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Koshelav

कोशेलाव

 

राजस्थान के पाली जिले में, गोडवाड़ के प्रवेशद्वार फालना रेलवे स्टेशन से २२ की.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर सांडेराव से ९ की.मी. मोकलसर जाने वाली सड़क पर अरावली पर्वत के आंचल में प्राकृतिक सुंदरता से भरपुर एक नगरी बसी है- “कोशेलाव”|

शब्दों के दर्पण से इतिहास का वर्णन: आधुनिक कोशेलाव ग़ाव के भूतकाल को टटोलने पर यह मालुम होता है की लगभग ५०० वर्ष पहले, जिस स्थान पर आज यह ग़ाव बसा है, उससे करीब एक की.मी. दूर, दक्षिण में श्री नीलकंठ महादेव के पास पहाडियो की ढालन पर “लाम्बिया” नामक ग़ाव था| यह ग़ाव सिन्दल सामंतो के हक़ में था| इनके अधिकार के सोलह गावो में यह एक ग़ाव “लाम्बिया” नामक ग़ाव था| प्राचीन दस्तावजो व वीरदावलियो से पता होता है की वि.सं. १६०० में, सिन्दल ठाकुर श्री लाडसिंह का लाम्बिया पर अधिकार था| यहां भाटों व राइको का बाहुल्य था| वि.सं. १६०९ में ग़ाव के भाटों ने अपने ग़ाव में एक विशाल समारोह का आयोजन “मवस्सर” के रूप में करने का निर्णय किया| इसके लिए ठाकुर लाडसिंह ने अनुमति नहीं दी| मगर आपश्री के छोटे भाई ठाकुर गोविन्दसिंघजी ने भाटों का साथ दिया| उनके समर्थन एवं सहयोग से तत्कालीन लाम्बिया ग़ाव से एक की.मी. उत्तर में, वि.सं. १६०९, कार्तिक सुदी-२, (भाऊबिज), शुक्रवार को यह समारोह संपन्न किया गया और इसी स्थान पर एक नए ग़ाव की नीव डाली गई| इस प्रकार लाम्बिया ग़ाव दो भागो में बट गया| सिन्दल ठाकुर श्री गोविन्द सिंहजी ने इस नए ग़ाव को बसाकर इसका नाम “कोशेलाव” रखा|

वि.सं. १८०० के आसपास मेडत़िया ठाकुर चाणोद अधिपति श्री अनूपसिंहजी ने यहां आकर नए बसों मीणों का आतंक दूर करने व शिकार के प्रलोभन से कोशेलाव ग़ाव में अपनी एक चौकी स्थापित की| इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से इस ग़ाव पर मेडत़िया ठाकुरों का अधिकार हो गया| बाद में अनेक वंशजो का लगातार अधिकार रहा|

ग़ाव की प्रतिष्ठा को बढाने का काम श्री जावंत’राजजी मुथा ने किया, जो चाणोद ठिकाने की ओर से यहां कामदार नियूक्त हुए थे| उन्होंने बलाणा ग़ाव को जीता और मीणों का आतंक समाप्त किया| मुथाजी व उनकी घोड़ी दोनों ही काने थे| आज भी मीणों का उत्पात करने पर उन्हें काणा मुथाजी की याद दिलाई जाती है| ग्रामीण आअज भी गीत गाते है –

“कोशेलाव गाढ़ीलो ग़ाव मंदों हुतो मुताजी कने, बढे लेता विश्राम जोड़ी छाया जावतराज री…”

श्री जावंतराजजी मुथा ने लील की फर्म के पास जोयतरा नामक ग़ाव बसाया था| बाद में चाणोद ठिकाने के ठाकुर श्री किशोरसिंघजी ने लाम्बिया और जोयतरा दोनों ग़ाव को कोशेलाव में मिलकर उसे विशाल रूप दे दिया| यह बात वि.सं. १८०० के लगभग की है| मीणों का आतंक समाप्त होने पर धीरे-धीरे यहां जैनों की बस्ती बढ़ने लगी, जिसका उदाहरण इस तरह मिलता है- 

” मिल्या जावत रो जोड़ , रेशम का रेजा | रेतबड़ो हाथी छुटो शह में….”

