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Sadri

सादड़ी

 

सह्याद्री, सादी, सादरी व सादड़ी

विश्वविख्यात राणकपुर तीर्थ एवं प्राचीन तपोभूमि परशुराम महादेव की छत्रछाया में मध्यवर्ती अरावली के पश्चिमी छोर की तलहेटी में तथा मधाई व सुकडी नदी के संगम पर बसी है गोडवाड़ की सिरमौर नगरी “सादड़ी“| सादड़ी का मूल संस्कृत नाम है “सह्याद्री“| अपभ्रंश होते-होते साडी, सादरी, सादड़ी बन गया |

प्राचीनता : १२ वि शताब्दी के पूर्व यहां एक बड़ा ही रमणीय तालाब था- रानेश्वर तालाब और इसके साथ थी कुछ आदिवासी बस्तिया| मुखय बस्ती का प्रारम्भ बाड़मेर से यहां आए कुछ नंदवाणा बोहरा| ब्रहमान परिवारों से हुआ| बाद में ओसिया से जैन परिवारों से इसका विस्तार हुआ| १७ वि शताब्दी में महाराणा प्रताप के चौथे वंशज महाराणा राजसिंघजी ने अपनी धर्मपुत्री झालीदेवी के विवाह में मारवाड़ नरेश महाराजा विजयसिंघजी को गोडवाड़ प्रदेश सहर्ष दहेज़ में दे दिया| महारानी झालिदेवी को सादड़ी का प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण एवं सुखी और समुद्र जनजीवन मन में भा गया और उन्होंने यहां अपना निवास बनवाया तथा अपना अंतिम समय भी बिताया | महाराणा प्रताप ने भामाशाह के भाई श्री ताराचंदजी कावेडिया को उनकी वीरता, विश्वसनीयता, सैनय कुशलता व प्रशासनिक योगयता से प्राभावित होकर गोडवाड़ प्रदेश का ठाकुर (प्रशासक) नियूक्त किया था| इनका निवास स्थान सादड़ी में ही रहा| प्रशासन से सीधा संपर्क रहने के कारण इसे “धनियो री सादड़ी” के नाम से पहचान मिली| आर्थिक संपन्नता के कारण इसे “साहुकारो की सादड़ी” नामकी प्रसिद्धी मिली एवं यहां के लोगो को “सादड़ी के साहूकार” की पहचान मिली| सादड़ी के जागेश्वर मंदिर के सं. ११४७ के शिलालेख से भी इसकी प्राचीनता प्रकट होती है तथा उस समय यहां राजा जोजलदेव का राजय था| आज सादड़ी की आबादी दानियो-झुपो सहित करीब ४० हजार की है| इसमें जैन समाज की जनसंख्या लगभग १६००० है| पुरे पाली जिले में पाली शहर के बाद जैन आबादी में सादड़ी का ही स्थान है| जैन धर्म के चारो पंथो के शासन प्रेमी यहां आपसी सदभाव से निवास करते है| मंदिरमार्गी एवं स्थानकवासी दोनों ही सामुदाओ के मंदिर, उपाश्रय एवं स्थानक धार्मिक प्रवृतियो के केंद्र रहे है| आज सादड़ी में छोटे-बड़े १८ जैन मंदिर है| इनमे सबसे प्राचीन अर्द्धबावन जिनालय श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ का है|

१. श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ :

2

सादड़ी में जैनों का वर्चस्व बढता रहा, जिससे कई जैन मंदिरों का निर्माण हुआ| १२वि शताब्दी में नगर के मध्य, रावले के पास व देहरो-वास में श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान का भव्य कलात्मक शिखरबंध चौविसी जिनालय का निर्माण हुआ, जिसमे पाषण की १४४ एवं धातु की ७८ मुर्तिया है| 

