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Ghanerao

घानेराव

 

गोडवाड़ का प्रवेशद्वार फालना रेलवे स्टेशन से ३५ की.मी. दूर सादडी-देसुरी मुखय सड़क पर २५ डिग्री अक्षांश और ७३ डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थित अरावली के आंचल में कुम्भलगढ़ की चोटी से १० की.मी. दूर, सुरमय वनस्थली में बसा है “घानेराव” |घानेराव का नाम पंध्र्वी शताब्दी से विभिन्न एतिहासिक पूष्ठो से प्राप्त होता है, जिसमे यह घानेराव, घाणोर, घोणा, घाणेरा,घोणेरु आदि नाम से संबोधित होता रहा है| चार्ली नदी, जो मेदपाट के बनास नदी की सासुक के नाम से विख्यात है, के बाई ओर यह क़स्बा “गोडवाड प्रांत” की राजधानी के रूप में प्रसीद्ध है|भारत भर में एक लोकोकित प्रसिद्ध है की ” ओ तो घानेराव रो रावला है कांई | राजस्थान में यह दोहा परखायत है –

” गोडवाड़ में घानेराव, आडावला में बाली, काँटा में कांटालिया , मारवाड़ में पाली |”

१५वि शताब्दी में प्राचीन घानेराव मुछाला महावीर के आसपास बसा हुआ था| महाराणा कुंभा ने मूंछो पर उठे सवाल पर कहा की एक जगह पर दो मूंछो वाले नहीं रह सकते और उन्होंने “घानेराव” को वर्तमान स्थल पर आबाद किया| यहां के शिलाल्लेख १०वि शताब्दी से याघतन अपना पुष्ठ सवर्णोंक्षरो में पलट रहा है| सं. १०१९ में चौहान वनशिय राव लाखन, चालुकय ,राठोड वंशीय शाखाओं का इस शेत्र में शासक के रूप में अपना अस्तित्व है| घानेराव का शासन १६८० ई. से चाणोद से मसुदा तक का महाराणा अमर सिंह द्वारा प्रदत्त रहा| इस ग़ाव विकास महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह के काल में हुआ|प्राप्त १५० शिलालेखो की उपलब्धि इस बात का प्रमाण प्रस्तुतत करता है की इसकी राजय व्यवस्था निर्माण में स्थापत्य कला का कितना योगदान रहा है| यहा का परकोटा, पंच दरवाजे, अंत दरवाजे, बावडियो की अदभुत निर्माण कल, शिल्प, नाड़ियो , तालाब, नाले, छत्रिया, मंदिर, महल, कोठिया,झालिवाव, ४२ वैष्णव मंदिर, १२ जैन मंदिर, ७मस्जिद और दरगाहे के रूप में इस वैभव को विस्तारित करता है|

यह वाही घानेराव है, जहां १०० वर्ष पूर्व चिंतामणि पार्श्वनाथजी का नया मंदिर निर्मित हुआ, तोह उसकी प्रतिष्ठा समारोह में नौ की तेरह वले (स्वामीवात्सलय) हो गई तब से यह मुहावरा प्रसिद्ध हो गया की “नौ की तरह घानेराव” में हुई | वारकाणा महासभा के ९९ गावो की होने वाली मीटिंग जाजम की शुरुआत करने में घानेराव के श्री जसराजजी सिंघवी का बसा योगदान था| यहा के एतिहासिक, दर्शनीय, अलौकिक, पौराणिक संगममरमर में कलाकृतियो से यूक्त चमत्कारी ११ जिन मंदिर की वैभवता प्रकट करते है |पोरवालो के एक मंदिर को छोड़ सारे मंदिरों की व्यवस्था प्राचीन महावीरजी पेढ़ी संभालती है|छोड़ा

घानेराव में ओसवालो के लगभग ७०० घर व पोरवालो के १५० घर है| रणकपुर तीर्थ के निर्माता धारणशाह के वंशज में उनकी चौदहवी-पंद्रहवी पीढ़ी भी आज घानेराव में निवास करती है| “छोड़ा तीर्थ” की व्यवस्था घानेराव पेढ़ी देखती है |