सं १८०० में चाणोद ठाकुर श्री किशोरसिंघजी ने यहां एक भव्य दुर्ग व मुरलीधरजी का मंदिर बनवाया| बस स्टैंड पर ठाकुरजी का मंदिर सं. १९३५ में श्री जावंतराजजी के पुत्र श्री पूनमचंदजी ने बनवाया| ग़ाव के बाहर दक्षिण दिशा में पहाड़ी पर चामुंडा माता का मंदिर स्थित है| उसके पास ही नीलकंठ महादेव व करीब २ की.मी. की दुरी पर हिंगोठीया हनुमान का मंदिर भी बड़ा ही आकर्षक एवं दर्शनीय है| कोशेलाव में कूल 4 जैन मंदिर है|

श्री शांतिनाथजी मंदिर :

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नगर के मध्य भाग में पहाड़ की तल्हेटी में स्थित भोमीयान चौराहा के भव्य सौध शिखरी जिन प्रसाद जिन प्रसाद में प्राचीन मुलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु की दैदीपयमान प्रतिमा स्थापित है| “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” के अनुसार , श्री संघ वि.सं. १९५२ में शिखरबंध जिनालय का निर्माण करवाकर संप्रति कालीन अति प्राचीन १६वे तीर्थंकर चक्रवती परभू श्री शांतिनाथ प्रभु सह पाषण की ६ व धातु की ५ प्रतिमाए प्रतिष्ठित की गई|

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समय के साथ  मंदिर के जीर्ण हो जाने पर श्री संघ ने आमूलचूल जिणोरद्वार करवाकर, नीति समूदायवर्ती मुनिभूषण श्री वल्लभदत्तजी की पावन निश्रा में, वीर नि.सं. २५०९, शाके १९०४, वि.सं. २०३९, आषाढ़ कृष्ण ५, गुरूवार, दी. 30.६.१९८६, सिद्धियोगए, नूतन परीयूक्त प्राचीन मूलनायक व नूतन जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न हुई| पू. गच्छाधिपति आ. श्री हेमप्रभसूरीजी, आ. श्री अनंतभद्रसूरीजी आदि ठाना-५८ श्रमण-श्रमनी भगवंतो का यशस्वी चातुर्मास के उपलक्ष्य में तथा चातुर्मास में एक करोड़ ८ लाख़ जाप के उपलक्ष में श्री संघ ने “नमस्कार मंत्र देवकुलिका” का निर्माण करवाकर, आचार्य श्री हस्ते वि.सं. २०६८, कार्तिक शु. १०, शनिवार,  दी. ५.११.२०११ को, पट्ट की स्थापना की गई| इसी मुहर्त में दादावाड़ी की भी प्रतिष्ठा संपन्न हुई थी|

श्री पार्श्वनाथजी मंदिर :ग़ाव के मुखय बाजार में स्थित, प्रभु श्री पार्श्वनाथ भगवान का कलात्मक जिनमंदिर, अपने शिल्प एवं स्थापतय कला के लिए प्रसिद्ध है| “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” के अनुसार, वनाजी कलाजी–डायाजी परमार परिवार द्वारा सं. १९५५ में निर्मित शिखरबंध जीनालय में ऊँची गाडी पर मुलनायक श्री पार्श्वनाथ प्रभु सह पाषण की ३ व धातु की ६ प्रतिमाए स्थापित की गई| प्रतिमा पर सं. ११४८ का लेख है| उन दिनों यहां १००० के करीब जैन थे वे एक उपाश्रय व ३ धर्मशालाए थी| कालांतर में चैतय के जीर्ण होने पर त्रिस्तुतिक श्री संघ द्वारा संपूर्ण जिणोरद्वार करवाकर वीर नि.सं. २४२५, शाके १८२०, वि.सं. १९५५, माघ शु. १३, ई. सन १८९९ को पू. श्रीमद् विजय राजेंद्रसूरीजी की आगिया से शीषयरत्न तपस्वी मू.श्री रूपविजयजी के हाथो हर्षोलास से प्रतिष्ठा संपन्न हुई तथा सं २००० के वै. सु. ६, सोमवार, दी. १०.५.१९४३ को सियाणा प्रतिष्ठोत्सव पर आ. श्री यतिंद्रसूरीजी के हस्ते गुरुदेव राजेन्द्रसूरीजी की प्रतिमा की अंजनशलाका करवाकर यहां प्रतिष्टित की गई| गुरुबिंबो के लाभार्थी यहां के प्रागवट अमिचंदजी नेमाजी थे|

वि.सं. १९७८ में गुरुदेव के शीषय उप. श्री गुलाबविजयजी व बालीरत्न मू. श्री चंद्रविजयजी आ. ठा. का चातुर्मास हुआ व वि.सं. २०२९ में आ. श्री विधाचंद्रसूरीजी एवं आ. श्री हेमेंद्रसूरीजी का चातुर्मास एवं मगसर सुदी ११ को अनसीबेन बागला को दीक्षा देकर सा. श्री राजेन्द्रसूरीजी राजकीय बालिका प्राथमिक विधालय, तीनथुई धर्मशाला, श्री राजेंद्रसूरीजी गिआनमंदिर, श्री राजेंद्रसूरीजी जैन भोजनशाला का निर्माण हुआ है| इस मंदिर की ध्वजा शा. भगवानदासजी जुहरमलजी बगला परिवार चढाते है|

