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Sanderao

सांडेराव

राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर गोडवाड़ के प्रवेशद्वार फालना रेलवे स्टेशन से १२ की.मी. दूर उत्तर-पश्चिम में निम्बेश्वर महादेव की पहाडियो में हेक्जी पहाड़ी की तलहेटी में बसा हुआ “सांडेराव” गोडवाड़ का एक एतिहासिक नगर है, जिसे प्राचीन काल में संडेरा, संडेरेक, शंडेरक, खंडेरक्, वृषभनगर आदि नामो से जाना जाता था| राव सांडेजी द्वारा बसाया हुआ ग़ाव होने से इसका नाम सांडेराव पड़ा| कभी यह विशाल नगरी के रूप में बसा हुआ था, जिसका प्रमाण यहां विधमान प्राचीन जैन तीर्थ शांतिनाथ भगवान का वह मंदिर है, जो देवविमान के सामान आज भी शोभायमान है|

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संडेरा : अनुश्रुति के अनुसार काठीयावाड़ से लौटते समय श्री यशोभद्रसूरीजी यहा के एक तालाब के किनारे रुके, जहां एक सिंह एवं सांड के लड़ाई में सांड को विजई देखकर उन्होंने इस स्थान का नाम “सांडेराव” रख दिया| आ. श्री सिद्धसेनसूरी ने अपने “सकल तीर्थ सोत्र” में तीर्थ स्थानों की सूचि में “संडेरा” का नाम भी दिया है| यहां पर संडेराकगच्छ के महावीर और पार्श्वनाथ के दो जैन मंदिर थे| सन १०९२ ई. के अभीलेख के अनुसार, इस कस्बे की एक गोष्ठी ने संडेराकगच्छ के मंदिर में जिनचंद्र के द्वारा एक मूर्ति की स्थापना करवाई| नाडोल के चौहान शासको ने संडेरा में जैन धर्म की गतिविधियो को संरक्षण दिया| संडेरक के शेष्ठी गुनपाल ने अपनी पुत्रियो के साथ महावीर जैन मंदिर में, १२वि शताब्दी में एक चतुकिषिका निर्मित करवाई |यह भी पता चलता है की पोरवाल जाती के पथेड के पूर्वज भोखू संडेरक में दो जैन मंदिर बनवाए| यह तथय सन १५१४ ई.लिखित “अनुयोगद्वारित सूत्रवृति” की प्रशसित” से पता होता है| (संदर्भ :मध्यकालीन राजस्थान में जैन धर्म पुष्ठ क्र. २१५-२१६ से)

पांडवो के वंशधर राजा गंधर्वसेन द्वारा निर्मित अत्यन्त भव्य-दीव्य जिनालय ग़ाव के मध्य, सूर्यवंशीय शत्रीय राजघराने के महल से सटा हुआ है| अत्यन्त विशाल एवं वास्तुकला से परिपूर्ण जिनालय का पूर्व काल में जीर्ण अवस्था होने पर, बार-बार जिणोरद्वार होने व प्रतिष्ठाए होने के प्रमाण मिलते है| इसी दौरान मंदिर के मुलनायक की प्रतिमाओं में भी बदलाव लाया गया है| कहा जाता है की पूर्व में यहां, आदिनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित थी और उसके बाद चौबीसवे तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी और फिर पार्शवनाथ प्रभु मुलनायक के रूप में रहे और अब इसमें कुमारपाल के समय की सोलहवे तीर्थंकर श्री शांतिनाथ प्रभु की पद्मासनस्थ, श्वेतवर्णी व लगभग ७५ सें.मी. की मनमोहक प्रतिमा, तोरण व प्राचीन कलात्मक परिकर सहित विराजमान है |

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भगवान शांतिनाथ के तीनो और नक्काशीयूक्त तोरण है, जिनकी अदभूत शिल्पकला दर्शनीय है| यह मंदिर भूमि से छ: फुट नीचे निर्मित है| गंभारे के बाहर रंगमंडप में संप्रतिकालीन प्राचीन प्रतिमाए स्थापित है| इसके आलावा एक आचार्य की कलात्मक प्रतिमा है, जिसकी पलाठी में नीचे सं. ११९७ (सन ११४१ ई.) का इस प्रकार लेख है –

