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Devlok Gaman Gachadhipathi Shree Aacharyadevesh Shreemadvijay Ravindrasurishwarji Marasaheb

 

गच्छाधिपति आचार्यद्वेष श्री रविन्द्रसूरीश्वर्जी म.सा.

gachadhipathi shree aacharyadevesh shreemadvijay ravindrasurishwarji marasaheb

श्री रविन्द्रसूरीश्वर्जी म.सा. २ जून २०१६ को कालधर्म हुए |

गच्छाधिपति आचार्यद्वेष श्री रविन्द्रसूरीश्वर्जी म.सा. का जीवन परिचय

अर्हत योगी वर्तमानचारी गच्छाधिपति आचार्यदेव श्री रविन्द्रसुरीजी म.सा. आचार्य देवेश श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पात परंपरा के पंचम आचार्य श्री विधाचन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. के शिष्यरत्न थे| अवरित रूप से ध्यान-साधना में लगे रहने से इनकी पहचान अर्हतयोगी के रूप में बनी है|

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पंन्यास पद का वासक्षेप करते हुए आचार्यश्री हेमेन्द्रसूरीजी म.सा.

आपका जन्म सं २०११ की भाद्र्वा सुदी पंचमी अर्थात २ सितम्बर १९५४ को सियाणा(राज.) में प्राग्वट वंशीय श्री तगराजजी तथा श्रीमती रत्नादेवी के धर्मिष्ठ परिवार में हुआ था| आपका गृहस्थ नाम नथमल था| अपने पति के स्वर्गवास के कुछ ही वर्ष पश्चात आपकी माता ने अपने दोनों पुत्रों को आचार्य श्रीमद्विजय विधाचंद्रसूरी को अर्पित कर दीक्षा ग्रहण कर ली व साध्वी श्री पियूषलताश्रीजी के नाम से विख्यात हुई | उस समय्श्री नथमल किशोरवस्था में थे मगर आचार्य श्री विधाचन्द्रसुरीजी के सानिध्य व ध्यान साधना ने इनको प्रौढ़ बना दिया था| अंततः वैशाख सुदी ६ सं २०२६ को आपने आचर्यश्री से सियाणा में प्रवज्या ले ली | कुछ समय पश्चात आपके लघुभ्राता श्री मोहनलाल ने भी पूज्य आचार्यश्री से दीक्षाव्रत लिया| वे अब ज्योतिषसम्राट मुनिप्रवर ऋषभचन्द्रविजय जी म.सा. के नाम से जाने जाते है| इस प्रकार यह सम्पूर्ण परिवार जैन धर्म की सेवा में समर्पित हो गया| दीक्षा पश्चात आचर्यश्री ११ वर्षों तक अपने गुरु का सानिध्य व मार्गदर्शन प्राप्त हुआ|उनके साथ विहार करते हुए अपने व्याकरण,न्याय,वास्तु,ज्योतिष,मंत्र विज्ञान,संस्कृत,प्राकृत भाषा तथा आगमों का ज्ञान अर्जन किया|

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आचार्यपदवी भीनमाल

पूज्य गुरुदेव के स्वर्गवास पश्चात आप उनके उतराधिकारी राष्ट्रसंत शिरोमणि आचार्य श्री हेमेन्द्रसुरिश्वर जी म.सा. की आज्ञा में रहे व उनके साथ या उनकी आज्ञानुसार विहार व चौतुर्मास किये एवं गच्छनायक को संघ संचालन में सहयोग प्रदान किया| सन १९९६ में पालीताणा के राजेंद्र भवन में आचार्यश्री ने आपको आयम्बिल की तपश्चार्य के साथ शास्त्रोतक्त योगोध्हन पूर्वक पन्यास पदवी से विभूषित किया|

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भीनमाल ने मुनि श्री नरेन्द्रविजयजी म.सा. को उपाध्याय पद प्रदान करते हुए आचार्यश्री

