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श्री हेमविमलसूरीश्वर्जी म.सा.

 

श्री हेमविमलसूरीश्वर्जी म.सा.

 

इनका जन्म वि.सं. १५२०(२२) वडगाम में सेठ गंग्राज की पत्नी गंगादेवी की कुक्षी से हुआ| आपका नाम हाडकुमार रखा गया| वि.सं. १५२८(३८) में दीक्षा| सं. १५४८ – आचार्यपद| इनके आचार पालन की चुस्तता एवं प्रभावक व्याख्यान से प्रभावित हुए लोक गच्छ के ६८ ऋषियों ने संवेगी दीक्षा ग्रहण की| लगभग १८०० साधुओं का इनका परिवार था| वि.सं. १५७२ में इडर से खंभात के विहार में बादशाही स्वागात को देखकर इर्ष्या से किसी ने बादशाह मुजफ्फर शाह की कानाफुंसी की एवं बादशाह ने इनको कैद किया, तब खंभात संघ ने १२००० रु. का दंड भरकर इनको छुडाया|

पुन: उपसर्ग न हो, इस हेतु आयम्बिल तप एवं सूरीमंत्र की आराधना की| प्रसन्न हुए आधिष्ठायक देव के कहे अनुसार करने से संघ की रकम दरबार से वापिस दिलवाई| तर्क एवं वाद में निपुण होने से इन्हें “वादीविदंबन” का बिरूद मिला था| वरकाणा तीर्थ एवं नाकोडा तीर्थ इनके समय में हुए थे| वि.सं. १५८३ में विसनगर में ये स्वर्गस्थ हुए|

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