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Dadai

History of Dadai (Godwad – Rajasthan)

दादाई गाँव का परिचय

 

राजस्थान प्रांत के पाली जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर केनपुरा चौराहा से वाया रानी २२ की. मी. , रानी स्टेशन से १० की. मी. और वारकाणा तीर्थ से मात्र ५ की. मी. दूर जाकर माता पहाड़ी की गोद में एक प्राचीन नगर बसा है “दादावसी” अर्तार्थ “दादाई” |

करीब ५०० वर्षो से सुकड़ी नदी के किनारे स्थित इस नगर में भव्य जिनालय के अतिरिक्त श्री जगदंबा माता का प्राचीन देवालय प्रतएक श्रद्धालु के लिए भक्ति भावना का प्रेरनासोत्र है, जहां पिछले दो वर्षो से लगातार अखंड ज्योति प्रज्वलित है और प्रति वर्ष चै. कृष्णा ५ को भव्य मेला आयोजित किया जाता है, जिसकी छटा देखते ही बनती है |अपार जनसमूह देवी दर्शन कर अपने आपको भागयशाली महसूस करता है | इसके अतिरिक्त ग़ाव से एक की.मी. उतर में, छोटी सी पहाड़ी (भाकरी) पर जोकर माता का मंदिर जन-जन की आस्था का मुखय केंद्र है |कहते है की इतिहास प्रसिद्द महाराणा लाखा इसी देवी को अपनी इष्ट देवी मानते थे| 

यह नगर १०वि शताब्दी से भी अधीक प्राचीन है| कहा जाता है की प्राचीन काल में इसकी सीमा बुसी के हनुमान मंदिर तक  फैली हुई थी यानि १२ कोस से अधीक फैली हुई थी |दूसरी तरफ वारकाणा इतिहास से पता चलता है की वारकाणा तीर्थ बिजोवा व दादाई गावो को अपने में समेटे हुआ था |उन दिनों नाडोल पर चौहान वंशजो का अधिकार था| इस शेत्र ने वि. सं. ९४७ से लेकर वि. सं. १६६६ तक कई लड़ाईयां और उतार-चढ़ाव देखे| वारकाणा तीर्थ की व्यवस्था वर्षो तक सिर्फ बिजोवा व दादाई श्री संघ ने संभाली|

वरकाणा तीर्थ के पूर्वी द्वार के सामने हाथी पर सवार जो पुरुष और स्त्री दिखाए गए है , उनके बारे में ऐसा कहा जाता है की यह अददई के उन सेठजी और सेठानी की मुर्तिया है, जिन्होंने इस मंदिर का निर्माण करवाया था| वारकाणा में लगे एक प्राचीन शिलालेख में भी दादाई का उल्लेख मिलता है, जिससे यहां की प्राचीनता प्रकट होती है|

संवत् १५१८ की आषाढ़ सुदी ११ के दिन मेवाड़ के महाराणा कुंभा इस ग़ाव के श्रावण वदि दूज के मेले को अपना सरक्षण दिया एवं सुविधाए देने के लिए श्री संघ के निवेदन पर तत्कालीन ठाकुरसा को इसके लिए आगिया प्रदान की|लेख इस प्रकार है :-

सही/-

“सीध श्री महाराणा श्री कुम्भकर्ण वचनायूत ग़ाव वरकाणाजी माहे सदा श्री पारसनाथजी रे देहरे श्रावण वादी २ लगतो मेलो भराईजे श्री दादाई सकल संघ अरज किधी श्री ठाकुर राज श्री……..संवत 1518, आषाढ़ सुदी ११……”      बाकी लेख टूट गया है और घिस गया है |

Shree Shantinath Temple - Dadai (Godwad - Rajasthan)

उक्त लेख में दादाई संघ व संवत १५१८ इन दिनों को उल्लेख आने से नगर की प्राचीनता प्रकट होती है तथा वारकाणा की व्यवस्था में दादाई संघ की भागीदारी भी साबित होती है | आगे सं. १९३२ में इस तीर्थ हेतु श्री आत्मारामजी महाराज ने भी व्यवस्था को लेकर दादाई संघ से वार्तालाप किया | १५वि शताब्दी का एक प्रमाण प्राप्त होती है की महाराणा कुंभा के समय में भीनमाल के एक धनाढय ने जो दादाई में बसे हुए थे, उन्होंने वारकाणा मंदिर को बावन जिनालय कका रूप दिया | यही रूप इस तीर्थ मंदिर का वर्तमान स्वरुप है |सेठ आनंदजी कलयाणजी पेढ़ी द्वारा सं. २०१० में प्रकाशित ग्रंथ में, दादाई को लेकर दी गई जानकारी निम्नरूपेण है- “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ दादाई ने मुख्य बाजार में शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाकर मुलनायक श्री शांतिनाथजी को वि. सं. १९२१ के लगभग प्रतिष्ठत करवाया |पूर्व में यहां २०० जैन, एक धर्मशाला, एक उपाश्रय थे तथा मंदिर की दीवारों पर प्राचीन चित्रकारी थी |