” श्री शंडेरक गच्छे पंडित जिन चन्द्रेण गोष्ठीयूतेन विजयदेव नागमूर्ति: कारिता मुक्तिवांछता संवत् ११९७ वैशाख वदी ३ थिरपाल : शुभंकर :|”

कहते है यह संडेरक गच्छीय आचार्य श्री यशोभद्रसूरीजी की प्रतिमा है| दसवी शताब्दी में जिन्होंने वि.सं. ९६९ यानि सन ९१३ ई. में यहा मुलनायक श्री महावीर स्वामी प्रतिमा की प्रतिष्ठा संपन्न करवाई थी |

जैन साहित्य संशोधक खंड-२, अंक-३, पुष्ठ २५ के अनुसार श्री यशोभद्रसूरीना उपदेश से घोशीर गोत्रे दो घनराई ने वि.सं. ९६९ वर्षे मंदिर व श्री श्रेयान्सनाथ भगवान की प्रतिष्ठा की |

सं. १७४६ में शीलविजयजी महाराज द्वारा रचित प्राची  तीर्थमाला संग्रह भाग -1 पुष्ठ १३६ के अनुसार, सांडेराव सं. १७५५ में एक ही मंदिर था ” सांडेरे प्रसाद एक“|

मंदिर के प्रवेशद्वार की एक बारशाख में सं. १२२१ का एक लेख है – “संवत् १२२१ माघ वदी २ शुक्रे अधेह श्री कल्हणदेवरा तस्य मात्रुरागी श्री आन (ल) देव्या श्री शंडेरकीय मुलनयक श्री महावीर देवाय (चैत्र) वदी १३ कलयाणीकनि (मी) त्तं….” इसके अनुसार मंदिर हेतु दान की व्यवस्था हुई थी| दुसरे मंडप के एक स्तंभ पर १२३६ के लेख इस तरह है -“(थाम) था सुत राल्हा पाल्हा (भ्याम)मातृप (द) श्री निमी (ते) स्तं भको (क:) प्रदत: (त्तं:) (सं.) वत् ११२३६ का (ती) क वदी (२) बुधे अ (घे) ह श्री नडूले महाराजाधीरज श्री कल्हणदेवकलयाणविजय राजए प्रवर्तमाने (रागी) श्री जाल्हनदेवीभूको (त्त्कौ) श्री शं (डेर) कदेव श्री पार्श्वनाथप्रतापत: …. संवत् १२३६ वर्षे घे (जेष्ठ) सुदी १३ शैनो सो (यम) मातृधारमति पुन: (पुनयार्थ ?) स्तंभको उध्रु (दध्रु) (त:) ||” पहले लेख के अनुसार जन पड़ता है की यक मंदिर मुलनायक श्री महावीर स्वामी का था और दुसरे लेख से मुलनायक श्री पार्श्वनाथ भगवान का होने का मालूम पड़ता है| तत्पश्चात १६वि शताब्दी में पुन: जिणोरद्वार के समय श्री शांतिनाथ प्रभु की चमत्कारिक प्राचीन प्रतिमा, अन्यत्र से लाकर यहां स्थापित करने का उल्लेख है, जो अभी मुलनायक के रूप में विधमान है, जिस पर कोई लेख नहीं है| मुलनायक भगवान की दोनों प्राचीन प्रतिमाए भी यही विराजमान है, जिन पर लेप किया हुआ है| वि.सं. ८४१ से ८४५ तक पांच वर्ष का दुष्काल पड़ा था, जिससे जैन मुनियो को आहार न मिलने से धार्मिक पढ़ाई व स्वाध्याय में शिथीलता आ गई| उस समय के आचार्यश्री की प्रेरणा से अनेक गिआन भंडारों की स्थापना हुई, उसमे सांडेराव में गिआन भन्डार स्थापन करने का उल्लेख मिलता है| 

