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Jain Tirth

******* Jain Tirth *******

तीर्थ का अर्थ 

              तीर्थ हमारी श्रद्धा एवं निष्ठा का सर्वोपीर मापदंड है| तीर्थ ही वे माध्यम है, जिनके द्वारा हम अतीत के अध्यातम में झांक सकते है| चेतना की उर्जा, संघनता एवं वायूमंडल में चेतना की जितनी तरंगे तीर्थो में मिलेगी, धरती के अन्य किसी भी स्थान पर संभव नहीं है|

             संसार में ऐसा कोई धर्म नहीं है, जिसने तीर्थ  की सार्थकता को अस्वीकार किया है |हर धर्म तीर्थ से जुड़ा है| सच तो यह है की तीर्थ से ही जीवन मिलता है| वास्तव में तीर्थ हर धर्म का नाभिस्थल है, श्रद्धा का केंद्र है| वह मनुष्य धन्य है जिसके शीर्ष पर किसी तीर्थ की माटी का तिलक हुआ है|

 

तीर्थ दर्शन/Tirth Darshan

Jain Tirth in India : Details of Various Jain Tirth

 

  श्री सम्मेतशिखरजी तीर्थ                       श्री पावापुरी तीर्थ(जल मंदिर)   

 

  श्री गिरनारजी तीर्थ                                श्री शत्रुंजय तीर्थ (पालिताना)

 

  श्री नाकोडा तीर्थ                                    श्री शंखेश्वरजी तीर्थ

 

  श्री ओस़ियाजी तीर्थ                                श्री केशरीयाजी तीर्थ

 

  श्री राणकपुर तीर्थ                                  श्री देलवाडा तीर्थ

 

  श्री नागेश्वर तीर्थ                                    श्री जिरावला तीर्थ

 

  श्री मोहनखेड़ा तीर्थ                                 श्री वरकाणा तीर्थ

 

  श्री चम्पापुरी तीर्थ                                   श्री आहोर तीर्थ

 

  श्री हथुन्दी राता महावीरजी तीर्थ                श्री हस्तिनापुर तीर्थ

 

  श्री अंतरिक्ष पार्श्वनाथ तीर्थ                       श्री सोनाणा खेतलाजी तीर्थ

 

  श्री अष्टापद तीर्थ रानी                             श्री नाडलाई तीर्थ

 

  श्री ७२ जिनालय तीर्थ(भीनमाल)               श्री जैसलमेर तीर्थ

 

  श्री हस्तगिरी तीर्थ                                   श्री अजाहरा पार्श्वनाथ तीर्थ

 

  श्री वल्लभिपुर तीर्थ                                 श्री खंभात तीर्थ

 

  श्री अचलगढ़ तीर्थ                                   श्री बलसाणा तीर्थ

 

  श्री नाणा तीर्थ                                       श्री पावापुरी तीर्थ (सिरोही)

 

  श्री चमत्कारी पार्श्वनाथ तीर्थ                  श्री गोडीजी पार्श्वनाथ तीर्थ

 

  श्री शंखेश्वर सुख धाम तीर्थ                  श्री स्वर्ण मंदिर तीर्थ(ग्वालियर)


उस पार उतारे वो तीर्थ…….

सार विराट सागर है | यहाँ डूबने के लिए तो कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता , किन्तु इसके पार उतरना इम्तिहान है| वहीँ हमारी पहली और अंतिम साधना है| जो इस भवसागर से हमें पार उतारे , वे तीर्थ कहे जाते है| ऐसे तीर्थ दो प्रकार के होते है , एक : चलते-फिरते , दुसरे : स्थाई |

जिनशासन के साधू-साध्वी चलते-फिरते तीर्थ है| उनका जीवन सबके लिए प्रेरणादायी होता है| उन्हीं ने अपनी साधना के साथ-साथ दूर-सुदूर तक विचरण कर जैनत्व के संस्कारों को जीवंत रखा है| अपने खून-पसीने से उन्होंने जिनशासन को सींचा है|मन से प्राप्त किया हुआ उनका सान्निध्य तत्काल फलदायी बनता है| जो उनकी छाया में आत्मा-बोध प्राप्त करते है,  वे अपनी तीर्थयात्रा ही नहीं, जीवन-यात्रा भी सफल बना देते है|

इसके बाद क्रम आता है स्थायी तीर्थों की विधिपूर्वक यात्रा का| जिस धन्यधरा को कभी किसी तीर्थंकर प्रभु के च्यवन (गर्भ-अवतरण) , जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान अथवा निर्वाण की अलौकिक घटना का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो अथवा जो जिनालय सौ साल से अधीक का सफ़र तय कर चुके हो, वे सभी तीर्थ कहलाते है| उन्हें स्थाई तीर्थ कहा जाता है|

शत्रुंजय,गिरनार, शंखेश्वर, सम्मेतशिखरजी,आबू, अष्टापद, पावापुरी, चंपापुरी, हस्तिनापुर, राणकपुर इत्यादि सैकड़ों महान स्थाई तीर्थ है जो ये गौरवशाली जैन इतिहास के कीर्तिस्तंभ है| इन तीर्थों ने ही आततातियों के आक्रमण और धर्म परिवर्तन के संकटकाल में हमारी धर्म-प्रेरणा को जिलाया है| ये साधना के सुनहरे शिखर है| कद में ये तीर्थ एवेरेस्ट सरीखे ऊँचे नहीं है,परन्तु चेतना की शक्ति को जगाने में इनका कोई सानी नहीं है| मानवजाती के आध्यात्मिक विकास की अमर कहानियां इन्होने रची है| अनेक तीर्थंकरों और उनके हजारों-लाखों महँ श्रमणों की साधना से तीर्थों की धूलि धन्य बनी है| फिर करोड़ो गृहस्थ साधकों की धर्मभावना का सत्तव उनमें घुला-मिला है| निश्चित रूप से ऐसे तीर्थों की यात्रा अशुभ को टालती है और सदभाग्य के द्वार खोलती है|