मुलनयक प्रतिमा पर संवत १२२८ का लेख है| एक हाथ बड़ी आदमी पाषण की यह प्राचीन प्रतिमा अति मनमोहक है| अनेक प्रतिमाए संप्रतिकालीन है| भोयरे में प्राचीन धातु की कई प्रतिमाए है| रंग’मंडप की छत में अस्पष्ट सं. १७५२ वर्षे फागन वादी 1 रविवार का लेख है| गुरु प्रतिमा अतअंत आकर्षक है, जिस पर संवत् पड़ने में नहीं आता, मगर फा. वादी २ रवि दिन पढ़ने में आता है| मंदिर के पीछे रावला में (जो जैन समाज की वास्तु है) २ खड़े शिलालेख रखे है, जिसमे संवत् १२१.. चैत्र वदी 1 पढ़ने में आता है| संवत् १७५० में इस भव्य मंदिर का पहला जिणोरद्वार हुआ व उसके बाद दूसरा सं. २०२१ में संपन्न हुआ| आ. श्री आनंदविमलसूरीजी ने १६वि शताब्दी में सादड़ी में प्रतिष्ठा करवाई थी| नूतन आचार्य बने सुशीलसूरीजी का सं. २०२१ में चातुर्मास हुआ व आपश्री की निश्रा में सं. २०२२ वै सु. ५ को, प्राचीन श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर के जिणोरद्वार बाद नूतन बनी हुई २४ देहरियो पर, १५१ प्राचीन जिनबिंबो की प्रतिष्ठा मनागल मुहर्त में संपन्न हुई| आपश्री की निश्रा में पुन: सं. २०३५ में भी प्रतिष्ठा हुई| वै. सु. ५ को श्री ओटरमलजी सागरमलजी रंका परिवार ध्वजा चढाते है|

कुछ और तथय : वि.सं. १२७३, फा.व. २, रवि को आ. श्री धर्मसिंहजी गुरुमूर्ति पर उत्कीर्ण लेख व अन्य ३ लेख-संदर्भ : यतींद्रसूरी ग्रंथ-इतिहास भाग में पृष्ठ नं. ३३ पर 

* वि.सं. १७२७ में आ. श्री हीरसूरीजी के शिष्य परंपरा के उपा. श्री मेघराजजी ने “देवानंद महाकवय” की रचना सादड़ी में की थी, जिसकी पूर्णता यही पर विजयादशमी को की थी| संदर्भ : यतींद्रसूरी अभिनंदन ग्रंथ के पृष्ठ नं. २४७ पर|

* भट्टारक श्री विजय देवसुरी ने सं. १६८६ में सादड़ी में राणा कर्णसिंह की सभा में गीतार्थी को भेजकर लौंकागच्छ वालो को शास्त्रार्थ में पराजित किया था|

* वि.सं. १५२३ वै. सु. ६ को श्री शांतिनाथ चौविसी की प्रतिष्ठा तपा. श्री लक्ष्मीसागरसूरीजी के हाथो संपन्न हुई थी|

* आ. श्री वल्लभसूरीजी शिष्य आ. श्री ललितसूरीजी की निश्रा में सं. १९७७ जेष्ठ सु. १२ दी. ४.६.१९२१ को सादड़ी में श्री आत्माराम मंदिर मार्गी जैन विधालय सादड़ी ऐसा नामकरण हुआ|

* मुंबई देशोद्वारक मू. श्री मोहनलालजी म.सा. यहां चातुर्मास हुआ है|

* वि.सं. १९७२ का चातुर्मास शासन सम्राट आ. श्री नेमिसुरीजी ने किया व चातुर्मास के बाद अपने ४ पं मुनियो को मगसर मॉस में “उपाधयाय पद” प्रदान किया| सं. १९७२ आषाढ़ सु. ५ को आ. श्री लावण्यसूरीजी को दीक्षा दी व चातुर्मास बाद सं १९७३ मगसर आषाढ़ सु. ५ को बड़ी दीक्षा दी थी|

* वि.सं. १९७६, १९८९ व २००६ के तीन चातुर्मास आ. श्री वल्लभसूरीजी ने किए व प्रतिष्ठाए करवाई |

* वि.सं. २०४० में राजस्थान दिवाकर पू. आ. श्री मनोहरसूरीजी के चातुर्मास दरमियान भादरवा वदी 7 को स्वर्गवास हुआ|