आपने संवत् २०४२ का चातुर्मास आचार्यश्री हेमेन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. के साथ जावरा में किया था तब आपने अपनी नियमित क्रियाओं को करते हुए ४२ उपवास की कठिन तपस्या की थी| पालीताणा चातुर्मास में आपने मासक्षमन भी किया | तपस्याए आपको प्रिय है व उपवास,बेले,टेली,आप अक्सर कर लेते है फिर भी आपका मुख्य रुझान ध्यान साधना की ओर रहा|प्राय: एकांत में रहकर महीनों ध्यान लगाना,एक-एक माह तक मौन रहकर साधना करना आदि ने आपको आत्मबल को उच्च स्तर तक पहुंचाया| यह साधना केवल आत्मा कल्याण के लिए ही नहीं, गच्छ तथा लोक कल्याण के लिए भी थी|

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७२ जिनालय प्रतिष्ठा

आचार्यदेवेश राष्ट्रसंत शिरोमणि श्रीमद्विजय हेमेन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. के देवलोकगमन के पश्चात् गच्छ के वरिष्ठ मुनि संयमवय स्थविर श्री सौभाग्यविजय जी म.सा. के निर्देशनुसार आप गच्छ व्यवस्था में संलझ हुए | त्रिस्तुतिक समाज के पवित्रतम तीर्थस्थल श्री मोहनखेड़ा तीर्थ को संचालित करने वाले श्री आदिनाथ राजेंद्र जैन श्वे, जैन पेढ़ी ट्रस्ट ने पुर्वोचार्य के निर्देशनुसार आपको अपना अध्यक्ष चुन लिया व उनके मार्गदर्शन में तीर्थ की व्यवस्था व विकास कार्य को निरंतर रखा| यह उल्लेखनीय है की गच्छ के आचार्य ही ट्रस्ट के अध्यक्ष होते है| फिर भी गच्छनायक का पद रिक्त था अत: श्री संघो ने आप से बार-बार गच्छ का नेतृत्व करने के लिए आचार्य पद लेने का निवेदन किया जिसकी परिणिति भीनमाल के पाटोत्सव के रूप में हुई|

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रतलाम में प्रतिष्ठा

भीनमाल में हजारो श्रावक-श्राविकाओं व कई श्रीसंघो की उपस्थिति में पंचहिनका मोहत्सव पूर्वक २९ अप्रैल २०१२ को आपको आचर्य पदवी प्रदान की गई तथा वे सौधर्मबृहतपागच्छीय परंपरा के ७४वे आचार्य तथा कलिकाल सर्वज्ञ आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय राजेंद्रसूरीश्वर्जी म.सा. के सप्तम पट्टधर बने |

चातुर्मास :

आचार्य पदवी के पश्चात् आपने २०१२ का चातुर्मास नेल्लर में, २०१३ में शोरापुर(कर्नाटक) तथा २०१४ में श्री मोहनखेड़ा तीर्थ में किया| सन २०१५ में आपने ध्यान व तपस्या की दृष्टी से गिरनार को अपना चातुर्मास स्थल चुना| वर्ष २०१६ का आपका चातुर्मास अहमदाबाद में होना निर्धारित था|

प्रतिष्ठाए :

आपने २२ जून २०१४ को नेल्लूर में नूतन चौमुखी जिनालय की अंजनशलाका का सह प्रतिष्ठा संपन्न की| मालवा क्षेत्र में आपके करकमलों से श्री रूचि प्रमोद पार्शवनाथ जिनालय रतलाम की प्रतिष्ठा ६ मई २०१४ को, श्री शंखेश्वर पार्शवनाथ राजेंद्र जैन मंदिर नीमच की प्रतिष्ठा  १५ मई २०१४ को तथा खाचरोड़ में श्री आदेश्वर जैन श्वे. भटेवरा मंदिर  की प्रतिष्ठा १ दिसम्बर २०१४ को संपन्न की | इस मध्य आचार्य श्री हेमेन्द्रसुरिश्वर्जी म.सा. की जन्मभूमि बागरा में आपके द्वारा श्री आदिनाथ हेमेन्द्रसुरि स्मृति मंदिर की प्रतिष्ठा दिनांक ५ जून २०१४ को की| आचार्यदेवेश ने आचार्यपदवी के पूर्व कोष्ठक काल में भीनमाल के विख्यात ७२ जिनालय की प्रतिष्ठा फ़रवरी २०११ को आपकी मुख्यता में संपन्न हुई थी, ६ जून को बड़ावदा(म.प्र.) को दादावाडी में जिनमंदिर की, २० फ़रवरी २०१२ को चौपाटी जावरा पर श्री शंखेश्वर पार्शवनाथ नूतन जिनालय की प्रतिष्ठा आपके कर कमलों में हुई| शत्रुंजय तीर्थ (पालीताणा) में आपने २७ फ़रवरी को गुरु राजेंद्र शताब्दी धाम की प्रतिष्ठा आपके द्वारा की गई थी|

