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Panchetiya

पांचेटिया

 

राजस्थान प्रांत के पाली जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर मंडली से मेगा हाईवे द्वारा बुसी से वाया भीमालिया ३८ की.मी. दूर एवं भीमालिया रेलवे स्टेशन से ५ की.मी. दूर मुखय बाजार में रावल के पास नवनिर्मित त्रिशिखरी, संपूर्ण श्वेत आरस पाषण से विभूषित कलात्मक जिनप्रसाद में श्वेतवर्णी, १९ इंची, पद्मासनस्थ, असंभव को भी संभव कर दे ऐसे तीसरे तीर्थंकर मुलनायक श्री संभवनाथजी, श्री सुपर्श्वनाथजी, श्री विमलनाथजी आदि जिनबिंबो, गुरु जिनेन्द्रसूरीजी गुरुबिंब, अधिष्ठायकदेव-देवताओ की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २५३२, शाके १९२७, वि.सं. २०६२, जेठ सुदी ५ गुरूवार, दी. 1 जून २००६ को, प्रतिष्ठा शिरोमणि पू. आ. श्री पद्मसूरीजी आ. ठा. एवं आग्लोड़ तीर्थोद्वारक आ. श्री आनंदधनसूरीजी के आगियानुवर्ती, तपस्वीरत्न आ. श्री विश्वचंद्रसूरीजी आ. ठा. एवं चतुर्विध संघ की उपस्थिति में भावोल्लास से संपन्न हुई| मुलनायक श्री संभवनाथजी प्रतिमा लेख के अनुसार, इसकी अंजनशलाका तपा. पं. कलयाणविजयजी गणी के हस्ते संपण हुई है|

इतिहास के झरोखे से : इतिहास की पूर्व जानकारी अनुसार, करीब ३५० से ४०० वर्ष पहले हिंगड़ परिवार ने शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाकर मुलनायक श्री सुपार्श्वनाथजी आदि जिनबिंबो को स्थापित किया, ऐसा कहा जाता था|

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जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ” ग्रंथ क्र अनुसार, घानेराव निवासी हिंग्दोए या हिंगडो ने वि.सं. १६५० में शिखरबद्ध, जिनालय का निर्माण करवाकर, मुलनायक श्री चंद्रप्रभुस्वामीजी सहित पाषण की ५ और धातु की २ प्रतिमाए स्थापित करवाई तथा वहीवट हेतु श्री संघ को सौप दिया| उन दिनों यहां ११२ जैन, 1 उपाश्रय और 1 धर्मशाला होने का उल्लेख है| प्रतिमा का लेख सं. १९०३ का है|

कालांतर में श्री संघ द्वारा वीर नि. सं. २४५०, शाके १८४५, वि.सं. १९८०, ई. सन १९२४ में, मारवाड़ जंक्शन में विराजे गुरोसा श्री लब्धिसागरजी (बांतावाले) के हस्ते मुलनायक छठे तीर्थंकर श्री पद्मप्रभुजी की प्रतिष्ठा धूमधाम से कराई गई|

वीर नि.सं. २४८३, वि.सं. २०१३ और ई. सन १९५७ में पुण: श्री संघ ने नाकोडा तीर्थोद्वारक, मेवाड़ केसरी पू. आ. श्री हिमाचलसूरीजी की निश्रा में, मुलनायक दसवे तीर्थंकर श्री शीतलनाथादी जिनबिंबो की प्रतिष्ठा कराई| उपरोक्त प्रतिष्ठा में पू. आ. श्री कैलाशसागरजी और पू. मू. श्री पद्मसागरविजयजी (वर्तमान में आचार्यश्री) आ. ठा. की भी उपस्थिति थी| 

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पुन:-पुन: प्रतिष्ठाओ का सिलसिला जारी रहा. गोडवाड़ शेत्र उद्धारक शांतिमूर्ति, ४०० वर्ष के सुनहेरे इतिहास में २४५ जिन्मंदिरो के प्रतिष्ठाकारक जोजावर रत्न, पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरीश्वर्जी आ. ठा. की निश्रा में श्री संघ के आदेश से वीर नि.सं. २४९१, शाके १८८६,ई. सन १९६५ और वि.सं. २०२१ में, पुन: श्री सुपर्श्वनाथजी मुलनायक के रूप में व अन्य जिनबिंब स्थापित कर प्रतिष्ठा संपन्न हुई |प्रतिष्ठा से पहले आचार्यश्री ने कहा की जिनालय का निर्माण शिल्पशास्त्र अनुसार नहीं है इसलिए प्रतिष्ठा न करवाकर पहले जिणोरद्वार कर इसकी त्ररूटिया दूर करो, लेकिन श्री संघ के आग्रह से प्रतिष्ठा करवाई |