* वर्तमान गच्छाधिपति आ. श्री हेमप्रभसूरीजी की दीक्षा, वि.सं. २०१७ आषाढ़ सु. ७ को, आ. श्री महेंद्रसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई थी| अखंड वर्षीतप तपस्वी आ. श्री वसंत’सूरीजी की दीक्षा, वि.सं. २००६, वै. व. १०,ई. सन १९४९ को आ. श्री वल्लभसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई और मू. श्री विचारविजयजी के शिष्य बने तथा बड़ी दीक्षा वै.सु. ६ को संपन्न हुई|

“जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार खरतरो के उपाश्रय में हीराचंदजी मुथा द्वारा संचालित श्री नेमिनाथ प्रभु का सं. १७५० का घर मंदिर वर्तमान में नजर नहीं आया| इस प्रतिमा पर सं. १२२८ का लेख है| कूल ५ प्रतिमाए थी|

* सादड़ीनगर की पावनभूमि में सन १९५२ में १०८० साधू-साध्वियो एवं ७०,००० श्रावक-श्राविकाओ की उपस्थिति में २२ आचार्यओ त्याग कर “एक आचार्य, एक आगिया(विधान), एक निशाँ” की संघ एकता की जो पताका वह विश्व के इतिहास में एकमेव है|

* माहेश्वरी समाज के प.पू. आचार्य जगताचार्य श्री बालमुकुंदाचार्यजी का जन्म १८० वर्ष पूर्व सादड़ी में हुआ| आपश्री झालरिया पीठ डीडवाना (राजस्थान) के मठाधीश हुए|

२ . श्री शांतिनाथ मंदिर :बड़ा मंदिर श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ के बिलकुल पास में रावला से लगकर बड़ावास में श्री शांतिनाथ प्रभु का मंदिर है, जिसकी जिणोरद्वार के बाद प्रतिष्ठा सं. २००१ मगसर सुदी ७ बुधवार को आ. श्री वल्लभसूरीजी के शिष्य मू. श्री कपूरविजयजी व पं. श्री विकास विजयजी गनी के वरद हस्ते संपन्न हुई थी| पास ही उपाश्रय है, जिसमे जागृत अधिष्ठायक श्री मणिभद्रवीर की प्रतिमा स्थापित है| “जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” के अनुसार बड़ा मंदिर के पास पार्श्वनाथ प्रभु का घर देरासर है व तीन पाषाण प्रतिमाए प्रतिष्ठित है, जिनका सं. १७५० में जिणोरद्वार हुआ तथा प्रतिमा पर सं. १२२८ के लेख की बात लिखी है, जिसका सेठ आ. क. पेढि वहीवट करती है| मगर वर्तमान में मंदिर नहीं है, शायद शांतिनाथजी का मंदिर ही पूर्व में पार्श्वनाथजी का रहा हो |

३ . श्री महावीर स्वामी मंदिर :

न्यू आबादी में सेठ धर्मचंद पेढि के पास, शिखरबंध कांच के मंदिर में मुलनायक श्री महावीर स्वामी की प्रतिमा विराजमान है, जिसकी प्रतिष्ठा वि.सं. २०३६ (वीर सं. २५०५) वैशाख सुदी १३, गुरूवार दी. १०.५.१९७९ को आ. श्री सुशीलसूरीजी के हाथो प्रतिष्ठा अंजनशलाका संपन्न हुई थी| प्रभु अजितनाथ. श्री कुंथुनाथ के साथ गुरु गौतम की प्रतिमा प्रतिष्ठित है| पास में उपाश्रय है|

४ . श्री संभवनाथ स्वामी व आ. श्री जिनदत्तसूरीजी दादावाड़ी :सादड़ी नगर के मुखय बाजार में, प्रभु श्री संभवनाथ प्रभु के सुंदर शिखरबंध जिनालय की प्रतिष्ठा अंजनशलाका वि.सं. २०५० (वीर सं. २५१९) के वैशाख सुदी ६ बुधवार को खरतरगच्छीय मू. श्री मोहनलालजी के प्रशिष्य मू. श्री जयानंद मुनिजी के करकमलों से संपन्न हुई| प्रभु के साथ ज.यू. प्र.आ. श्री जिनदत्तसूरीजी की दादावाड़ी में गुरु प्रतिमा प्रतिष्ठित है| श्री परसमलजी पुखराजजी बच्छावत परिवार दवाजा चढाते है|