१ . श्री आदेश्वर्जी मंदिर :

aadeshwarji mandir

घानेराव बगर का यह सबसे प्राचीन जिनमन्दिर है| मुखय बाजार में रावले से लगकर विशाल परिसर में भव्य शिखरबंध इस जिनप्रसाद में अति प्राचीन प्रथम तीर्थंकर दादा आदेश्वर भगवान की 30 इंची श्वेतवर्णी सुन्दर प्रतिमा प्रतिष्टित है | कहते है यह मंदिर करीब १००० वर्ष प्राचीन राजा कुमारपाल के समय का बना है |”जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ ने इससे १५वि शताब्दी में बनवाया , लेकिन कला व शिल्प से १२वि शताब्दी का होना लिखा है| पाषण की ४४ व धातु की १२ प्रतिमाए होना भी दर्शाया है| समय-समय पर जिणोरद्वार होते रहे |एक पगलिया पर सं. १९३७ वाई. सु. ६ गुरूवार का लेख, प्रभु के पास धर्मनाथजी पर सं. २०२४ वाई. सु. ६ चन्द्रे आ. श्री हिमाचलसूरीजी हस्ते प्रतिष्ठा-लेख, शान्तिनाथजी प्रतिमा पर सं. २०३८ वैशाख सु. ३ के लेख प्राप्त होते है| मंदिर में शिलालेख के अनुसार, इसकी प्रतिष्ठा वि. सं. २०३५, वै. सु. १४, रविवार को मेवाड़ केसरी के करकमलों से होने और ३०वि वर्षगाठ पर वि. सं. २०६५ में वैशाख. कृ. ३, बुधवार को पू. श्री विधयानंदविजयजी गनिवरय हस्ते श्री नाकोडा भैरवदेव चकेश्वरी माता के प्रतिष्ठित करने का उल्लेख है|बाद में मुलनायक को यथावत अचल रखकर, इस मंदिर का संपूर्ण जिणोरद्वार करवाया गया|

aadeshwarji bhagwaan

ई. सन १९९३ में आ. श्री प्रेमसुरीजी का श्रीरुंध विनती पर चातुर्मास हुआ व प्रतिष्ठा की विनती हुई| आ. श्री ने वि. सं. २०५०, वैशाख सु. १३, सोमवार, दी.२३ मई १९९४ को सभी उत्थापित प्राचीन प्रतिमाओं एवं बाहर से लाई नूतन प्रतिमाओं की पुण: धूमधाम से प्रतिष्ठा की| मोहत्सव के बीच आ. श्री का ३६वां आ. पदारोहण दी. १७.५.१९९४ को विशेष रूप से मनाया गया| मंदिर परिसर के प्रागण में दादावादी बनी है |चार देहरियो में त्रिगडे प्रतिष्ठित है व नीचे भोयरे में भी प्रतिमाए है|हर वर्ष मुखय ध्वजा श्री कुंदनमलजी और खीमराजजी बाफना परिवार ध्वजा चढाते है|

२. श्री कुंथुनाथजी मंदिरनवीपाटी के वास में दो विशाल हाथियो से सुशोभित भव्य-दीव्य शिखरबंध जिनमंदिर में श्वेतवर्णी कुंथुनाथजी प्रभु की एक हाथ बड़ी अति आकर्षक प्रतिमा स्थापित है | रंगमंडप में मंडित शिलालेख के अनुसार यह वि. सं. १८७२ वर्षे, फाल्गुण शुक्ल ३, शनिवार को श्रीमत्त तपागच्छे भट्टारक् श्री जिनेन्द्रसूरीजी के उपदेश से “घाणपुर” नि. हतुंडिया राठोड अमीचंद नाथभाई परिवार द्वारा प्रतिष्ठित है| ली. पं. शिवसागर गणी का यह लेख है| शयामवर्णी बालगोता परमार वंशज श्री अधिष्ठायकदेव की आकर्षक प्रतिमा स्थापित है| हत वर्ष वैशाख सु. ६ को संघवी परिवार ध्वजा चढ़ाते है|