समय-समय पर जिणोरद्वार की चर्चाए चलती रही, मगर योग नहीं बना| सं. २०३२ से सं. २०५३ तक सिर्फ चर्चाओं का निरंतर सत्र चलता रहा| सं. २०५३ में आ. श्री पद्मसूरीजी की निश्रा में अष्ठाहिनका मोहत्सव के आयोजन दरमियान पुन: चर्चा हुई, मगर बात नहीं बनी| आगे वि.सं. २०५७ में आ. श्री आनंदधनसूरीजी आ. ठा. पांचोठीया पधारे और श्री संघ के आग्रह पर मंदिर का निरिक्षण करके, अनेक तरुटिया बताते हुए आ. श्री पद्मसूरीजी से सलाह करके जिणोरद्वार करवाने की प्रेरणा दी |

कुछ दिनों के बाद श्री पद्मसूरीजी के आगमन पर विस्तृत चर्चा करके श्री संघ ने जिणोरद्वार का निर्णय लेकर दी. ५.६.२००२ को जनरल सभा में रकम लिक्वाकर जिणोरद्वार प्रारंभ करवाया एवं वि.सं. २०६०, मगसर वदी ६, दी. १५.११.२००२ के शुभ दिन चलप्रतिष्ठा तथा खाद मुहर्त तथा वि.सं. २०६०, महा सुदी ५, दी. २६.1.२००३ को मंदिरजी का शिलान्यास पू. आ. श्री पद्मसूरीजी की निश्रा में संपन्न करवाया | दो साल बाद निर्माण की पूर्णता पर वि. सं .२०६२, जेठ सु. ५, गुरूवार दी. १.६.२००६ को प्रतिष्ठा संपन्न हुई| श्रीमती प्यारीबाई वगतारमलजी संचेती परिवार कायमी ध्वजा के लाभार्थी बने| उपाश्रय में अधिष्ठयकदेव लगभग दो सौ वर्ष प्राचीन है| वर्तमान में ६६ जैन परिवार है और ३०० के करीब जनसंख्या है| ग़ाव की कूल जनसंख्या ३००० के करीब है| १०वि तक सरकारी स्कूल, हॉस्पिटल, पुलिस ठाना मारवाड़ जंक्शन आदि सुविधाए है| जैनों के आलावा ५ मंदिर अजैनो के भी है|

संयम : ग़ाव से एकमात्र दीक्षा कु. नीतू रूपचंदजी संचेती की ३ वर्ष पूर्व संपन्न हुई और वे सा. श्री हंसकृपाश्रीजी के नाम से प्रसिद्द हुई| आप ३००वि ओली की तपस्वी सा. हंसाकीर्तिश्रीजी की शिष्या बनी है|

क्रान्तिकारियो की शरणस्थली ग्राम पंचोटीया : वृद्ध और विद्धान निवासियो से प्राप्त जानकारी के अनुसार, बंगाल के क्रांतिकारी, जो यहां “बिहारी बाबू” के नाम से जाने जाते थे, को राजस्थान के विख्यात क्रांतिकारी, ठा. केशरीसिंहजी व प्रतापसिंघजी पांचेटीया ग्राम लाए थे और वे स्वयम अपने रिश्तेदार श्री चंडीदानजी के नौहरे में घास-चारे के ढेर के पीछे छिपकर रहे थे |यही से उन्होंने कुछ शास्त्र व बम बनाने का सामान एकत्रित का कलकत्ता भेजा था| बाद में भेद खुल गया, प्रतापसिंहजी गिरफ्तार हुए, लेकिन बाकी सब भाग गए | ठा. केशरीसिंघजी बारहठ ने अपनी पुत्री चंद्रमणि को एक पत्र में लिखा था – “पांचेटिया भ्रातवृंद का उपकार मेरे हृदय पटल पर सदा अंकित रहेगा |”

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