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Jojawar

जोजावर(जहाजपुर)

शौर्यशैली वीरभूमि राजस्थान के जोधपुर डिवीज़न का पाली जिला, जो उत्तर-पुर में अरावली पर्वत श्रुंखलाओ से घिरा हुआ है, उन्हीं पर्वत श्रुंखलाओ की गोद में गोडवाड़ के उत्तरीय प्रवेशद्वार के रूप में स्थित क़स्बा, जो पहले “जहाजपुर” नाम से जाना जाता था, वर्तमान में “जोजावर” नाम से जाना जाता है| यहाँ मारवाड़-मेवाड़ और गोडवाड़ का त्रिवेणी संगम स्थल है| जोजावर मारवाड़ जंक्शन रेलवे स्टेशन से ३७की.मी. दूर व नेशनल हाईवे नं. ८ कामलीघाट चौराहा से १५कि.मी. एवं दूसरी से ४० की.मी. दूर स्थित है, जिसके चारों तरफ जोजावर नदी बहती है| प्राचीन जहाजपुर नदी के उस पार था|

जोजावर को राजा जोजलदेव ने बसाया था| इस नगर में सभी संप्रदाय के कुल ४५० घर और २५०० के करीब जैनों की जनसंख्या है| गाँव की कुल आबादी दस हजार के करीब है| यहाँ की भूमि से आचार्य श्री, अनेक साधू, सतिया और श्रमणी हुए है, जिन्होंने अपनी साधना द्वारा प्रख्यात नाम कमाया है| यहाँ से ठाकुर साहेब के सुपुत्र कुश्वीरसिंहजी मारवाड़ जंक्शन के एम.एल.ए. है|

नगर की प्राचीनता : “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार , श्री संघ ने सं. ११०० के लगभग शिखरबंध जिनालय का निर्माण करवाकर मुलनायक श्री १३वे तीर्थंकर विमलनाथ स्वामी की प्रतिमा के साथ पाषण की ५ और धातु की ४ प्रतिमाएं प्रतिष्ठित करवाई| प्रतिमा लेख अनुसार, सं. १८९२ की अंजनशलाका प्रतिष्ठा हुई है| पहले यहाँ २०० जैनी व एक उपाश्रय था| इस लेख से १००० वर्ष की प्राचीनता प्रकट होती , पर सं. २०३०-३१ के आसपास, श्री संघ द्वारा जिणोरद्वार प्रारंभ हुआ| वीर नि.सं. २५०४, शाके १८९९, वि.सं.  २०३४, माह सुदी १३, सोमवार, फ़रवरी १९७८ को, नूतन जिणोरध्वरित, ४ शिखरों से शोभित,ऊँची चौकी पर कलात्मकता से युक्त श्वेत पाषण से निर्मित, दो गजराजों से रक्षित प्रवेशद्वार, भव्य रंगमंडप, कांच की मीनाकारी युक्त सुन्दर नक्काशी वर्क ऐसे गगनचुंबी देदीप्य्मान जिनप्रसाद में, श्वेतवर्णी २१ इंची पद्मासनस्थ, प्राचीन मुलनायक श्री विमलनाथादी जिनबिंबो की प्रतिष्ठा, जोजावर रत्न, आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी के पट्टधर शिष्यरत्न आ. श्री पद्मसूरीजी आया. ठा. व चतुर्विध संघ की पावन निश्रा में संपन्न हुई| जिनालय में प्रतिष्ठित ज्यादातर प्रतिमाएं सभी राजा संप्रतिकालीन है, जो जिनालय के १०वि शताब्दी के होने को प्रमाणित करता है| कुछ वर्षों पहले भूगर्भ से प्राप्त प्रतिमाएं जिनालय में पीछे चौकी पर स्थापित की गई है|

नूतन धर्मनाथ भगवान के मंदिर का खाद् मुहूर्त सं.२०५२ , फा.सु. ८, रोहिणी नक्षत्र, विजय मुहूर्त(१२:३९ बजे) दी.२६.२.१९९६ को आ. श्री पदम्सुरिश्वर्जी की निश्रा में तथा मंदिर का शिलान्यास सं. २०५२ , जेठ सुदी १५, शनिवार, विजय मुहूर्त दी.१ जून १९९६ को आ. श्री पद्मसूरीजी की निश्रा में श्री नवलखा परिवार को प्राप्त हुआ|

जिनालय में तीन गुरुवारों की प्राचीन चरणपादुकाएं (३ जोड़ी) स्थापित है| प्रतिष्ठा के मुहूर्त में ही(सं. २०३४, माघ शु. १३, चन्द्र) जोजावर रत्न आ. श्री जिनेद्रसूरीश्वर्जी की गुरु प्रतिमा को भावोल्लास प्रतिष्ठित किया गया|वि.सं. २०४७, चैत्र सुदी १३, गुरुवार दी.२८.३.१९९१ से आ. श्री पद्मसूरीजी की निश्रा में यहाँ श्री शांतिस्नात्र महापूजा व अष्टाहिनका मोहत्सव हुआ| आपश्री की निश्रा में ही सं. २०६७. फा. वदी ५, मंगलवार ,दी. २२.२.२०११ को मोक्ष्माला परिधान के साथ पूर्ण हुआ|

श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी भवन का उद्घाटन सं. २०४४ के कार्तिक शु. पूर्णिमा, गुरुवार, दी.५.११.१९८७ को भंसाली परिवार ने किया| प्रतिवर्ष जिनालय की ध्वजा माह सुदी १३ को धनराजजी शिवराजजी सुराणा परिवार चढाते है| वैसे कुल चार ध्वजा चढाई जाती है|गांव के प्रति प्रेम और जन्मभूमि का ऋण चुकाने हेतु जैन भाइयों ने ३ उच्च प्राथमिक विधालय, बालिका विधालय, आयुवेदिक हॉस्पिटल, बस स्टैंड पर सराय, प्याऊ, राजकीय चिकित्सालय आदि का निर्माण करवाया है| गांव के छोर पर अति प्राचीन त्रिवेणी महादेवजी का मंदिर, श्री सत्यनारायण, संतोषी माता ,हनुमानजी, शीतला माता आदि अनेक अजें मंदिर शोभायमान है|यहाँ पर नवोदय विधालय एवं टेलीफोन एक्सचेंज भी है| स्टेट बैंक ऑफ़ बीकानेर & जयपुर, पुलिस चौकी, सिंचाई हेतु रेणिया बांध, इत्यादि सभी सुविधाएं है|

श्री मांगीलालजी ओंकारमलजी भंसाली युवा कांग्रेस कार्यरत के रूप में माफ़ी सक्रीय रहे| पिछड़े वर्गों के लिए दिल से काम किया| जोजावर से वाया राणानाडी ढेलपूरा होकर ७-८ की.मी. दूर जोकडिया जोजावर प्राचीन गढ़ स्थित है| यह एक पृथक पहाड़ी पर निर्मित है, जिसकी परिशी २ की.मी. की है|


महान शिल्पवेत्ता, मरुधर केशरी, ज्योतिधर, श्री हर्षसूरी के पट्ट प्रभावक

जोजावर विभूति पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी म.सा.

उर्फ़ मीठा महाराज

 

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