ने अणहिलपाटन में मंदिर बनवाया था। अचलगच्छ पट्टावली तथा अन्य सूत्रों से पता चलता है कि भीनमाल से जासर अन्यत्र बसे श्रेष्ठियों ने बडोदा, नाहपा, भारोल, सिरोही, जालोर, चित्तोड, बाडमेर, पाटण, मियांगोव, वरकाणा आदि नगरों में मंदिरों तथा प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा करवाई थी।

भीनमरल साहित्य साधना का भी केंद्र रहा है। यह पर कभी विद्या की पीठ थी। इसकी तुलना उस समय विव्दानों के केन्द्र रहे उज्जैन व धारानगरी से की जाती थी। भीनमाल को मारवाड की धारानगरी कहा गया है। यहॉ जैन व जैनेतर विपूल साहित्य की रचना की गई।‘उपमितिभवप्रपंचा कथा का अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ तथा जिसको आधार बनाकर कई ग्रंथ लिखे गये है, की रचना इसी नगर में सं‐ ९६२ में जैनाचार्य सिध्दर्षि ने की है।

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श्री लक्ष्मीवल्लभ पार्श्वनाथ ७२ जिनालय महातीर्थ |

भीनमाल को उसका पुराना वैभव पुनः लौटाने के लिए अनेक श्रेष्ठी अपनी संपदा का सदुपयोग कर रहे है। विगत वर्षो में यहॉ न केवल जीर्णोध्दार हूए है वरन नयें स्थापत्यों का निर्माण भी हुआ है। बाफनावाडी क मंदिर भी ऐसा ही नव निर्माण है । यहॉ धर्मशाला तथा भेजनशाला की सूविधा भी उपलब्ध है। एक और भव्य जिनालय की निकट में ही प्रतिष्ठा होने वाली है जो ‘लक्ष्मी वल्लभ पार्श्वनाथ ७२ जिनालय’ के नाम से जाना जाएगा। आचार्य हेमेन्द्रसूरी तथा इस लेखक की प्रेरणा व मार्गदर्षशन में निर्मित यह मंदिर इस क्षेत्र का प्रथम ‘बहत्तर जिनालय’ होगा जिसमें गत, वर्तमान तथा आगत चैबीसी तीर्थकरो की प्रतिमाऐं प्रतिष्ठीत की जाएगी। इस मंदिर में मंदिर धर्मशाला, उपाश्रय आदि बनकर तैयार है। साथ ही एक विशाल पुस्तकालय एवं संग्रहालय का निर्माण विचाराधीन है। इस मंदिर का निर्माण श्रेष्ठीवर्य स्व. हजारीमल सूमेरमल लूकंड परिवार द्वारा करवाया गया हैं।

– मुनि श्री ऋषभचंद्रविजयजी

श्री ७२ जिनालय तीर्थ(भीनमाल)

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मंदिर का दृश्य |


 भीनमाल नगर की वंसुधरा पर निर्मित देश के प्रथम 72 जिनालय तीर्थ आज जिस भव्यातिभव्य रुप में सब के सामने है इसकी भी एक कहानी है, वर्ष 1991 में भीनमाल के बैंक रोड पर लुंकड परिवार द्वारा निर्मित हंजारी भवन से जुडे हुए श्री मनमोहन पार्श्वनाथ भगवान के जिनालय की प्रतिष्ठा के लिये गच्छाधिपति राष्ट्रसंत शिरोमणी आचार्य देवेश श्री हेमेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा का भीनमाल आगमन हुआ। इसी दौरान प्रतिष्ठा उपरान्त मुनिप्रवर श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म.सा. को गुरुदेव की प्रेरणा से संकेत प्राप्त हुआ कि भीनमाल नगर में एक ऐसे भव्यतम महातीर्थ का निर्माण होना चाहिये जिसका कोई सानी न हो। अपने अंतःकरण की प्रेरणा को मुनिप्रवर ने चर्चा के दौरान बताया तो वहाँ उपस्थित श्री सुमेरमल जी लुंकड, सुआबाई लुंकड एवं रमेश जी लुंकड सहित लुंकड परिवार ने मुनिप्रवर की प्रेरणा को सर आखों पर ले कर इस स्वप्न को हकीकत में बदलने का बीडा पूरी निष्ठा और लगन से उठाया।