३ . श्री गोड़ीपार्श्वनाथजी मंदिर :

godiparshvanathji

माहेली वास के पास हिंगडो के वास में बावड़ी चौक में, प्राचीन नर्मदेश्वर महादेव मंदिर के सामने विशाल शिखरबंध जीनालय में श्वेतवर्णी , नौ फनाधारी, कल्त्मक परीयूक्त श्री गोड़ीपार्श्वनाथजी प्रभु प्रभु की मनमोहक प्रतिमा प्रतिष्ठित है| द्वार पर दो कल्त्मक विशाल गजराज से रक्षित जिनमंदिर में, मुलनायक वि. सं. १८ चै. १४ वर्षे , जेष्ठ शुक्ल ३, गुरूवार को सामंत शिरोमणि राठोड वंशे श्री वीरमदेविजी ठाकुर के मंत्री  “घानोरा” नगरवासी लोढ़ारूपाजी पुत्र बिह्हरदासजी द्वारा गोड़ीपार्श्वनाथजी प्रभु व आदिनाथ की प्रतिमा सिद्धचक्रजी तपागच्छाधिराज श्री विजय दयासूरीजी पट्ट भट्टारक् श्री विजयधर्मसूरीजी के वरदहस्ते प्रतिष्ठित हुई| रंगमंडप में अनेक प्रतिमाए शाके १६८० व वि. सं. १८१४ की प्रतिष्ठित है| महावीर स्वामी व आदिनाथ दोनों परिकरयूक्त है| एक काऊस्सगीया व नेमिनाथ, शांतिनाथ सभी इसी मुहर्त की प्रतिष्ठित प्रतिमाए नदी किनारे थे, आज वह नदी नहीं  है |मंदिर के बगल में प्राचीन बावड़ी है| नगर में कूल २७ बावडिया है |हर वर्ष वैशाख सु. ६ को श्री मोतीलालजी लोढ़ा परिवार ध्वजा चढाते है |

४ . श्री जिरावाला पार्शवनाथजी मंदिर :

jirawala parshvanathji

बावड़ी चौक में स्थित प्राचीन गुंबददार व शिखरबंध मंदिर में ऊपर प्राचीन जिरावाला पार्श्वनाथ प्रभु की सवा हाथ प्रतिमा प्रतिष्ठित है| जिणोरद्वार के बाद वि. सं. २०४५ माघ सु. १३, दी. १८.२.१९८९ को मेवाड़ केसरी आ. श्री हिमाचलसूरीजी हस्ते पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिष्ठा संपन्न हुई| पूर्व में एक प्रतिष्ठा वि. सं. २०२४ वैशाख सु. ६, सोमवार को आ. श्री गुणरत्नसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई है| १८वि शताब्दी में हिंगड़ सुतारदासजी परिवार द्वारा निर्मित इस जिनालय में पूर्व में पाषण की १४ व धातु की २७ प्रतिमाए प्रतिष्ठित थी |

५ . श्री चिंतामणि पार्श्वनाथजी मंदिर :

chintamani parshvanathji

नूतन निर्मित विशाल धर्मशाला के पास राजवतो के वास में आज से १०६ वर्ष पहले वि. सं. १९६३ फा. सु. ३ को श्री संघ द्वारा गुंबददार जिनालय का निर्माण करवाकर, श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ प्रभु की बादामी वार्णि, पंचपरमेष्ठी स्वरुप पंचफनाधारी, चिंताहरनी आनंददाई प्रतिमा प्रतिष्ठित है| उस समय इसमें पाषण की ८ व धातु की ९ प्रतिमाए स्थापित थी| वि. सं. २०६३ फा. सु. ३, मंगलवार , दी. २०.२.२००७ को शताब्दी वर्ष निर्मित महामोहत्सव में पू. मू. श्री रैवत विजयजी की पावन निश्रा में शा. हंसराजजी जेठमलजी खींचा परिवार ने १०० वर्ष पूर्णता की ध्वजा फरकाई |इसी प्रतिष्ठा में “नौ की तेरह” वले (स्वामीवात्सल्य) हुई थी, उसी से यह मुहावरा प्रसिद्ध हुआ की – “नौ की तेरह घानेराव” में हुई| श्री चिंतामणि शताब्दी चौक नामकरण हुआ |