५ . श्री सुविधिनाथ स्वामी : निम्बडा की पाटी में पोरवाल जैन संघ न्याति नोहरा में शा. मूलचंदजी रूपचंदजी सोलंकी कासव गोत्र परिवार द्वारा निर्मित जिनालय में मुलनायक श्री सुविधिनाथ आदि जिनबिंबो की प्रतिष्ठा वीर सं. २५१९, वि.सं. २०४९ के मार्गशीर्ष सुदी ६ सोमवार दी. 30.११.१९९२ को आ. श्री इन्द्रदिनसूरीजी, महातपस्वी पं. श्री वसंतविजयजी की निश्रा में संपन्न हुई|

६ . पावापुरी जल मंदिर :

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मुलनायक श्री महावीर स्वामी प्रभु के, समवसरण यूक्त भव्य-दीव्य शिखरबंध जल मंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वि.सं. २०३६ (वीर सं. २५०५) वैशाख सुदी १३ गुरूवार दी. १० मई १९७९ को आ. श्री सुशीलसूरीजी म.सा. आ. ठा. एवं आ. श्री वल्लभसूरीजी प्रशिष्य, मरुधर रत्न मू. श्री वल्लभदत्त विजयजी (फक्कड़ महाराज) आ. ठा. के वरद हस्ते संपन्न हुई | इसी दिन कांच मंदिर व श्री अंबिका माता मंदिर की प्रतिष्ठा संपन्न हुई थी|

पहले यहां सिर्फ भूगर्भ से प्राप्त “पगलिया” प्रतिष्ठित थे, जो वर्तमान में मूल गंभारे के पीछे प्रतिष्ठित है| मंदिरजी के साथ गौशाला भी है| हर वर्ष वै. सु. १३ को श्री जावंतराजजी नथमलजी रंका परिवार ध्वजा चढाते है |

७ . श्री चौमुखा ऋषभदेव मंदिर :सादड़ी बस स्टैंड के पास आंकऱिया विधाचाल में श्री आत्मानंद जैन धर्मशाळा के प्रागंण में स्थित कूल चार जिन मंदिरों में दाई तरफ सबसे अंतिम शिखरबंध जिनालय में चतुर्मुख ऋषभदेव प्रभु की आकर्षक प्रतिमाए प्रतिष्ठित है| श्री लालचंदजी किसनाजी करबावाला परिवार द्वारा निर्मित इस जिनप्रसाद की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर सं. २४७५ व वि.सं. २००५ महा सुदी-५  (वसंत पंचमी) गुरूवार को आ. श्री वल्लभसूरीजी व पं. प्रवर आदि २२ मुनिवर तथा ६० साध्वीजी की निश्रा में संपन्न हुई| सादड़ीरत्न आ. श्री पूर्णानंदसूरीजी की प्रेरणा से इसका निर्माण हुआ| पहले यह छोटा गुम्बदबंध जिनालय था| जिणोरद्वार द्वारा चौमुखा मंदिर हेतु, वि.सं. १९९७ मगसर वदी २ को शिलान्यास हुआ व वि.सं. २००१ मगसर सुदी 7 को पूर्व की प्रभु ऋषभदेवजी की स्थापित चरणपादुका का उथापण करके श्री ऋषभदेवजी की चौमुखा प्रतिमाजी को प्रतिष्ठित किया गया| बाद में इसी मंदिर में नाकोडा पार्श्वनाथ आदि जिनबिंब, पंचतीर्थी, देव-देवी की प्राण प्रतिष्ठा हुई| वि.सं. २०६१ माघ सु. ५ को अंजनशलाका व माघ सु. ६ सोमवार दी. १४.२.२००५ को आ. श्री पद्मसूरीजी के हस्ते प्रतिष्ठा संपन्न हुई| इसी मुहर्त में दुसरे ऋषभदेव मंदिर की भी प्रतिष्ठा संपन्न हुई |

८ . श्री ऋषभदेव मंदिर :