पं. खुशाल वि. म. सा. द्वारा रचित पट्टावाली व वीरवंशावली में भी इसके उल्लेख मिलते है| मंदिर के भोयरे में एक शिलालेख है, जिस पर १२३८ के महा वदी ५ को सोमवारे नडूम (वर्तमान नाडोल) के महाराज संग्राम सिंह के राज्य में सेठ कर्मसिंह आदि द्वारा दान किए जाने का उल्लेख जान पड़ता है|

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वि.सं. १४२९ और १४८६ तथा १५५३ के बाद भी कई बार जिणोरद्वार व प्रतिष्ठा के उल्लेख प्राप्त होते है| जओ इसकी प्राचीनता को उजागर करते है| मंदिर के एक प्राचीन परिकर पर वि.सं. १११५ का लेख उत्कीर्ण है| गूढ़ मंडप की रचना भव्य है|

विशिष्टा : कहा जाता है की वि.सं. ९६९ में यहां पर हुए जिणोरद्वार के समय प्रतिष्ठा मोहत्सव पर, अनुमान से कई अधीक लोग मोहत्सव में दर्शनार्थ पहुचें, जिससे भोजन में घी समाप्त हो गया| इस बात की जानकारी आचार्य श्री यशोभद्रसूरीजी को होने पर, उन्होंने दैविक शक्ति से (विधाबल या मंत्र शक्ति) पाली के व्यापारी “धनराजशाह” के गोदाम से लाकर घी के पात्र भर दिए| प्रतिष्ठा के सभी काम संपन्न हो जाने पर आचार्यश्री ने श्रावको से, घेई का पैसा पाली के व्यापारी धनराज को दे आने के लिए कहा| जब सांडेराव के श्रावक पाली पहुचकर घी के दाम दने लगे तो व्यापारी चकित हो गया और कहा की मैंने आपको कोई घी नहीं बेचा तो दाम किस बात का लू ? तब श्रावको ने गोदाम चेक करने को कहा |व्यापारी ने गोदाम देखने पर घी के सारे पात्र खाली पाए| इस प्रकार आचार्यश्री के चमत्कार से प्रभावित पाली के धनराजशाह व्यापारी ने घी का पैसा लेने से इंकार करते हुए आग्रह किया की प्रतिष्ठा में जो घी खर्च हुआ है, वो मेरी तरफ से समझ ले| मगर श्रावको के बार-बार आग्रह पर उसने उन रूपयो से पाली में भव्य ५२ जिनालय का निर्माण करवाया, जी आज भी १०८ पार्श्वनाथ में “नवलखा पार्श्वनाथ” के नाम से विधमान है और अपनी गौरव गाथा का परिचय दे रहा है| नौ लाख़ रूपए से निर्मित होने से इसका नाम नवलखा पार्श्वनाथ पड़ा| इस घटना का उल्लेख “एतिहासिक रस संग्रह” के भाग-२ के पुष्ठ ३२ पर इस प्रकार लिखा है –

“पुहता सूरी नगरी संडेरी, हुई प्रतिष्ठा भुंगल भेरी,

नादी नवल संघ सबलऊ जिमई, धृत खूनटऊ गुरु जनिऊ तिमई,

पल्लि नगरी सहा धनराज, धृत आणि गुरु सारीयू काज ….”

मंत्र शक्ति से पाली से घी लाया, इसकी हकीक़त सं. १५८१ में इश्वरसूरी द्वारा बनाई “सुमित्र ऋषि चरित्र” से भी प्राप्त होती है| 

