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श्री भद्रबाहुस्वामीजी म.सा.

 

श्री भद्रबाहुस्वामीजी म.सा.

 

आपका जन्म दक्षिण के प्रतिष्ठानपुर में हुआ था| आप भी जाती से ब्रह्माण व गोत्र प्राचीन था| आपको वराहमिहिर नामक भाई था| आप दोनों संस्कृत के क्षेष्ठ व वेदों में निशांत थे एवं ज्योतिष विधा के भी पारगामी थे| आ. यशोभद्रसूरीजी के उपदेश से यज्ञधर्म, क्रियाकांड व पशु बलि आदि को छोड़कर जीव मैत्री, प्रेम व करुणा से युक्त धर्म को स्वीकार करके दीक्षा ली| आपने १० निर्युक्ती, ४ छेदसूत्र, उवस्सग्गहरं स्तोत्रादी की रचना की| आपने वराहमिहिर को आचार्य पद नहीं दिया, जिससे उसने जैन  दीक्षा छोड़ दी व राज्यमान्य पुरोहित बना लेकिन ज्योतिष विधा का विद्धान होने पर भी उसके भविष्यकाल झूठे साबित होने पर उसने जैनाचार्यो व जैन संघ पर द्वेष रखा व मरकर स्तोत्र की रचना की| आपके समय में ही पाटलीपुत्र में श्रमण संघ की प्रथम वाचना हुई थी| आपने कल्पसूत्र नामक सुप्रसिद्ध ग्रंथ को दशाश्रुतस्कन्ध में से उधारित किया था| आप द्वादशांगी व १४ पूर्वो के सम्पूर्ण ज्ञाता थे| ३१ वर्ष का संयम पालनकर श्रुतकेवली भद्रबाहुस्वामीजी ७६ वर्ष की उम्र में काल धर्म को प्राप्त हुए|

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