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विधाचल में चौमुखा मंदिर के ठीक पास, में सादड़ीरत्न आ. श्री पूर्णानंदसूरीजी के सदउपदेश से सूने की इटवाले शेष्ठी चंदनमलजी पूनमचंदजी पोरवाल परिवार ने शिखरबंध जिनालय का निर्माण करवाकर वि.सं. २००५ (वीर सं. २४७५) महा सुदी ५, गुरूवार को प्रात: १०.४४ बजे अंजनशलाका एवं १०.५४ बजे आ. श्री वल्लभसूरीजी के पुनीत करकमलों से ५० के करीब जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न करवाई| इसका खात (खनन) मुहर्त वि.सं. १९९६ के मार्गशीर्ष वदी प्रतिपदा-1 को शुभ मुहर्त में हुआ था| बाद में वि.सं. २०५४ मार्गशीर्ष वदी १२, बुधवार को प्रतिष्ठाचार्य पंजाब केसरी आ. श्री वल्लभसूरीजी की गुरु प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा पट्टधर आ. श्री धर्मधुरंधरसूरीजी के हाथो संपन्न हुई|

९ . श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर :

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सादड़ी आंकऱिया बस स्टैंड के विधाचल में श्री आत्मानंद जैन धर्मशाळा प्रागंण में संघवी बाबुलाजी वालचंदजी रंका परीवार द्वारा नवनिर्मित, दैदीप्यमान रथाकर जिनप्रसाद का निर्माण, गच्छाधिपति आ. श्री रामचंद्रसूरीजी से प्रेरणा पाकर करवाया, जिसमे १०९ इंची हरित शयामवर्णी पुरुषदानी श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ सह अन्य जिन व इष्ट बिंबो की अंजनशलाका व प्रतिष्ठा, वीर सं. २५१९ वि.सं. २०४९ मार्गशीर्ष शु. १० शुक्रवार दी. 4.१२.१९९२ के शुभ दिन, गच्छाधिपति आ. श्री इन्द्रदिन्नसूरीजी आ. ठा. एवं आ. श्री जितेन्द्रसूरीजी आ. ठा. के सान्निध्य में संपन्न हुई| इसका भूमिपूजन मू. श्री जिनसेन विजयजी व शिलान्यास आ. श्री जितेन्द्रसूरीजी की निश्रा में संपन्न हुआ था|

१० . श्री आदेश्वरजी मंदिर :

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विधाचाल के आत्मानंद जैन धर्मशाला प्रागंण में राणकपुर तीर्थ की अंतिम प्रतिष्ठा (सं २००९) के प्रतिष्ठाचार्य आ. श्री उदयसूरीजी व आ. श्री नंदनसूरीजी एवं सादड़ी रत्न आ. श्री पूर्णानंदसूरीजी से प्रेरणा पाकर शेष्टि श्री फूलचंदजी वीरचंदजी ने इस शिखरबंध जिनालय का काम प्रारंभ वि.सं. २०१० के श्रावण शु. ८ को एवं शिलान्यास श्रावण शु. ८ को एवं शिलान्यास श्रावण शु. १४ को मू. श्री मेरुविजयजी के करकमलों से करवाकर, वि.सं. २०१५ के माघ शु. १० बुधवार को वल्लभसमूदायवर्ती आया. श्री समुद्रसूरीजी के वरद हस्ते इसकी प्रतिष्ठा करवाकर इस संप्रतिकालीन प्राचीन श्री आदेश्वर भगवान की प्रतिमा को मुलनायक के रूप में प्रतिष्ठित किया |

११. श्री चंद्रप्रभुस्वामी मंदिर : जूना राणकपुर रोड पर बाई तरफ प्राचीन धर्मशाला में शिखरबंध जिनालय में संप्रतिकालीन मू. श्री चंद्रप्रभुस्वामी की श्वेतवर्णी २९ इंची प्रतिमा के साथ त्रिगडे की किसी भी प्रतिमा पर नाम व लेख नहीं है| छोटे स्तंभों पर खुले मंडप वाला यह मंदिर मध्यम विशालता लिए हुए है |इसी के बगल में धर्मशाला तथा पास में ही एक हिरावाव व चौतरा है| से. आ. क. पेढि वहीवट संभालती है| इसका निर्माण वि.सं. १९५० के आसपास हुआ है| मंदिर में पगलियाजी व अंबिकादेवी की देरी है| एक गृहस्थ यूगल की मूर्ति भी विधमान है| चंदालिया परिवार ध्वजा चढाते है |