संडेरक गच्छ : दसवी शताब्दी में संडेरक नगर में इसकी स्थापना होने से इसका नाम “संडेरक गच्छ” पड़ा| पूर्व मध्य काल अदभूत में इस गच्छ का उल्लेख सन १२११ ई. से १५३१ ई. तक के ३८ मूर्ति लेखो में भी मिलता है| इस गच्छ में वि.सं. ९३४ के लगभग अनेक प्रभावशाली आचार्य हुए, जैसे आ. श्री शांतिसुरी, शालिसुरी, सुमतिसूरी, आ. श्री इश्वरसुरी व मांत्रिक, प्रकांड विद्धान आ. श्री यशोभद्रसूरीजी आदि हुए| आ. श्री यशोभद्रसूरीजी का जन्म सं. ९५७ में आचार्य पद सं. ९३८ में मुंडारा (राज.) में हुआ और सं. ९३९ में उम्र के २१वे वर्ष में आपश्री ने सांडेराव व मुंडारा में प्रतिष्ठा संपन्न करवाई |इस गच्छ में यशोभद्र, बलभद्र व श्रमाषी यह आचार्य बड़े प्रभावक हुए| इनके संबंध में संस्कृत भाषा में प्रबंध व लावण्यसमय रचित रास उपलब्ध है| १७वि सदी तक के इस गच्छ के अभीलेख प्रकाशित है | इतिहासवेत्ता मू. श्री जिनविजयजी द्वारा प्रकाशित जैन पुस्तक “प्रशसित संग्रह” की प्रशसित नं. ९१ के अनुसार इसका पुर्वनाम वालमगच्छ था|

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कला व सौंदर्य : प्रभु की प्रतिमा अलौकिक, भव्य-दीव्य, कलापूर्ण व  चमत्कारी है| मन को मोहने वाली यह प्रभावशाली प्रतिमा सुन्दर व सौमय है| प्रतिमा के तीन ओर कलात्मक परिकरयूक्त तोरण है| इसमें २३ तीर्थंकरो की प्रतिमाए अत्यन्त ही कलापूर्ण तरीके से कोरी गई है| इसकी कोरणी खूब ही झीणी व सुंदर है| तोरणों से आवृत श्री शांतिनाथ प्रभु अत्यन्त सुशूभित लगते है| मंदिर निर्माण की कला अजोड व अलौकिक व बड़ी वैगयानिक है| मंदिर का भाग समतल से ६ फुट निचे है |वर्षा के समय मंदिर में खूब पानी भरता है. चौक में तीन-चार छोटे से छिद्र है| पानी छिद्रों से होकर किस प्रकार कहा जाता है, उसका अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है | ऐसी स्थापत्यकला अन्यत्र दुर्लभ है| खुदाई करते समय मंदिर के नीचे भोयरे का पता चला| खुदाई के समय लगभग १५० चांदी के प्राचीन सिक्के मिले थे, जिसमे से अनेक २००० वर्ष से अधीक प्राचीन थे| प्राचीन मुलनायक के अधिष्ठायक  श्री पार्श्वयग की प्रतिमा व भमती में प्रतिष्ठित श्री धर्नेन्द्रदेव की सपार्कार प्रतिकृति अपने आप में चमत्कारिक है| श्री धर्नेंद्रदेव यडा-कदा नाग देवता के रूप में प्रगट होकर श्रद्धालु भक्तजनों को दर्शन देते है| वर्तमान में जिनालय का पुन: जिणोरद्वार का काम वर्षो से निरंतर जारी है| 

अन्य जैन मंदिर : मूल मंदिर के ठीक सामने स्थित उपाश्रय में सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले अधिष्ठायकदेव श्री मणिभद्रवीर की चमत्कारिक प्राचीन प्रतिमा, कांच के कोरीव छोटे से मंदिर में विराजमान है| जिसका जिणोरद्वार मुनिभूषण की  वल्लभदत्तजी की प्रेरणा से हुआ है एवं सं. २०३८ में इसकी प्रतिष्ठा हुई है| ओसवाल बगीची में इन्ही गुरुदेव का, अष्टकोनी कल्त्मक सुन्दर गुरु समाधी मंदिर है| गुरुदेवश्री सांडेराव में दी. ४.१०.१९८४ , वि.सं. २०४० के विजयदशमी के दिन, अहर्त का ध्यान करते हुए स्वर्गवासी हुए थे| इस गुरु मंदिर की प्रतिष्ठा वि.सं. २०४६ वैशाख सुदी ६ दी. 30 अप्रैल १९९० को, जिनालय की पुन: प्रतिष्ठा के अवसर पर आ. श्री हेमप्रभसूरीजी के करकमलों से सानंद संपन्न हुई |

