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Shree Mohankheda Tirth

श्री मोहनखेड़ा तीर्थ

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मंदिर का दृश्य |


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 मुलनायक भगवान

   श्री आदेश्वर भगवान , (श्वे. मंदिर )|


 तीर्थ स्थल –

                                   राजगढ़ ग़ाव से लगभग डेढ़ मील की दूरी पर एकांत में विशाल परकोटे के अन्दर |


mohankheda1प्राचीनता –

                                   आचार्य श्री राजेंद्र सूरीश्वरजी महाराज के शुभ हस्ते वि. सं. १९४० के मिग्षर शुक्ला सप्तमी के शुभ दिन  श्री मोहनखेड़ा तीर्थ की प्रतिष्टा संपन्न हुई थी |

 


परिचय –

                                   श्री राजेंद्र सूरीश्वरजी का समाधी स्थान भी यही है जिनका अंतिम संस्कार वि. सं. १९६३ के पोष शुक्ला सप्तमी को हुआ था  | प्रति वर्ष यहां कार्तिक पूर्णिमा, चैत्र पूर्णिमा तथा पौष शुक्ला सप्तमी को मेले लगते है जिनमे हजारो भक्तगण भाग लेकर प्रभु की भक्ति का लाभ उठाते है |

                                   इसी  परकोटे में मंदिर के निकट ही आचार्य श्री राजेंद्र सूरीश्वरजी महाराज व श्री यतिन्द्र सूरीश्वरजी महाराज के विशाल कलात्मक समाधी मंदिर है |तीर्थ स्थल ऐसे समतल एवं सुरमय स्थान पर निर्मित है जिससे यह़ा के आंतरीक एवं दृश्य अतीव आकर्षित है |

                                  मंदिर परिसर में स्मृति मंदिर, श्री यतींद्रसूरीजी व श्री विद्याचन्द्रसूरीजी गुरु समाधि मंदिर, जय तलहटी, भव्य प्रवेश द्वार, महाविर्र सर्कल, भव्य उधान, महावीर जलाशय, जैन गुरुकुल, हाईस्कूल, मानव सेवा मंदिर, नेत्र-चिकित्सालय, कुंदन गौशाला, प्रवचन कार्यालय, शोध-संस्थान आदि अनेक उपक्रम चालू है| प.पू. आ. श्री हेमेन्द्रसूरीजी म.सा. के गतवर्ष देवलोक गमन के बाद मंदिर परिसर में ही अग्रिसंस्कार संपन्न हुआ, यही भविष्य में हेमेन्द्रसूरी गुरुसमाधि मंदिर बनेगा| प.पू. मुनिराज ज्योतिष सम्राट श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म.सा. की प्रेरणा व मार्गदर्शन से तीर्थ विकास की ओर तीव्र गति से अग्रसर है| जन जन की आस्था का प्रतिक श्री मोहनखेड़ा तीर्थ मालवा का सबसे मुख्य तीर्थ बन गया है| प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा व पौष शुक्ल सप्तमी पर भव्य मेला लगता है| मुख्य सड़क से जुड़ा भव्य प्रवेशद्वार के पास सुन्दर जय तलेटी मंदिर बना है|

 

अव्दितीय श्री जयंतसेन म्युझियम

राजगढ़ से ढाई की.मी. व श्री मोहनखेड़ा  तीर्थ से मात्र आधा की.मी. की दुरी पर श्री जयंतसेन म्युझियम स्तिथ है| करीब सवा तीन लाख वर्ग फीट भूमि पर स्वस्तिक आकार का “म्युझियम” व मालवा का प्रथम भव्य-दिव्य “कीर्ति-स्तंभ” है|

श्री राज राजेंद्र तीर्थ दर्शन का निर्माण एक संकूल के रूप में हुआ है| म्युझियम नौ खंडो का वर्गीकरण जैन संस्कृति के विविध पर आधारित है| संबंधित विषयों का प्रदशन विभिन्न आकृतियों, मॉडल्स एवं चित्रों के माध्यम से किया गया है| इसे ठीक से देखने में तीन घंटे लगते है| नौ खंडो में…. १) नवकार दर्शन २) तीर्थ दर्शन ३) कर्म दर्शन ४) तत्व दर्शन ५) श्रमण दर्शन  ६) श्रमणी दर्शन ७)श्रमणोंपासक दर्शन ८) श्राविका दर्शन व ९) गुरुदर्शन है|

इसका उद्घाटन पौष सुदी -१२ बुधवार १५ जनवरी २००३ को पुज्यश्री हस्ते संपन्न हुआ |

“कीर्ति स्तम्भ” पांच मंजिला है, जिसकी प्रत्येक मंजिल में, भगवान, गनधर तथा गुरुदेवों की मुर्तिया है| इसका उद्घाटन सं. २००५ माघ सुदी-२, गुरूवार १० फ़रवरी २००५ का गुरुदेव की निश्रा में हुआ| इसी परिसर में सुन्दर कलात्मक गुरूमंदिर में दादा श्री की आदमकद ७५ इंची ऊँची प्रतिमा बिराजमान है| संलग्र गुरुदेवश्री के पूज्य पट्टधर आचार्यगणों की प्रतिमाएं है|

वर्तमान में श्री पारसनाथ प्रभु जिनमंदिर, गुरुमंदिर, योग एवं ध्यान केंद्र, आराधना केंद्र, सुविशाल सभागृह ज्ञान भण्डार, मनमोहक उधान, जैन दर्शन को दर्शाती झाकियां, कलात्मकता से परिपूर्ण दो मुख्य प्रवेश द्वार, सुंदर पेढ़ी : शीतल जल से आपूरित प्याऊ आदि यहाँ के मुख्य आकर्षण है| करीब १०० कमरों की आधुनिक धर्मशाला व सुंदर भोजनशाला की उत्तम व्यवस्था है|

आ. श्री राष्ट्रसंत जयंतसेनसूरीश्वरजी द्वारा श्री मोहनखेड़ा तीर्थ पर जैन म्युझियम का निर्माण आपकी श्रेयस्कारी देन है|


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