१२ . श्री संभवनाथजी मंदिर : न्यू आबादी के गणेश चौक में के शिखरबंध जिनमंदिर में मुलनायक प्रभु श्री संभवनाथ स्वामी की प्राण प्रतिष्ठा वि.सं. २०३२ जेठ सु. १० को संपन्न हुई| एक देहरी में आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी की गुरुमूर्ति स्थापित है| पहले यह मंदिर शिखरबंध नहीं था, नीचे उपाश्रय व ऊपर प्रभु विराजमान थे |श्री वक्तारमलजी मीठालालजी पंडया परिवार ध्वजा चढाते है| 

१३. श्री ऋषभदेवजी मंदिर :

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सादड़ी से २ की.मी. दूर राणकपुर रोड पर दाई तरफ मधाई नदी के किनारे प्राचीन शिखरबंध जिनालय में पास-पास दो देहरिया है| एक में मुलनायक श्री ऋषभदेव व दुसरे में शांतिनाथ प्रभु की अति प्राचीन प्रतिमा प्रतिष्ठित है| दो शिखरबंध अन्य देहरियो में त्रिगडे प्रतिष्ठित है| ९ पाषाण व 1 धातु की प्रतिमा है| इसका प्रथम जिणोरद्वार सं. १७५० में हुआ व अंतिम जिणोरद्वार सं. २०१५ में संपन्न हुआ| मंदिर की ध्वजा मगसर सु. ५ को चढाते है| सेठ आ. क्र. पेढि वहीवट संभालती है| पास ही में धर्मशाला व बावड़ी बनी हुई है|

१४ . श्री अंबिकादेवी मंदिर : देहरो के वास में बड़े मंदिर के पास स्थित श्री संतोष प्राचीन भंडार के पास शिखरबंध मंदिर में प्रभुश्री नेमिनाथजी की अधिष्ठाइक श्री अंबिकादेवी की मूर्ति स्थापित है| मूर्ति के सीर पर जिनप्रतिमा प्रतिष्ठित है| श्री फूलचंदजी कुंदनमलजी रंका परिवार द्वारा निर्मित इस मंदिर की प्रतिष्ठा वि.सं. २०३६ वै. सु. १३, गुरूवार दी. १० मई १९७९ को आ. श्री सुशीलसुरीजी व मरुधररत्न मू. श्री वल्लभदत्त विजयजी के सान्निध्य में संपन्न हुई थी| इसी मुहर्त में पावापुरी जल मंदिर की प्रतिष्ठा हुई|

* आदर्श विधालय परिसर में प्रतिष्ठित ५१ इंच की मनमोहक प्रतिमायूक्त गोडवाड़ शेत्र में निर्मित एक मात्र माँ सरस्वती का विधामंदिर है|

१५ . चक्रेश्वरी माता मंदिर : सादड़ी के पंडया वास है, आदेश्वर प्रभु की अधिष्ठाईका अष्टभुजाधारी श्री चक्रेश्वरी माता की महाप्रभावक तकरीबन २५० वर्ष प्राचीन व नाक में नथ धारी, ९ इंची सुन्दर प्रतिमा ई. सन २००० में आ. श्री नित्यानंदसूरीजी के वरद हस्ते प्रतिष्ठित है|

१६ . आ. श्री पूर्णा नंदसूरी गुरु मंदिर : सादड़ी राणकपुर रोड पर आत्मवल्लभ हॉस्पिटल व भवन के पास नवनिर्मित शिखरबंध गुरु मंदिर में सादड़ीरत्न, २१ वर्षीतप के तपस्वी, श्री वल्लभ गुरुदेव की पाटे श्री शिक्षाप्रेमी, आ. श्री ललितसूरीजी के शिष्यरत्न आ. श्री पूर्णानंदसूरीजी म.सा. के गुरुमूर्ति की प्रतिष्ठा, वि.सं. २०५९ (वीर सं. २५२९) माघ शु. ५(वसंत पंचमी) गुरूवार को आ. श्री प्रकाशचंद्रसूरीजी पट्टधर आ. श्री पद्मचंद्रसूरीजी आ. ठा. के सान्निध्य में मेहता तलेसरा परिवार द्वारा प्रतिष्ठित हुई|