लाख चाहकर भी हम अपने घर-दूकान या गाँव-नगर को तीर्थतुल्य नहीं बना सकते | हमारा मन इतना कमजोर है की वह बार-बार यहाँ के परिवेश में मैला हो जाता है|इसीलिए तीर्थों की महत्ता कल भी थी, आज भी है और आने वाले कल भी रहेगी| जो हम वर्षों तक घर-दूकान या गाँव-नगर में रहकर प्राप्त नहीं कर सकते, उन उत्कुष्ट भावनाओं की उपलब्धि कुछ क्षणों में तीर्थभूमियों के कण-कण से हो सकती है| इसी अर्थ में तीर्थ तारणहार है|

आखों से सिर्फ देखा जाता है, लेकिन जब मन भी साथ में जुड़ जाता है तो वह निहारा जाता है, भगवन को मात्र देखना नहीं होता, निहारना होता है| उन्हें निहारने के बाद कुछ भी देखना शेष नहीं बचता|

अहर्त धर्म में पार उतरने के लिए असंख्य योग है| अपने अनुकूल किसी भी योग का सहारा लेकर मनुष्य आगे बढ़ सकता है| ज्ञानयोग, क्रियायोग तपयोग – आदि , कठिन है| भक्तियोग सबसे सरल है |


तीर्थ स्थानों का महत्व त्रिविध रूप में विभाजित किया जाता है –
1- ऐतिहासिक
2- कला और
3- चमत्कार 

1– ऐतिहासिक – इन तीर्थ सीनों का लोक मानस पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है, उससे उन स्थानों की प्रसिधी बढती जाती है । एतिहासिक द्रष्ठी से ज्यों ज्यों वह व्यक्ति या स्थान पुराना होता जाता है त्यों त्यों प्राचीनतम के प्रति विशेष आग्रहशील होने के कारण उसका महत्व भी प्रतीति कर के अपने को गौरवशाली, धन्य, क्रत्पुणय मानते है । नाम की भूख मानव की सबसे बड़ी कमजोरी है । इस नाम्लिप्सा से विरल व्यक्ति ही ऊपर उठ पाते है । इसलिए वहां के कार्यकलापों को स्थायित्व देने और कीर्ति को चिरजीवित करने के लिए मूर्तियों, मंदिरों और चरण पादुकाओं पर लेख और प्रशस्तियाँ खुदवाई जाती है । उसमे उनके वंश, परिवार और गुरुजनों के नामों के साथ उनके विशी कार्यों का भी उल्लेख किया जाता है । इस द्रष्टि से आगे चलकर वे लेख और प्रशस्तियाँ इतिहास के महत्वपूर्ण साधन बन जाते है । उन तीर्थ स्थानों पे जो कोई विशी कार्य किया जाता है उसका गौरव उनके वंशजों को मिलता है । अतः उनके वंशज तथा अन्य लोग धार्मिक भावना में या अनुकरणप्रिय होने के कारण देखा – देखी अपनी ओर से भी कुछ स्मारक या स्मृति चिन्ह बनाने का प्रयत्न करते है । इस तरह धार्मिक भावना को भी बहुत प्रोत्साहन मिलता है । और इतिहास भी सुरक्षित रहता है ।

2- कला – इन तीर्थों और पूजनीय स्थानों का दूसरा महत्त्व कला की द्रष्टि से है । अपनी अपनी शक्ति और भक्ति के निर्माण करना वाले अपनी कलाप्रियता का परिचय देते है । इससे एक ओर जहाँ कलाकारों को प्रबल प्रोत्साहन मिलता है वही दूसरी ओर कला के विकास में भी बहुत सुविधा उपस्थित हो जाती है । इस तरह समय पे स्थापत्य कला, मूर्तिकला ओर साथ ही चित्रकला के अध्ययन करने की द्रष्टि से उन स्थानों का दिन प्रतिदिन अधिकाधिक महत्त्व बताया जाता है । सभी व्यक्ति गहरी धर्म भवना वाले नहीं होते है, अतः कलाप्रेमी व्यक्ति भी एक दर्शनीय ओर मनोहर कलाधाम की कारीगरी को देखते हुए उनके प्रति अधिकाधिक आकर्षित होने लगते है । जैन हे नहीं जैनेतर लोगो क लिए भी वे कलाधाम दर्शनीय स्थान बन जाते है । इस द्रष्टि से ऐसे स्थानों का सार्वजनिक महत्व भी सर्वाधिक होता है। सम-सामायिक ही नहीं, किन्तु चिरकाल तक वे जन-समुदाय के आकर्षण केंद्र बने रहते है । आबू रणकपुर के मंदिर इसी द्रष्टि से आज भी आकर्षण के केंद्र बने हुए है ।

3- चमत्कार – तीसरा भी एक पहलू है – चमत्कारों से प्रभावित होना । जन समुदाय अपनी मनोकामनाओं को जहाँ से भी, जिस तरह से भी पूर्ति की जा सकती है उसका सदैव प्रयत्न करते रहते है, क्योंकि जीवन में सदा एक समान स्थिति नहीं रहती । अनेक प्रकार के दुःख, रोग और आभाव से पीड़ित होते रहते है । अतः जिसकी भी मान्यता से उनके दुःख दुःख निवारण और मनोवांछा पूर्ण करने में याताकाचित भी सहायता मिलती है जो सहज ही वह की मूर्ति, अद्धिता आदि के प्रति लोगो का आकर्षण बता जाता है ।

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