श्री मुनिसुव्रत स्वामी मंदिर :

munisuvrat swami mandir

यह जिनालय वनाजी जगराहा चौहान परिवार द्वारा निर्मित हुआ है| इसकी अंजनशलाका प्रतिष्ठा, जोजावर रत्न आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी, मुनि श्री पद्मविजयजी आ. ठा. की पावन निश्रा में, वीर नि. सं. २४८७, शाके १८८२, वि.सं. २०१७ वर्षे, द्वि. जेष्ठ शु. ११, सोमवार, सन १९६१ को मोहत्सवपूर्वक संपन्न करवाई| शयामवर्णी पार्श्वनाथ प्रभु प्रतिमा लेख अनुसार वीर नि.सं. २४९०, वि.सं. २०२१, वै. सं. ६ को, आ. श्री जिनेंद्रसूरीजी के हस्ते इसकी अंजन-प्रतिष्ठा हुई है| मुखय बाजार में निचे लकारों की वास में चौहान परिवार ने, इस श्वेत पाषण से निर्मित, भव्य शिखरबंध, दो हाथियो से शोभित प्रवेशद्वार, कलात्मक रंगमंडप से श्रुंगारित जिनालय में भावपूर्वक , परमात्मा को प्रतिष्ठित करवाया| इसी परिवार ने फालना नगर में चौमुखा श्री शंकेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु के जीनालय का निर्माण करवाया है| 

munisuvrat bhagwan

श्री आदेश्वर दादावाड़ी :नगर के बस स्टैंड के पास विशाल बगीची में, श्री आदेश्वर दादावाड़ी स्थित है| पू. आ. श्री इन्द्रदिन्नसूरीजी की निश्रा में खनन व शिला स्थापना वि.सं. २०३६ मगसर वादी ५, बुधवार, दी. २६.११.१९८० को कारयकर्म संपन्न हुआ| दो साल में श्वेत पाषण जिनमंदिर तैयार हुआ| पुन: आ. श्री इन्द्रदिन्नसूरीजी की निश्रा में, वि.सं. २०३८ महा सुदी १०, गुरूवार, दी. 4.२.१९८२ को, श्री अदिनाथादी जिनबिंबो का जिनालय में मंगल प्रवेश करवाया गया| इस बीच मुलनायक श्रे आदिनाथ प्रभु की अंजनशलाका श्री पूनमचंदजी भीमाजी ललवाणी परिवार द्वारा सं. २०३७, माघ शु. १५, बुधवार को, तपा. आ. श्री धर्मसूरीश्वर्जी, आ.श्री जयानंदसूरीजी आ. वीर नि.सं. २५०९, शाके, वि.सं. २०३९, आषाढ़ कृष्ण ५, गुरूवार, दी.30 जून १९८३ को श्री नीति समूदायवर्ती आ. श्री सुशीलसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में सिद्धियोग व शुभ मुहर्त में दादावाड़ी जिनमंदिर में, मू. श्री आदिनाथादी तीन जिनबिंबो, प्रभुचरण पादुका, गुरुमूर्ति व चरण पादुका, यक्ष-यक्षणी, श्री अधिष्ठायक देव-देवियो की प्रतिष्ठा के साथ-साथ ध्वजा-दंड-कलशारोहण प्रतिष्ठा हर्षोलास से संपन्न हुई| यह दादावाड़ी जैन-अजैन सभी की शादी-बीयाह का आयोजन, सामूहिक रात्री भोज, सत्संग आदि सभी प्रकार के कारओकर्मो हेतु किराए पर दी जाती है|

aadeshwar dadawadi mandir

संगठन : श्री ओसवाल जैन सोशल ग्रुप, श्री संघ की सहयोगी संस्था है| श्री वीर मित्र मंडल, श्री नवयूवक मंडल भी सक्रीय संस्था है|

श्री अंबिका देवी मंदिर : पानी वास के नाके पर बहुत वर्ष पूर्व से श्री नेमिनाथ प्रभु की अधिष्ठाईका शासनदेवी, श्री जैन अंबिका देवी का भव्य एवं विशाल मंदिर स्थापित है| कमलाकार आसन पर माँ की प्राभावक प्रतिमा के सीर पर, प्रभु श्री नेमिनाथजी की दर्शनीय प्रतिमा अंकित है|

कोशेलाव : यहां के और विशेष स्थानों में हत्तीमाता मंदिर व रमणीय तालाब, पाहाडी पर ठीकरनाथजी का मंदिर, रामदेव बाबा मंदिर, गोशाला, मुक्तिधाम के साथ १२वि तक विधालय, बालिका विधालय, सोनीगरा, चिकित्सालय, पशु हॉस्पिटल, विविध परिवारों द्वारा निर्मित अनेक शीतल जालगृह, इलेक्ट्रिक बोर्ड, दूरसंचार, बैंक, सिचाई हेतु नहर, यातायात इतयादी साड़ी सुविधाए उपलब्ध है| विशेष करयकारी अधिकारी श्री भरतजी कोठारी यहां के सक्रीय कार्यकर्ता है|

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