ज्योतिष एवं वास्तु के महारथी मुनिप्रवर ने जिनालय निर्माण हेतु योग्य भू-भाग का चयन किया। प्रारम्भिक चरण की कार्यवाही पूर्ण होने के बाद जिनालय निर्माण को भव्यता प्रदान करने हेतु रुप रेखा बनाई जाने लगी। मुनिप्रवर श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म.सा. मंदिर निर्माण के जिस उंचे लक्ष्य को लेकर अद्वितीय अप्रतिम भव्यता प्रदान करने के लिये कल्पना लोक के सागर में गहराई से मंथन कर रहे थे। लुंकड परिवार के पितृ पुरुष श्री सुमेरमल जी लुंकड और उनकी धर्मपत्नि श्रीमती सुआबाई लुंकड भी उतनी ही तन्मयता के साथ मजबूत आत्मविश्वास और दृड संकल्प के साथ हम कदम हो कर सच्चे गुरु भक्त होने का फर्ज पूरा कर रहे थे।

संवत 2053 वैशाख सुदी 14 दिनांक 2 मई 1996 का वह शुभ दिन वह शुभ घड़ी आई जब बड़े धुमधाम से इस महातीर्थ की नींव शिलान्यास के साथ रखी गई। अवसर था राजगढ़ निवासी मनीष कुमार महेन्द्र कुमार जी भंडारी के दीक्षा महोत्सव का आचार्य भंगवत श्री हेमेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आदि मुनि मंडल एवं साध्वी मंडल की शुभ निश्रा में भीनमाल नगर में दीक्षा महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया लुंकड परिवार के श्री सुमेरमल जी एवं सुआबाई लुंकड ने नव दीक्षित मुनिराज श्री रजतचन्द्रविजयजी म.सा. के धर्म माता पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त किया, इसी अवसर पर शुभ मूहूर्त में इस महातीर्थ का शिलान्यास बडे़ धूमधाम से सम्पन्न हुआ।

जैन धर्म के वर्तमान आगत और अनागत तीर्थकरों के आधार पर निर्मित भारत वर्ष के प्रथम 72 जिनालय में त्रिकाल चौविसी के तीर्थंकरों की प्रतिमाओं के साथ गणधर, गुरुदेव, एवं अधिष्ठायकों का दर्शन पूजन का लाभ एक साथ मिल सकेगा।

प्राकृतिक परिवेश में हरियाली से आच्छादित इस जिनालय में जो कि सर्वतोभद्र श्रीरेखा पर निर्मित है, सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है। सुंदर कलाकृतियों से परिपूर्ण यह जिनालय रणकपुर एवं देलवाडा मंदिर की याद दिलाता है।

देवयोग से 3 मार्च 2008 एवं 4 सितम्बर 2009 को लुंकड परिवार के बासा एवं माजियां सा का अचानक अंरिहत शरण हो गया। इसके बावजूद लुंकड परिवार ने मंदिर निर्माण पर कोई असर नहीं पडने दिया एवं श्री किशोरमलजी लुंकड, श्री माणकमलजी लुंकड एवं रमेशजी लुंकड ने बा सा एवं माजिया सा की नव निर्मित जिनालय की भव्य प्रतिष्ठा कराने की अधूरी इच्छा को पूरा करने में किसी प्रकार की कोई कसर बाकी नहीं रखी।

– मुनि ऋषभचंद्रविजयजी


 

श्री लक्ष्मीवल्लभ पार्श्वनाथ 72 जिनालय तीर्थ:

 

अतीत कालीन २४ तीर्थंकर               वर्तमान कालीन २४ तीर्थंकर            अनागत कालीन २४ तीर्थंकर

श्री केवलज्ञानीजी                     श्री ऋषभदेवजी                   श्री पद्मनाभस्वामीजी

श्री निर्वानिनाथजी                    श्री अजितनाथजी                      श्री सुरदेवस्वामीजी

श्री सागरनाथजी                       श्री संभवनाथजी                        श्री सुपार्श्वनाथजी

श्री महायषजी                        श्री अभिनंदनस्वामीजी              श्री स्वयंप्रभस्वामीजी