आ. श्री यतिंद्रसूरीजी द्वारा सं. २००१ में रचित पुस्तक” मेरी गोडवाड़ यात्रा” के अनुसार, ७० वर्ष पूर्व दादावासी के जैन मंदिर में मुलनायक श्री शांति नाथजी प्रतिष्टित थर|एक धर्मशाला और ओसवाल जैनों के कूल ४० घर विधमान थे |

Mulnayak Shree Shantinath Bhagwan - Dadai (Godwad - Rajasthan)

श्री दादाई संघ से प्राप्त जानकारी अनुसार, इस सुरमय ग़ाव के उराने जिनालय में, प्रथम प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २५०५, शाके १८००, वि. सं. १९३५ में और द्वीतीय प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २४६०, शाके १८५५, वि. सं. १९९० , ई . सन १९३४ में, पू. शासन प्रभावक , पंजाब केसरी, दिवाकर आ. श्री वल्लभसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में नाडोल के विख्यात यति महाराज श्री प्रताप रतनजी के करकमलों से संपन्न हुई |

अतीत से वर्तमान : प्राचीन शिखरबद्ध मंदिर छोटा था, बाद में संघ के प्रयास से मंदिर के पीछे वाली जमीन क्रय करके इसे विशाल रूप प्रदान करने का निर्णय हुआ| वर्तमान जिनालय का निर्माण वि. सं. २०३२-३३ में प्रारम्भ हुआ| सोनाणा आरास पत्थर निर्मित, शिल्पकला की अनुपम कृति, देवविमान तुलय , गगनचुंबी, ऊँची चौकी पर स्थापित दो गजराजो से शोबित मुख्य द्वार, शिखरबद्ध कलात्मक जिन प्रसाद में प्राचीन, श्वेतवर्णी , ११ इंची, पद्मासनस्थ मुलनायक श्री १३ वे तीर्थंकर शांतिनाथ सह , श्री संभवनाथ व श्री धर्मनाथ आदि जिनबिंबो की प्रतिष्ठा, नूतन श्री शांतिनाथ , श्री आदिनाथ व श्री शीतलनाथ आदि जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, पू. आ. श्री वल्लभसूरीजी गुरुबिंब, यक्ष-यक्षणी, अधिष्ठयक देव-देवी प्रतिमाओं की स्थापना, वीर नि. सं. २५१०, शाके १९०५ व वि. सं. २०४०, वैशाख वादी ५, शुक्रवार, दी. २० अप्रैल १९८४ को, प्रतिष्ठा शिरोमणि गोडवाड़ जोजावर रत्न पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी पट्टधर, ज्योतिष शिल्प पू. आ. श्रे पद्मसूरीजी आ. ठा. सह, चतुविध संघ की उपस्थिति में एकादशाहिनका मोहत्सवपूर्वक खूब हर्षोलास से संपन्न हुई| इस अवसर पर, भागवती दीक्षा मोहत्सव भी संपन्न हुआ|प्रतिवर्ष ध्वजा के लाभार्थी श्री वक्तारमलजी चुन्निलालजी रांका परिवार है| गंभारे में बाई तरफ प्राचीन संभवनाथ भगवन की अंजनशलाका वि. सं. १९५१, माघ शुक्ल ५, गुरूवार को वारकाणा तीर्थ पर आयोजित ६०० जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा मोहत्सव पर भट्टारक् श्री राजसूरीश्वरजी के करकमलों से हुई है और बाद में यहां प्रतिष्ठा हुई |

समय निरंतर अपनी गति से दौड़ता रहा|इस बीच वल्लभ समूदायवर्ती पू. आ. श्री जनकचंद्रसूरीश्वरजी व पू. आ. श्री धर्मधुरंधरसूरीजी, आ. ठा. व नितिसमूदायवर्ती सा. श्री स्व. सुशीलभक्तिश्रीजी की सुशियाओ का भव्य चातुर्मास संपन्न हुआ |

दीक्षा : मुंबई के कुर्ला में दादाई निवासी मुमुक्षु विनीता मूलचंदजी संचेती का दीक्षा मोहत्सव वि. सं. २०६६, माघ सुदी ५, बुधवार , दी. २०.1.२०१० को पू. आ. श्री श्रेयानसप्रभसूरीजी के हस्ते संपन्न हुआ और नूतन सा. श्री चिन्मेयरिद्धिश्रीजी मान्करण घोषित हुआ |

रजत मोहत्सव : नूतन जिनालय का २५ व़ा रजत जयनती महामोहत्सव वि.सं. २०६५ के वैशाख वादी ५, दी. २५ अप्रैल २००८ को, पू. आ. श्री पद्मसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में प्रात: धवजाधोरण के साथ संपन्न हुआ |

दादाई : यहां जैनों के १५५ घर और १००० के करीब जनसंख्या है| ग्राम पंचायत दादाई की कूल जनसंख्या ३००० के करीब है|यहां स्कूल, अस्पताल, दूरसंचार आदि साड़ी सुविधाए है |

 

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