दूसरा मंदिर : सांडेराव नगर में बांकली वास में, गुरुभक्त शाह मोतीजी वरदाजी फागनिया परिवार द्वारा निर्मित श्री केसरिया आदेश्वर भगवान की भव्य कलात्मक व शिखरबंध जिनालय का मुहर्त वि.सं. १९७३ में दादा गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरीजी के प्रीय शीषयरत्न आ. श्री मोहनविजयजी म. सा. की प्रेरणा से संपन्न हुआ |इन्ही के वरदहस्ते वि.सं. १९८८ के माघ सुदी ६ को प्रतिष्ठा संपन्न हुई | श्री ताराचंदजी एवं उनकी मातोश्री हांसीबाई ने मोहत्सव पूर्वक प्रतिष्ठा व ध्वजदंड व कलश स्थापित किए| पुन: वि.सं. २०४६ के मगसर सुदी 4 शनिवार दी. २.१२.१९८९ को, आ. श्री जयन्तसेनसूरीजी के हस्ते भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा व गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरीजी के गुरूमंदिर की प्रतिष्ठा संपन्न हुई| वर्तमान में इसका पुन: जिणोरद्वार का काम चालु है| पीछे श्राविकाओं के उपाश्रय में श्री पार्श्वनाथ भगवान् विराजमान है|

तीसरा मंदिर – श्री नाकोडा पार्श्वनाथ मंदिर : सांडेराव के मुखय बाजार में वल्लभ वाटिका के पास श्री मोहनलालजी ओंकारमलजी मेहता परिवार द्वारा स्वद्रव्य नवनिर्मित श्री नाकोडा पार्श्वनाथ भगवान का सुन्दर जिनालय है| इसमें मुलनायक श्री नाकोडा पार्श्वनाथ सहित मुनिसुव्रत स्वामी, महावीर स्वामी आदि जिनबिंब एवं श्री विजयानंदसूरीजी, पंजाब केसरी आ. श्री वल्लभसूरीजी, आ. श्री समुद्रसूरीजी, मुनिभुषण श्री वल्लभदत्तविजयजी (फक्कड़ महाराज) आदि गुरुबिंब, देवी-देवतओं की प्रतीमाओ की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, आ. श्री इन्द्रदिनसूरीजी आ. ठा. के सान्निध्य में, वि.सं. २०४६, मगसर सुदी ६, दी. १६.११.१९९२ को संपन्न हुई| सांडेराव में आ. श्री यशोभद्रसूरीजी की स्मृति में आ. श्री वल्लभसूरीजी ने जैन पुस्तकालय और वाचनालय की स्थापना की थी| स्थानकवासी पुस्तकालय, जीवदया चबूतरा, न्याति नोहरा, छोटी-बड़ी अनेक धर्मशालाओ का निर्माण हुआ| 

अन्य मंदिर : मुखय बाजार में स्थित दक्षिण सुंडधारी श्री सिद्धिविनायक गणेशजी व मस्जिद, श्री चारभुजाजी, श्री लक्ष्मीजी, श्री रामदेवरा व ग्राम ईलोजी, विशाल तालाब के किनारे स्थित शत्रीय घराने छत्रिया, अति प्राचीन वट का पेड़ आदि प्राचीन धरोहर है| यहां से ५ की.मी. दूर पहाडियो से घिरा जग विख्यात पांडव कालीन श्री निम्बेश्वर महादेवजी का विशाल मंदिर है, जो जन-जन का श्रद्धा स्थान है| सांडेराव के तालाब के किनारे एक अति प्राचीन चबूतरे है, जिसके खंभे प्राचीन शिल्पकला के उत्कुष्ट नमूने है| 