श्री विमलप्रभजी                       श्री सुमतिनाथजी                श्री सवार्नुभूतिस्वामीजी

श्री सवार्नुभतिस्वामीजी               श्री पद्रमप्रभुस्वामीजी                श्री देवश्रुतस्वामीजी

श्री श्रीधरस्वामीजी                      श्री सुपार्श्वनाथजी                      श्री उदयस्वामीजी

श्री दत्तस्वामीजी                      श्री चंद्रप्रभुस्वामीजी                   श्री पेठालस्वामीजी

श्री दामोदरस्वामीजी                 श्री सुविधिनाथजी                 श्री पोहिलस्वामीजी

श्री सुतेजाप्रभुजी                   श्री शीतलनाथजी               श्री शतकीर्तिस्वामीजी

श्री स्वामीनाथजी                        श्री श्रेयांसनाथजी                      श्री सुव्रतनाथजी

श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी          श्री वासुपूज्यस्वामीजी                   श्री अममनाथजी

श्री सुमतिनाथजी                श्री विमलनाथजी            श्री निशकशायस्वामीजी

श्री षीवगतिनाथजी             श्री अनंतनाथजी             श्री निशपुलाकस्वामीजी

श्री असत्यागस्वामीजी             श्री धर्मनाथजी                   श्री निर्ममस्वामीजी

श्री नामिश्वरस्वामीजी            श्री शांतिनाथजी               श्री चित्रगुप्तस्वामीजी

श्री अनिलनाथजी                     श्री कुंथुनाथजी               श्री समाधिनाथस्वामीजी

श्री यशोधरस्वामीजी                श्री अरनाथजी                       श्री संवतस्वामीजी

श्री कृतार्थनाथजी                  श्री मल्लिनाथजी                श्री यशोधरस्वामीजी

श्री जिनेश्वरस्वामीजी              श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी                  श्री विजयस्वामीजी

श्री षुद्धमतिस्वामीजी               श्री नमीनाथजी                     श्री मल्लीस्वामीजी

श्री शिवंकरस्वामीजी                 श्री  नेमिनाथजी                    श्री देवजिनस्वामीजी

श्री स्यनन्दस्वामीजी              श्री पार्श्वनाथजी            श्री अन्नतवीर्यस्वामीजी

श्री संप्रतिस्वामीजी                श्री वर्धमानस्वामीजी                 श्री भद्रंकरस्वामीजी


Jain Postal Stamp

 

3108/11/2009 – Veerchand Raghavji Gandhi


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27/06/2009 – World Classical Tamil Conference( Sant Thiruvallar)


3330/04/2011 – Saadhviji Mahasati Umrao Kunwar “Archana”


3407/07/2011 – D.S. Kothari (Famous Jain Scientist)


stamp of godiji temple, mumbai

2012 – Godiji Temple, Mumbai


3523/08/1979 – East Germany (Bhagwan Mahavir)


3606/04/2006 – Nepal – World Hindu Federation(Jain Pratik)


3720/01/2007 – Cango – World Religion Day(Jain Pratik)


3831/12/1957


3914/12/2008 – Vikram Ambalal Sarabhai


4025/09/2011 – Jalmalji Maharajji


14/12/2016 – Digamber Aacharya Shree Vimal Sagarji Maharaj


30/6/2017 – Shreemad Rajchandraji (Jainism New Postal Stamp – 2017)


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25/04/2002- Coins Issued by Government of India on the occasion of 2500th anniversary of  Lord Mahavir

 

 

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Jain Postal Stamp

Jain Postal Stamp & Covers

Aacharya Anand Rishi Maharaj - Jain Postal Stamp & Covers09/08/2002 – Acharya Anand Rishi Maharaj

Acharya Anand Rishiji Maharaj was born at Ahmednagar (Maharastra) in August 1900 and at the age of 13, committed himself to a life of spiritual pursuits and service to humanity. He was proficient in nine languages and Mastered the Jain Scriptures as well as ancient philosophical texts of Sanskrit language. His teachings were deep rooted in love, non-violence and tolerance. He had founded numerous educational and religious institutions. He was bestowed with the title of “Acharya” in the year 1965 and died in the year 1992. On his Birth centenary a stamp was issued on 1st august 2002.