६ . श्री मुनिसुव्रत स्वामी मंदिर :

munisuvrat swami bhagwaan

पोरवालो की वास में मुरलीधर मंदीर के सामने सही संघ गुंबददार मंदिर का निर्माण हुआ व मू. प्रभु श्री शांतिनाथ प्रभु की प्रतिमा वि. सं. १९६३ में स्थापित हुई| ऐसा लेख है व उस समय पाषण की 7 व धातु की ४ प्रतिमाए थी| प्राचीन इस मंदिर का जिणोरद्वार करवाके श्री संघ ने पहली मंजिल पर वि. सं. २०२५ वैशाख सु. ६ को आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी के हाथो शांतिनाथजी की जगह प्रभु श्री मुनिसुव्रतस्वामी को प्रतिष्ठित किया व प्राचीन प्रतिमा को पुण: एक शिखरबंध देहरी में प्रतिष्ठित किया| इस मंदिर की रजत जयअंती (२५ वर्ष) की पूर्णता पर वि. सं. २०५० वैशाख सु. ६, दी. १८.५.१९९४ को आ. श्री पद्मसूरीजी की निश्रा में अष्ठाहिनका मोहत्सव हुआ था| हर वर्ष श्री मोतीलालजी टामका परिवार वैशाख सु. ६ को ध्वजा लहराते है| श्री पोरवाल जैन संघ इसकी व्यवस्था देखते है|

७ . श्री अभिनंदन स्वामी मंदिर :

abhinandan swami bhagwan

वांसा की वास में श्री अभीनंदन स्वामी के शिखरबंध जीनालय में गंभारे के बाहर लगे शिलालेख से इसकी प्राचीनता प्रकट होती है| वि. सं. १८३६ के आषाढ़ सुदी १० बुधवार को, चक्र चूडामणि भट्टारक श्री विजय धर्मसूरीजी के उपदेश से राठोड वंशे मेडत़िया राज ठाकुर श्री वीरमदेव के राजय में राठोड लालचंद हरचंदे परिवार ने इसका निर्माण करवाकर प्राचीन संप्रतिकालीन मू. श्री अभीनंदन स्वामी की प्रभावशाली प्रतिमा प्रतिष्ठित की| साथ ही पाषण की १० व धातु की ५ प्रतिमाए स्थापित की| जिणोरद्वारित मंदिर की जानकारी नहीं नगर हर वर्ष मगसर चुन्नीलाल पटनी परिवार ध्वजा फरकाते है| मंदिर रंगमंडप के आसपास में जिणोरद्वार का कारय अभी भी चालू है|

८ . श्री केशरीयाजी मंदिरघानेराव रावले के बाहर मायला वास में उपाश्रय के पास घुमटदार, श्वेत पाषण से निर्मित छोटे मगर सुन्दर जिनमंदिर में केशरीया ऋषभदेव की शान्तिप्रदाइनी प्रतिमा वि. सं. १८८३ तपागच्छ श्री भट्टारक जिनेन्द्रसूरीजी के हाथो प्रतिष्ठित है| हर वर्ष वैशाख सु. ६ को श्री रतनचंदजी लोढ़ा परिवार ध्वजा फरकाते है |

९ . श्री धर्मनाथजी मंदिर :

dharmnath bhagwan

मुखय बाजार में कोतवाली व पेढि के पास श्वेत पाषण से नवनिर्मित भव्य कल्तामक व शिखरबंध जिनालय में मू. श्री धर्मनाथ प्रभु की अति प्राचीन कुमारपाल कालीन प्रभावशाली प्रतिमा प्रतिष्ठित है| वि. सं. २०१२ माघ सु. ६ बुधवार को पं. कलयाणविजयजी हस्ते पुन: प्रतिष्ठा हुई है| श्री संघ २५३ साल प्राचीन मानते है| वि. सं. २०६३, जेष्ठ वदी २, दी. ४.५.२००७ को संपूर्ण जिणोरद्वारित नूतन जिनालय की प्रतिष्ठा आ. श्री पद्मसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई है| जेठ वादी २ को श्री रायचंदजी खिंचीया परिवार ध्वजा चढाते है |

१० . श्री चौमुखा पार्श्वनाथजी मंदिर : सादो री पाटी में गिआन मंदिर की प्रथम मंजिल पर सुन्दर कल्त्मक छत्री में चौमुखा पार्श्वनाथजी की प्रतिष्ठा वि. सं. २०२४ वै. सु. ६, सोमवार को आ. श्री हिमाचाल्सुरीजी के हस्ते संपन्न हुई| एक गोखले में मू. श्री हितविजयजी की गुरुमूर्ति, दुसरे गोखले में पंचधातु की जिन प्रतिमा विराजमान है| पास ही वि. सं. १९११ के प्रतिष्ठित तीन चरनायूगल स्थापित है, दूसरी मंजिल पर चुमुखा मंदिर में ऋषभ-चन्द्रानन-वारिशेण-वर्धमान जिन प्रतिमा प्रतिष्ठित है |

