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Latara

लाटाड़ा (नाहरगढ़)

गौरवशाली राज्य राजस्थान के पाली जिला अंतगर्त बाली तहसील में सुरम्य अरावली पर्वतमाला के चरणों में पश्चिम रेलवे के अहेमदबाद-दिल्ली रेलमार्ग के फालना स्टेशन से २६ की.मी. एवं जोधपुर-उदयपुर राज्य महामार्ग (वाया फालना-सादड़ी-राणकपुर) पर स्थित मुंडारा गाँव से मात्र ५ की.मी. दूर अवस्थित है “लाटाड़ा” गाँव|

इतिहास के पन्नों के संदर्भ से यह गाँव पूर्व में “नाहरगढ़” के नाम से जाना जाता था| जालोर रियासत में श्री वीरमदेवजी के वंशज श्री नाहरसिंहजी ने घने जंगल व वन्यजीव-जंतुओ से भरपूर अरावली पर्वतमाला की उपत्यकाओं की गोद में इसे बसाया था| कालांतर में सृष्टि के प्रकोप व भयभीत वातावरण होने से लोग अन्यत्र बसने लगे व गाँव निर्जन सा हो गया| पश्चात् इसी कुल के श्री लालसिंहजी ने ई. सन १५२६ में बादशाह बाबर के विरुद्ध पानीपत के युद्ध में अपने पिताश्री का साथ दिया और जागीरी के रूप में जिन ५ गाँवों को प्राप्त किया उनमें एक नाहरगढ़ भी था| श्री लालसिंहजी ने आरावली पर्वतमालाओं से ३ की.मी. दूर स्वयं के नाम से लाटारा गाँव बसाकर रावला स्थापित किया| इस प्रकार ठाकुरों व जागिदारों के अधिकार में रहता हुआ यह गाँव मेवाड़ रियासत के महाराणा कुंभा के अधीन हुआ| १७वि शताब्दी में जोधपुर पर मुसलमानों का आक्रमण हुआ तब कुंभलगढ़ मेवाड़ के महाराणा श्री राजसिंहजी ने जोधपुर नरेश श्री विजयसिंहजी की महारानी झालीकुंवर को धर्मपत्नी मानते हुए मेवाड़ में आश्रय दिया था| संग्राम समाप्ति के बाद धर्मपुत्री को विदाई में गोडवाड के जो ३६० गाँव दहेज़ में दिए थे , उनमे लाटाडा भी एक था|

“जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रन्थ के अनुसार , उस समय गाँव के बाजार में एक शिखरबद्ध जिनमंदिर था, जिसमें श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ मुलनायक श्री आदिनाथजी सह पाषण की ११ प्रतिमाएं एवं धातु की ७ प्रतिमाएं स्थापित करवाई गयी थी| पहले यहाँ २०० जैन , १ उपाश्रय और १ धर्मशाला थी| ओसवालों के ४० व पोरवालों के ५ घर विधमान थे|

गाँव के मध्य में एक गगनचुंबी शिखरबद्ध जिनालय है, जिसके गर्भगृह में संपूर्ण चांदी से मंडित पबासन सह शिखरयुक्त सिहांसन पर मुलनायक श्री आदिनाथजी सह श्री शांतिनाथजी व श्री संभवनाथजी की प्रतिमाएं विराजमान है| श्री जैन संघ लाटारा द्वारा प्रकाशित परिचय-निर्देशिका मुंद्राकित जानकारी के संदर्भ से, इतिहास से प्राप्त कुछ जीवंत दस्तावेजों के अनुसार, इस जिनालय का निर्माण वि.सं. १९७० , ई. सन मई १९१४ में श्री जैन संघ लाटारा द्वारा पूर्ण किया गया और उसी वर्ष वैशाख सुदी ६ के मंगल दिन प्रतिष्ठा संपन्न हुई|

उक्त तीनों प्रतिमाओं की पूर्व में अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २४२१,शाके १८१६, वि.सं. १९५१, माह सुदी ५, गुरुवार , फ़रवरी १८९५ में वरकाणा प्रतिष्ठा मोहत्सव में भट्टारक श्री राजसूरीश्वर्जी के करकमलों से प्रतिष्टित ६०० प्रतिमाओं के साथ हुई | श्री जैन संघ लाटारा के अनुसार, इन्हें वरकाणा पेढ़ी से प्राप्त कर यहाँ प्रतिष्टित किया गया| ध्वजा के लाभार्थी श्री भूताजी चेनाजी व लालचंदजी चेनाजी परिवार थे|

