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श्री लक्ष्मीसागरसूरीश्वर्जी म.सा.

 

श्री लक्ष्मीसागरसूरीश्वर्जी म.सा.

 

वि.सं. १४६४ में सेठ करमशी की धर्मपत्नी करमादेवी की कुक्षी से इनका जन्म हुआ है| वि.सं. १४७० में पाटन में शाही मोहत्सव के साथ दीक्षा| वि.सं. १४७९ – गणी पद, वि.सं. १४९६-पंन्यास पद, मुंडस्थल में वि.सं. १५०१ – वाचक पद, मेवाड़ में वि.सं. १५०८ – आचार्य पद| एक बार आचार्य सोमदेवसूरीजी म.सा. एवं उपाध्याय रत्नमंडनजी म.सा. के बीच हुए मनमुटाव को इन्होनें अपने प्रयास से दूर करके प्रीटी के संबंध जोड़े|

सं. १५१८ तथा १५२९ में डूंगरपुर में पीतल की १२० अंगूल ऊँची जिनप्रतिमा, सं. १५२५ में आबू में भीम\विहार में पीतल की १०८ मण की आदिश्वरदादा की प्रतिमा इत्यादि कई जिनप्रतिमाएं इन्होनें प्रतिष्ठित की| मांडवगढ़ में बादशाह आलामशाह के मंत्री चांदाशाह के लकड़ी के ७२ जिनालय तथा मह्म्मुदबेगडा के मंत्री गदराज श्रीमाली के अहेम्दाबाद में जिनालय एवं सोजित्रा के जिनालय की प्रतिष्ठा भी इन्होनें की| दुष्काल में पुरे गुजरात में एक वर्ष तक अन्न-पानी की व्यवस्था करने वाला खीमा देदराणी इनके समय में हुआ| वि.सं. १५४७ में ये देवलोकवासी हुए|

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