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श्री देवेन्द्रसूरीश्वर्जी म.सा.

 

श्री देवेन्द्रसूरीश्वर्जी. म.सा.

 

इनकी दीक्षा बचपन में हुई थी| लगभग सं. १२८५ में इनको आचार्य पद से अलंकृत किया गया| आचार्य जगच्चंद्रसूरीजी ने जब क्रियोद्वार किया था तब इनका सहयोग रहा था| इनके वात्सल्य भरे मधुर उपदेश से अंचलगच्छ के ४४ वे आचार्य महेंद्रसिंहसूरीश्वर्जी ने लगभग सं. १३०७ में थराद में क्रियोद्वार कर शुद्ध साध्वाचार का स्वीकार किया| उनसे प्रभावित होकर राणा तेजसिंह ने मेवाड़ में अमारीपालन करवाया और राणी जयलता ने चितौड़ के किल्ले में शामलिया पार्श्वनाथ भगवान का जिनालय बनवाया|

१२ वर्ष तक अलग विचरण से आचार्य देवेन्द्रसूरीश्वर्जी एवं आचार्य विजयचंद्रसूरीश्वर्जी में उत्पन्न हुई भिन्नता के कारण पाटन निवासी सोनी संगन ओसवाल के मन में प्रश्न उत्पन्न हुआ की “कौन सही और कौन गलत?” तपोबल से प्रत्यक्ष हुई शासनदेवी ने कहा “आचार्य देवेन्द्रसूरीश्वर्जी युगोत्तम आचार्य पुंगव है, इनकी गच्छपरंपरा लम्बे समय तक चलेगी| अत: तुम इनकी उपासना करो|” पुनमिया गच्छ के उपासक संघपति पुनडनागोरी इनके परिचय से तपागच्छीय श्रावक बने| जैन धर्म से प्राभावित एवं जिसकी मृत्यु के समय १२० लोग राजा की चिता के साथ ही मरण स्वीकारने वाले ऐसे लोक प्रिय राजा वीरधवल इनके समय में हुए थे| जगतप्रसिद्ध दानवीर जगडूशाह, मंत्री पेथडशाह, खंभात के अग्रणी श्रावकरत्न संघवी भीमजी इनके ही समय में हुए थे| संवत् १३२७ में गुरु के स्वर्गमन पर भीमजी १२ वर्ष तक धान्य का त्याग कर मात्र तरल आहारी बने| कर्मो की विचित्र लीला को प्रकट करते “नव्य कर्म ग्रंथ” , “भाष्यत्रयम” , “श्राद्धदिनकृत्य” वैराग्य ग्रंथ इन्होने रचे थे|

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