समयनुसार आगे श्री संघ ने मंदिर का जिणोरद्वार व प्राचीन श्री आदिनाथजी व श्री शांतिनाथजी सह  श्री नूतन गौमुख-यक्ष , चकेश्वरी देवी, नूतन दंड तथा मंगलमूर्ति ३ आदि की महामंगलकारी प्रतिष्ठा एवं श्री घंटाकर्ण महावीर के पट्ट की स्थापना का निर्णय लेकर शासन सम्राट वडिल,विधानुरागी,सौजन्य मूर्ति प.पू. आचार्यदेव श्रीमद् विजय देवसूरीश्वर्जी की आज्ञा एवं शुभाशीर्वाद पूर्वक मरुधर देशोद्वारक प.पू. आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय सुशीलश्वर्जी म.सा. आदि ठाणा की निश्रा में वीर नि.सं. २५२३,शाके १९१८ , वी.सं. २०५३, वैशाख सुदी ६, सोमवार दी. १२-५-१९९७ को शुभ मुहूर्त में भव्य समारोह संपन्न करवाया| प्रतिवर्ष शा. गुलाबचंदजी वालचंदजी श्रीश्रीमाल परिवार ध्वजा चढाते है|

इसी शुभ मुहूर्त में प.पू. आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय सुशीलसूरीश्वर्जीम.सा. ने अपने करकमलों से शिष्य उपाध्याय श्री जिनोत्तम विजयजी गणीवर्य म.सा. को शुभ घड़ी में श्री नमस्कार महामन्त्र के तृतीय पद अर्थात आचार्य पद श्री अलंकृत कर अपना पट्टधर घोषित किया|

संयम पथ : “लाटाडा” के निवासी श्री संदीप अमरचंदजी चोपड़ा ने ३० वर्ष की युवा में गणिवर्य मु. श्री रत्नसेन विजयजी की निश्रा में सं. २०५८, वैशाख वदी १०, दी. ५-९-२००२ को भायंदर(मुंबई) में दीक्षा ग्रहण की व पू. मु.श्री केवल्यरत्न विजयजी म.सा. नाम धारण किया| इसके पूर्व पू.मु. श्री रामविजयजी ने दीक्षा लेकर गाँव का नाम रोशन किया|

मंदिरजी के वर्षगांठ के प्रसंग पर वि.सं. २०६१, वैशाख सुदी ३, दी. ११-५-२००५ से वैशाख सुदी ७, दी. १५-५-२००५ तक, प.पू. शासन प्रभावक आ. भ. श्री विजय पद्ममसूरीश्वर्जी व प.पू. आचार्य श्री विजय यशोभद्रसुरिश्वर्जी म.सा. आदि ठाणा की निश्रा में पंचाहिनका मोहत्सव सह शांतिस्नात्र महापूजन हर्षोल्लास से संपन्न हुआ| गच्छाधिपति प.पू. हेमप्रभसूरीश्वर्जी म.सा. की आज्ञानुवर्ती साध्वी आनंदमालाश्रीजी की शिष्यरत्ना विदुषी साध्वी श्री रत्नामालाश्रीजी म.सा. आदि ठा का वि.सं. २०६८ में दी. १०-७-२०११ को चातुर्मास हेतु मंगल प्रवेश हुआ|

प.पू.योगनिष्ठ आ. श्री कीर्तिसागरसूरीश्वर्जी म.सा. के शिष्यरत्न, प.पू. प्रवचन प्रभावक आ. श्री उदय कीर्तिसागरसूरीश्वर्जी म.सा. के शिष्यरत्न युवा मुनिराज श्री विश्वोदय कीर्तिसागरसूरीश्वर्जी म.सा आदि ठाणा व साध्वीजी श्री रत्नशीला श्री जी म.सा. आदि ठा. का, चातुर्मास हेतु मंगल प्रवेश , रत्नत्रयी त्रिदिवसीय मोहत्सव सह वि.सं. २०६९ , आषाढ़ सुदी १२, दी. २८-६-२०१२ को हुआ|

वर्तमान में यहाँ जैन समाज की १२६ ओली(होती) एवं जैन संख्या ६०० के करीब है| गाँव की कूल जनसंख्या ३००० के लगभग है| श्री जैन संघ लाटारा व लाटारा सोशल ग्रुप ये संस्थाए कार्यरत है|ई. १९९२ तथा २००३ में श्री संघ लाटारा द्वारा परिचय निर्देशिका का प्रकाशन हुआ है|

गाँव विशेष : गाँव के एक तरफ अरावली की पर्वत श्रुंखलाए व दूसरी तरफ श्री बिलेश्वर महादेवजी का अति प्राचीन मंदिर है| इसी तरह पूर्व में श्री चारभुजाजी का मंदिर एवं पश्चिम की तरफ हत्ती माताजी का स्थान अवस्थित है| यहाँ विशाल तालाब है, जिसके निकट एक प्राचीन पनघट है, जो लालजी महाराज की बगेची के नाम से लोकप्रिय है| बगेची के दोनों ओर मोमोजी बावसी व खेतलाजी के स्थान मौजूद है| गाँव के मुख्य प्रवेशद्वार पर श्री हनुमानजी का मंदिर गाँव के शिरोमणि सा शोभायान है| इसके अतिरिक्त ठाकुरजी महाराज व रामदेवपीर सह अन्य जैनेतर मंदिर यहाँ पर है| यहाँ राजकीय माध्यमिक विधालय, हॉस्पिटल , लाटारा बांध से सिंचाई, दूरसंचार, डाकघर व मिनी ग्रामीण बैंक आदि सभी सुविधाएं है|

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