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श्री मानेदेवसूरीजी म.सा.(प्रथम)

 

श्री मानेदेवसूरीजी म.सा.

 

आपका जन्म मारवाड़ के नाडोल गाँव में हुआ था| आपके पिता का नाम धनेश्वर व माता का नाम धारिणी था| आप प्रधोतनसूरी का उपदेश सुनकर दीक्षित हुए तथा ११ अंग व छेद सूत्र के ज्ञाता बने| आपकी योग्यता देखकर गुरुने आचार्यपद दिया| पद देते समय कंधे पर लक्ष्मी व सरस्वती को देखकर आपके गुरु चिंतित हुए| आपने उनकी चिंता को दूर करने के लिए जीवन पर्यंत सभी विगयीयों का त्याग किया व भक्तों के घर आहार नहीं वहोरने का अभिग्रह लिया| आपके तप, ज्ञान व निर्मल ब्रह्माचार्य से आकर्षित होकर जया, विजया, आपराजिता व पद्मा नामक देवियों भी सानीध्य में रहती थी|

एक बार तक्षशिला नगर में महामारी का रोग फैला व हजारों लोग मरने लगे| श्रावकों ने शासन देवी की आराधना की तब देवी ने कहा की मानदेवसूरी के चरण का जल छानटने से यह उपद्रव शांत हो जाएगा| आचार्य भगवंत ने मंत्राधिराज गर्भित शांतिस्तवन(लघुशान्ति) नामक स्तोत्र बनाकर दिया व कहा की इस स्तोत्र का पाठ करके जल छांटने से महामारी का उपद्रव शांत हो जाएगा| संघ द्वारा ऐसा करने पर उपद्रव शांत हुआ| एक बार व्यंतर के उपद्रव का निवारण करने के लिए तिजयपहुत स्तोत्र की रचना की जो नवस्मरण का चौथा सूत्र है| आपने अनेक राजपूतों को जैन बनाया| आप वीर सं. ७३१ में गिरनार पर अनशन कर कालधर्म को प्राप्त हुए|

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