१७ . राजपुरा श्री शांतिनाथजी मंदिर : सादड़ी से ३ की.मी. दूर श्री पशुराम महादेव जाने वाली सड़क पर, राजपुरा ग़ाव के बाहर अरावली पर्वत की गोद में शिखरबंध प्राचीन जिनालय में मुलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु की १२वि शताब्दी की कुमारपाल समय की प्रतिमा प्रतिष्ठित है|रंगमंड़प में श्री शांतिनाथजी की चौमुखी प्रतिमा के नीचे वि.सं. १४७८ वैशाख सुदी ५ की प्रतिष्ठित होने का लेख है| मुलनायक के दाई तरफ की प्रतिमा के नीचे सं. १४९३ का लेख है| कभी यहां विशाल नगरी थी, आज भी पुराने अवशेष प्राप्त होते है| ६० वर्ष पहले तक जैनों के चार घर थे| हाल में एक भी नहीं है| विशाल प्रागंण में बगीचा व धर्मशाला बनी हुई है| सुकनजी नगराजजी सुराणा परिवार ध्वजा चढाते है| सेठ आ. कं. पेढि सादड़ी वहीवट संभालती है|

१८. श्री मादा पार्श्वनाथजी मंदिर : सादड़ी से अंदरूनी- रास्ते २ कि.मी. की दुरी पर सुकडी-मधाई नदी किनारे मेन रोड पर मादा ग़ाव में गैर चौक में चारभुजा मंदिर के पास करीब १०वि शताब्दी का एक हजार वर्ष प्राचीन शिखरबंध जिनालय में श्री मादा पार्श्वनाथ प्रभु की श्वेतवर्णी पद्मासनस्थ प्राचीन मनभावन प्रतिमा प्रतिष्ठित है| बाहर के गोखले में प्रतिष्ठित कौसग्गमुद्रा की जिन प्रतिमा पर सं. १२३८ का लेख है| जो यहां की प्राचीनता प्रकट करता है|जो यहां की प्राचीनता प्रकट करता है| मंदिरजी में पुराने परिकर के चार भाग आज भी विधमान है -1 आसन/गादी २. फणा ३.+४. काउसग्ग मुद्रावाली प्रतिमाए| ग़ाव के बुजर्गो के अनुसार, गुन्देशा राजपुरोहित के एक भाई ने जैन धर्म अपनाकर मंदिर का निर्माण करवाया और गुन्देशा जैन वंश की उत्पति हुई| आज एक भी जैन घर नहीं है|    सब आसपास के गावो में बस गए| हाल में सिर्फ राजपुरोहितो की बस्ती है| ३००० की जनसंख्या है | स्थानकवासी रूपमुनिजी का उपाश्रय भी था, जो बेच दिया गया |गुन्देशा की सती माता, मंदिर के बाहर विराजमान है| सेठ आनंदजी कलयाणजी पेढि द्वारा संचालित मंदिर की अंतिम प्रतिष्ठा ई. सन २००२ में आ. श्री पद्मसागरसूरीजी के हस्ते हुई| मगसर वदी ५ को श्री वालचंदजी लालचंदजी रांका परिवार द्वारा ध्वजा चढाई जाती है| 

श्री मुक्तिधाम मंदिर :

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सादड़ी फालना रोड पर श्री मांगीलालजी बदामिया ट्रस्ट द्वारा नवनिर्मित “मुक्तिधाम” मंदिर सर्वधर्म समभाव का अनुपम उदाहरण है| श्री शंकेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु की विशाल प्रतिमा को वि.सं. २०४५ माघ वदी 1 रविवार दी. २२.1.१९८९ को आ. श्री सुशीलसुरीजी द्वारा प्रतिष्ठा संपन्न हुई| इष्ट देवी-देवताओं के साथ हिन्दुओ के सभी देवी-देवताओ की आकर्षक प्रतिमाए स्थापित है| रहने की अच्छी सुविधाओं के साथ विवाह हेतु विशाल प्रागंण ४००० वर्गफीट का प्रवचन हॉल, गार्डन आदि सभी सुविधाए उपलब्ध है|