११ . श्री नवा नाकोडा-कीर्तिस्तंभ :

nava nakoda

सादडी-घानेराव मुखय सड़क पर विशाल परिसर में नौ मंजिला भव्य -दीव्य कीर्तिस्तंभ की प्रतिष्ठा, वि. सं. २०३८ माघ सु. १४, रवि पुषय, दी. 7.२.१९८२ को आ. श्री हिमाचलसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई | अभिनव नाकोडाधाम के इस कीर्तिस्तंभ की आठवीं व नौवी मंजिल पर चौमुखा पार्श्वनाथ व महावीर स्वामी की प्रत्माए प्रतिष्ठित है| आ. श्री हिमाचलसुरिजी की गुरुमूर्ति व नाकोडा भैरवदेवजी की प्रतिमाए सातवी मंजिल पर स्थापित है| परिसर मव आमने-सामने दो गुरु मंदिरों में आ. श्री हीरसूरीजी व मू. श्री हीतविजयजी की मुर्तिया स्थापित है| शयामवर्णी श्री पार्श्वनाथ प्रभु का मंदिर है| धर्मशाला व भोजनशाला की उत्तम व्यवस्था है| आगलोड श्री मणिभद्र तीर्थ उद्धरक पू. आ. श्री आनंदघनसूरीजी को वि. सं. २०३९, आषाढ़ सु. ६ को कीर्तिस्तंभ तीर्थ पर पू. आ. श्री हिमाचलसूरीजी हस्ते आचार्य पद पर आरूढ़ किया गए|

१२ . श्री आदेश्वर दादा-घर मंदिर :

aadeshwar dada

सालवियो की पाटी में वर्धमान आयमबिल खाते के सामने घाकाबंध छोटे से जिन मंदिर में आदेश्वर दादा की प्राचीन संप्रतिकालीन प्रतिमा प्रतिष्ठित है| यह घर मंदिर श्री चंदनमलजी वनेचंदजी परिवार द्वारा निर्मित है| पेढि की ओर से वै. सु. १३ को ध्वजा चढ़ती है|

१३ . श्री हिमाचलसूरी दादावाड़ी : वि. सं. २०४३ कार्तिक  सुदी १२, दी. १३.११.१९८६ का मेवाड़ केशरी, नाकोडा तीर्थ उधारक आ. श्री हिमाचलसूरीजी का कालधर्म कीर्तिस्तंभ में हुआ| कुछ दुरी पर जहां अग्निसंस्कार हुआ वहां बनी दादावाड़ी में हीतविजयजी-हीरसूरीजी व हिमाचलसूरीजी की प्रतिमाओं की मू. श्री पं. रत्नाकरविजयजी के हस्ते वि. सं. २०५७ माघ सु. १४ सोमवार दी. 7.२.२००१ को प्रतिष्ठा हुई| घानेराव में नि. सं. १९८० मार्गशीर्ष सु. ६ को, दीक्षा, नाम हिम्मतविजय, वि. सं. १९८५ में पं. पदवी, वि. सं. २००१ जेठ वादी ३ को आचार्य पद प्रदान व आ. श्री हिमाचलसूरीजी नामकरण हुआ|आप श्री का घानेराव से विशेष लगाव रहा| 

घानेराव-रावला : राजस्थान के इतिहास में घानेराव का ठीकाना सुप्रसिद्ध रहा है| इस ठीकाने की स्थापना सन १६०६ ई. में मवाद के महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में मेडत़िया राठोड ठाकुर गोपाल सिंह द्वारा की गई थी | घानेराव के जागीरदार को ” गोडवाड़ के राजाजी” कहकर ही आम लोग पुकारते थे, कारण इस जागीरी में 30 से अधीक ग़ाव थे| राजा को मालुम ही नहीं पड़ता की प्रजा के साथ कया सलूक हो रहा है| सिद्धे ठाकुर के पास आं लोगो की पहुच ही नहीं थी | इसलिए मारवाड़ में यह कहावत प्रचलित हो गई थी की “घानेराव रा रावला में १७ गाडोरी पोल” है| किसी काम में अगर सुनवाई नहीं होती तो कहा जाता था की “ओ तो घानेराव रो रावलो है“| इस रावले को दो भागो में विभक्त कर रखा है- जनाना महल व मर्दाना महल| घानेराव गढ़ की चित्रकारी में राजा-महाराजाओ के सोने की कारीगरी के व आखेट के चित्र है| गढ़ की बारादरी, झरोके और गोकडे , राजाओ और ठकुरी की शिल्पकला के प्रति लगाव का नमूना है|वर्तमान में इसको हेरिटेज होटल के रूप में विकसित किया गया है| यहां हजारो विदेशी आते है|