Jain Postal Stamp & Covers27/05/2004 – Dr. Indra Chandra Shastri

A stamp was issued on 27th May 2004 on great philosopher and exceptional author Pro. Dr. Indra Chandra Shastri. He was a pursuer of individual spiritualism who was inspired by Jain Anekanta. Born on May27, 912 at Dabwali Mandi (Haryana). He campaigned against Bal Diksha, a practice of forcible adoption of poor children by Jain ascetics in Rajasthan, prevalent in those days. This resulted in the tabling of a bill in the Assembly of Bikaner. As recognition of his pioneering efforts and creative talent, he was awarded the ‘Sahitya Seva Samman’, by the Hindi Academy, ‘Sahitya Ratna Alankaran’ by the Vice-Chancellor of Delhi University and ‘Certificate of Honor’ by the President of India. Dr. Indra Chandra Shastri passed away on November 3, 1986.


Aacharya Bhikshu - Jain Postal Stamp & Covers30/06/2004 – Terapanth Aacharya Bhikshu

Founder of the Jain Swetamber Terapanth Sect Acharya Bhikshu was a philosopher saint, perceptive writer, sensitive poet and social reformer. He composed about 38000 shlokas and his writings have been compiled in two volumes as “Bhikshu Granth Ratnakar”. He was born on the thirteenth day of the Ashad in the Vikram Samvat year 1783, in the village Kantaliya (Rajasthan). He took to ascetic life under the guidance of Acharya Raghunathjiand established the Terapanth religious Sangha on 28th June 1760. He attained eternal bliss in the Vikram Samvat year 1860 at Siriyari, Rajasthan. On 30th June 2004, Indian Postal department has issued a stamp on him.


Walchand Hirachand - Jain Postal Stamp & Covers23/11/2004 – Walchand Hirachand (Famous Jain Industralist)

The visionary Jain industrialist Walchand Hirachand was pioneer of India’s automobile, shipping and aircraft manufacturing sectors. He was a dreamer, a visionary, a great builder, a great leader of industry. Above all, he was a patriot, and in his own way, he was an inspiring leader of our struggle for freedom. To mark his 121st birth anniversary, Rs.5 postage stamp was released on 23rd Nov. 2004.


2502/12/2005 – Jawaharlal Darda(Politician & Journalist)

Famous Jain personality of Maharashtra, late Mr. Jawaharlal Darda was a veteran freedom fighter, Congress leader and founder of the Lokmat group of newspapers. Born on 2 July 1923, Mr. Darda joined the freedom struggle at the age of 17 and participated in the Quit India Movement in 1942. He launched “Nave Jag”, a weekly newspaper in the year 1947 and “Lokmat” in 1952. He made a mark in the governance in Maharastra by his admirable handling of the portfolios of energy, industry, irrigation, health, food and civil supplies, sports, youth affairs, textiles and environment as a Minister. This stamp was issued on 2nd Dec. 2005.


2608/12/2008 – Dr. Lakshmimal Sanghvi(Eminent Scholar)


2721/12/2009 – Jain Acharya Vallabh Suriji


2828/02/2009 – Harakchand Nahata


2914/10/2009 – Ranakpur Jain Temple


3014/10/2009 – Dilwara Jain Temple

 

 

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Jain Postal Stamp

 

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1109/05/1988 – Dr. Karmaveer Bhaurao Patil(Jain Social Reformer and Educationalist)

Famous Jain philanthropist Dr. Karmveer Bhaurao Patil devoted his whole life to the task of rural mass education and upliftment and welfare of the depressed and down trodden, emphasizing the removal of untouchability and advocating equality. A stamp was issued on 9th May 1988 in his honor.


1224/08/1991 – Jain Muni Mishrimalji

Spiritual Saint and Philosopher Jain Muni Mishrimalji was a profound orator. He had written in lot of literature in Sanskrit, Hindi, Urdu, Prakrit and Rajasthani languages. More than 5000 pages of prose and poetry are there to his credit. He fought against Socio-religious superstitions, evil practices and led Social reformation movement. A stamp was issued in his memory on 24th August 1991.