नूतन जिनोर्द्वर : इस जिनालय की शिल्पकला अत्यन्त ही कलात्मक व सुंदर है| इसका निर्माण वास्तुसार प्रकरण एवं दीपनर्व आई के आधार पर किया गया है| इसकी रचना लगभग दस हजार वर्गफुट के घेरे में की गई है| पहले यह मंदिर ५२ जिनालय वाला था, लेकिन वर्तमान में यह २४ जिनालय का है| मंदिर में प्रवेश करने के लिए सात सीढ़िया नीचे उतरना पड़ता है| जहा दूर सामने मुलनायक की चमत्कारी प्रतिमा के दर्शन हो जाते है| २४ देहरियो की प्रतिष्ठा संवत् १९५४ में गुरुदेव श्री हितविजयजी के वरदहस्ते व नेतृत्व में संपन्न हुई थी| सेष देहरियो में प्रतिमा स्थापन व २४ देहरियो पर ध्वज, दंड, कलश आदि आरोहण, वि.सं. १९९५ के वैशाख शुक्ल ६ दी. ५ मई १९३८ को शुभ मुहर्त में बाल ब्रहमचारी प. पू. पं. श्री हिम्मतविजयजी व मू. श्री गुमानविजयजी आ. ठा. की निश्रा में प्रतिष्ठा संपन्न हुई |इसका विधिमान यति श्री राजविजयजी ने संपन्न किया|

विगत दशाब्दी में जिनालय के जीर्ण शिखर को संपूर्ण उतारकर मू. भगवान की प्रतिमा के आलावा अन्य प्रतिमाओं का उथापन करके आमूलचूल नया भव्य शिखर निर्मितकर, दी. 30 अप्रैल १९९० वि.सं. २०४६ वैशाख सुदी ६ के शुभ मुहर्त पर शासन प्राभावक प.पू. आ. श्री हेमप्रभसूरीजी आ. ठा. की पावन निश्रा में जिन बिंबो की पुन: प्रतिष्ठा नूतन कलश दंड-ध्वजारोहण के साथ-साथ कमलाकर गुरु मंदिर में मरुधररत्न मुनिभूषण श्री वल्लभदत्तविजयजी की गुरुमूर्ति की प्रतिष्ठा विधि हर्षोलास से संपन्न हुई |जिनमन्दिर की वार्षिक ध्वजा वैशाख सुदी ६ को श्री मिश्रीमल्जी नथमलजी की केरिंग परिवार (पुणे) द्वारा चढाई जाती है| महावीर जयनती और गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरी की गुरुसप्तमी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है| श्री यशोभद्रसूरीजी जैन सेवा मंडल. पूनम मंडल व महिला आदि संस्थाए क्रियाशील है| ८०० घरो की घर ओली व ३००० से ४००० तक जैनों की जनसंख्या है| ग़ाव की कूल जनसंख्या लगभग २०००० है| दो बैंक, १५ से २० विधालय, अस्पताल, प्याऊ, कन्याशाळा, दूरसंचार केंद्र, होटल, डाकबंगला, विश्राम गृह आदि की अन्य उपलब्धिया है| राजकीय व्यवस्था के रूप में, ग्राम पंचायत सांडेराव छ: वार्डो में विभाजित है|

पुणे जिले के नगरवासियो को एक सूत्र में पिरोने हेतु दी. २६ अप्रैल १९९९ को श्री सांडेराव जैन सेवा संघ,पुणे की स्थापना हुई| इसके वर्तमान अध्यक्ष श्री मदनजी सेठिया है| जानकारी हेतु श्री चंपालालजी संघवी का काफी सहयोग रहा|

अन्य उपलब्धिया : श्री शत्रुंजय महातीर्थ की पावन भूमि पर गोडवाड़ की सबसे प्राचीन धर्मशाला श्री सांडेराव जिनेन्द्र भवन व श्री सहस्त्रफणा पार्श्वनाथ प्रभु का जिन मंदिर है| यही पर नवनिर्मित ए.सी. धर्मशाला का हाल ही में रविवार दी. २३ जून २०१३ को उद्घाटन संपन्न हुआ है| गिरिराज आबू पर निर्मित श्री महावीर केंद्र, बदलापुर स्थित छात्रावास, सांडेराव में माधयमिक विधालय, कन्याशाळा, श्री चोपड़ा चिकित्सालय आदि नगरवासियो की उदारता व दानशूरता के जीवंत उदाहरण है|


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प. पू. आ. श्री विजय पूर्णानंदसूरीश्वर्जी म.सा.

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