ऋद्धि-सिद्धि गजबदन मंदिर: घानेराव से मुछला माहिर जाते समय प्राथम दाई तरफ के गेट से अन्दर ऋद्धि-सिद्धि गणपति मंदिर आता है| जिसमे ऋद्धि-सिद्धि के बीच गनाधिपति का पति परमेश्वर के रूप में साढ़े सात फीट का मनोहारी रूप एकटक निहारते बनता है|मंगलकारी दो पत्नियो की पंच फीट पांच इंच की मुर्तिया अपने पतिव्रता धर्म में निमग्न सोलह श्रुंगार यूक्त, दर्शको का मन मोह लेती है| इतनी भव्य-दीव्य प्रतिमा बिना सहारे अधर में खड़ी है| इनके बाई तरफ भव्य मारुती तथा दाई तरफ काले भैरव की प्रतिमा स्थापित है| इस मंदिर का निर्माण जोधपुर महाराज जसवंतसिंघजी द्वारा हुआ है| यहां के साधक श्री मोतिगिराजी ने सं. १८८२ मगसर सु. १० को जीवित समाधि ली थी| मंदिर के भार यहां का महत्त्व बताता शिलालेख गडा है |

एतिहासिक व पौराणिक धरोहर : घानेराव में ८वि शताब्दी का किलानुमा परकोटे से सुशोभित लक्ष्मी नारायण मंदिर अपना वैभव दर्शाता है| कालाटुंक पहाड़ी पर २०० फीट की उचाई पर पठारों से ढफी गुफा में मा हिंगलाज का पवित्र स्थान है, जहां अति प्राचीन मा का त्रिशूल धुणी के बीच लगा है| यहां की हसनवली काणा पीर दरगाह, कौमी एकता का ज्वलंत उदाहरण य\ह दास्तां है|शुर मगरी पर स्थित शुरवानिया माताजी का प्राचीन मंदिर है| एक प्राकृतिक शिला के रूप में गढ़ा की माता का मंदिर है, जहां से महल तक २००० फीट की सुरंग है| इसी के साथ मेन बाजार में अंबाजी मंदिर, श्री दाद्श जोतिलिंग गुप्तेश्वर महादेव मंदिर, श्री शनिचर महाराज, श्री भेरूजी , श्री रामसापीर, श्री हनुमानजी, श्री कालिका माता, श्री चारभुजा, श्री पदमनानाथजी, श्री बिलेश्वर महादेव , श्री देवनारायण, श्री चामुंडा माता, श्री लक्ष्मीनाथ, श्री शीतला माताजी ,श्री राम-लक्ष्मण आदि मंदिर जन-जन की आश्था के केंद्र है|प्राचीन बावडिया यहां की एतिहासिक धरोहर है|

यहां टेरिनाल का बाँध यहां की दस हजार जनसंख्या हेतु पानी की व्यवस्था बनता है| १२वि तक स्कूल, सरकारी व प्रायवेट हॉस्पिटल, ग्रामीण बैंक, पुलिस चौकी ,दूरसंचार व्यवस्था आदि लोगो की दैनिक जरूरतों को पूरा करते है| नृसिंह अवतार बादरिया मुखय तोहार है|कस्बे से जुडी घानेराव नदी है|

८५० की घर हौती है, जैनों की कूल ४००० की जनसंख्या है| नवयूग मंडल, श्री मुछाला महावीर सोशल ग्रुप व वर्धमान मंडल यहा सहयोगी संस्थाए है| विशाल गौशाला है|अनेक धर्मवीरो ने यहां संयम ग्रहण किया है| यहां का कलाकंद व सेव प्रसिद्ध है|

 

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