RishshabDev Bhagwan (Baroda Mueseum) -  Jain Postal Stamps20/12/1994 – Baroda Museum- Bronze Idol of Bhagwan Rishabhnath(se-tenant)

A `se-tenant pair’ (set of two stamps) was issued on 20th December 1994 to celebrate the centenary of Baroda Museum. The se-tenant stamp had the picture of an ancient 6th century bronze statue of Bhagwan Rishabhnath exhibited in the Baroda Museum. Bhagwan Rishabhnath is regarded as the eighth incarnation of Lord Vishnu.


28/01/1998 – Dr. Jagdish Chandra Jain(famous Jain Writer and Educationalist)

World renowned Jain philosopher Dr. Jagdish Chandra Jain was the authority on Jain studies. He had written more than eighty books and received several awards including Soviet Land Nehru Award. He was honored by issuing a stamp on 28th January 1998.


Jain Muni Aacharya Tulsiji - Jain Postal Stamp20/10/1998 – Jain Muni Aacharya Tulsiji

Famous Jain saint Acharya Tulsiji took asceticism at an early age of 11 and at 22 he was appointed Acharya. He launched the “Anuvrat Movement” for reinforcement of human values in life, giving the slogan “Self discipline alone is the life”. He established Jain Vishwa Bharti and took the Herculean task of research on Jain Agamas and published their critical editions in 32 volumes. A stamp was issued on him on 20th October 1998.


Jain Postal Stamp06/03/1999 – Sculpture from Parshvanath Jain Temple, Khajuraho Temples

The Millennium celebrations of the world famous Jain Khajuraho Temples were organized by the Indian government between March 1999 and March 2000. To commemorate the occasion this stamp issued on 6 March 1999 depicts the beautiful lady Apsara removing a thorn from her foot: The original statue is in the Parshwanath Jain Temple of Khajuraho.


Raja Bhamashah -Jain Postal Stamps31/12/2000 – Jain Raja Bhamashah

Jain Raja Danveer Bhamashah was a childhood friend, a colleague and a very faithful advisor of Mewar king Maharana Pratap. Bhamashah’s loyal support was pivotal to the career of Maharana Pratap. When Maharana Pratap was defeated, Bhamashah had given his complete wealth to Maharana Pratap in his fight for India’s freedom, that too at a time when the king had lost all hopes and was hiding in mountains to save his family. On 31st December 2000 Indian Postal Department issued a set of four stamps on historical personalities which included one on Bhamashah.


18 -Jain Postal Stamp06/04/2001 – Bhagwan Mahaveer 2600th Janma Kalyanak

On the occasion of the 2600th Janma Kalyanak (Birth Anniversary) year of the 24th Jain Thirthankara Bhagwan Mahaveer, Indian Postal Department had issued a Rs. 3/- denomination stamp on 6th April 2001. This stamp depicts the unique symbol summarizing Jain teachings of Ahimsa Paramodharma adopted with the words Parasparopagraho Jivanam by all Jain groups.


Jain Historian Chandragupta Maurya -Jain Postal Stamps21/07/2001 – Jain Historian Chandragupta Maurya

On 21st July 2001, a stamp has been issued on the historical Jain ruler Samrat Chandragupta Maurya who stands out as one among the most colorful personalities of Indian history. He conquered many states including Magadha and formed a vast Mauryan Empire with the capital at Pataliputra in 322 B.C. He established a well-organized administrative system and gave it a sound financial base, thus laying the foundation for an enduring empire. During his reign India prospered and developed a lot in the terms of Trade & Commerce, Art & Culture. Becoming disciple of Jain Muni Bhadrabahu Swami, he adopted Jainism.


2018/11/2001 – Jain Film Producer V. Shantaram

On the occasion of Birth Centenary of the pioneer of Indian film industry and renouned Jain Film Producer Shri V. Shantaram a stamp was issued on 18th Nov. 2001. He was born in a reputed Jain family at Kolhapur and honored with ‘Jain Samaj Ratna’ award and also with Padmabhushan in 1992. He has been connected a with various film institutions, being a member of the Film Advisory Board and Central Board of Film Censors. He was the founder President of the Film Producers Guild of India, member of the S. K. Patil Film Inquiry Committee, and founder member of the Children’s Film Society.

 

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