श्री पशुराम महादेव : सादड़ी से १६ की.मी. दूर समुद्रतल से लगभग चार हजार फीट की ऊंचाई पर घने जंगल के बीच “पशुराम महादेव” का पवित्र मंदिर प्राचीन प्राकृतिक गुफा में स्थित है| गुफा की तरह शिवलिंग भी प्राकृतिक है| इसमें ९ खड्डे है, जिन्हें नौ भंडार कहते है| पूरा शिवलिंग अन्दर से खोखला है, जिसमे पानी भरा रहता है| प्रतिवर्ष श्रावण शु. ६ व ७ को एवं महाशिवरात्री के दिन व कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है|

सादड़ी की मूसल गैर : ताम्बावती नगरी नाडोल रीयासत से आए करीब तीन सौ सागरवंशीय माली समाज के लोगो ने इसकी नीव राखी| यह लोग अपने अर्द्धनग्न शरीर पर तेल-सिंदूर व मालीपन्ना लगा भैरव समरूप श्रुंगार कर हाथ में मुसल लेकर होली के अवसर पर नाचते है| ओडमालियो की मसूल जगप्रसिद्ध है, जो शीतला सप्तमी पर निकलती है|

सादड़ी – एक नज़र में : चालीस हजार की जनसंख्या वाला यह शहर, मधाई व सुकडी नदी के बीच में बसा है |राणकपुर बाँध व राजपुरा बाँध, कूल ३४ विधालय, उत्तम चिकित्सालय, पुलिस थाना, दूरसंचार, बैंक, होटल, डाक बंगला आदि सभी आधुनिक जरुरत यहां उपलब्ध है| आत्मवल्लभ जैन सेवा मंडल, श्री लोकांशाह जैन मंडल, आदि संस्थाए यहां की भूषण है| श्री स्थानकवासी जैन श्वे. लायब्रेरी है| पाटियो के उपाश्रय में धार्मिक पाठशाला चालु है| यहां की सब्जी मंदी प्रसिद्द है| “आत्मवल्लभ” नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन होता है| आत्मवल्लभ हॉस्पिटल एक अच्छी उपलब्धि है| “ताराचंदजी की बावड़ी” नामक स्थान भी अधीक प्राचीन व दर्शनीय है|

स्वतंत्रता सेनानी श्री फूलचंदजी बाफना : १४ मार्च १९१३ को सादड़ी कस्बे में जन्मे श्री बाफना स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार दोनों रूपों में लोकप्रीय रहे| आपश्री ने अनेक पुस्तके लिखी| कई बार आप जेल भी गए| सन १९६७ में आप सुमेरपुर से विधानसभा सदस्य भी रहे| मरुधर बालिका विधापीठ, खीमेल के ट्रस्टी के रूप में अप्श्री ने सुंदर विकास काम किया| सन १९५६ में खीमेल में आपश्री ने “सघन शेत्र योजना समिति” का गठन किया था|

इनके अलावा श्री पुखराजजी कोठारी, श्री मोहनकुमारजी पुनमिया, श्री नागराजजी पुनमिया, श्री मोहनराजजी रातडिया, श्री केसरिमलजी तलेसरा आदि अनेक मान्यवर स्वतंत्रता सेनानी रहे है|


purnanandsuriji

२१ वर्षीतप तपस्वी – जोतिषाचार्य – सादड़ीरत्न

आ. श्री पूर्णानंदसूरीजी म. सा.

 


hrinkaar m.

तपसम्राट सादड़ीरत्न आ. श्री ह्रींकारसूरीजी म.सा.

 


jinchandrsuriji

उपसर्ग पू. आ. श्री जिनचंद्रसूरीश्वर्जी म.सा.

सादड़ीरत्न पू. आ. श्री जिनचंद्रसूरीश्वर्जी म.सा.

 


nyaysuriji m.

आ. श्री न्यायसूरीजी – सादड़ी

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