दीक्षा व अन्य :

आचार्यश्री ने मोहनखेड़ा तीर्थ पर तीन मुमुक्षु बहनों को १० नवम्बर १४ को दीक्षा प्रदान की व उनको क्रमश: साध्वी की कीर्तिरत्नाश्री जी म.सा., श्री कुसुमरत्नाश्री म.सा. एवं साध्वी श्री कीर्तिवर्धनाश्री म.सा. नाम कारन किया |आचार्य पद पूर्व आपके कर कमलों से छ: दीक्षाए हुई|

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श्री मोहनखेड़ा में दीक्षादान

आचार्यश्री ने श्रीमोहनखेडा तीर्थ पर २०१४ के गुरुसप्तमी मोहत्सव को अपनी निश्रा प्रदान की| आपने ९-१० अप्रैल को त्रिस्तुतिक जैन समाज के ट्रस्ट के पदाधिकारियों को सम्मलेन आयोजित कर विचार विमर्श किया| आपने विहार के अन्तगर्त दक्षिण भारत,गुजरात,म.प्र. राजस्थान के अनेक ग्रामों नगरों में धर्म प्रभावना की|


* मोहनखेड़ा (म.प्र.)में श्री त्रिस्तुतिक जैन संघ के ‘गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद्विजय रविंद्रसूरीश्वरजी म.सा.”के अंतिम देवलोक यात्रा की पालकी के निम्न चढ़ावे हुए–:

1. *अंतिम स्नान* -4141111  -लाभार्थी- *बाबुलालजी मिश्रिमलजी वर्धन-परिवार,भीनमाल*

2. *अंतिम केश लोचन*-1616616, लाभार्थी- *श्री सियाणा जैन संघ,राज.*

3. *चन्दन विलेपन* – 33,00,000. लाभार्थी- *सुमेरमलजी लुंकड़ परिवार,भीनमाल*

4. *केशर विलेपन*-24,24,424-लाभार्थी- *संघवी परिवार,सुमेरपुर-विशाखापट्टनम*

5. *चोलपट्टा*-2121621-लाभार्थी- *आनंदभाई परमार,मुम्बई*

6. *अंतिम वाशक्षेप-पूजा*-13,13000-लाभार्थी- *पुखराजजी केसरीलालजी चौपड़ा,सिरोही*

7. *चादर ओढ़ाने का*-52,52000-लाभार्थी- *श्री बागरा-जैन-संघ(राज.)*

8. *डोली में आसन-बिछाने का*-17,01000-लाभार्थी- *रोमा-फाइनेंस,बागरा-काकीनाडा*

9. *गुरुदेव को डोली में बिठाने का*-19,19000- लाभार्थी- *फुटरमलजी रामाणी,गुड़ा-नेल्लोर*

10. *रज्जोहरण-वोहराने का*-27,00,000-लाभार्थी- *मोहनलालजी शंकरलालजी,बागरा(राज.)*

11. *मुँहपत्ती वोहराने का*-15,11000- लाभार्थी-*धुम्बडिया(राज.)*

12. *काम्बली-ओढ़ाने का*-30,30000.-लाभार्थी- *श्री। एस. एम. बाफना,भीनमाल*

13. *झोली वोहराने का*-15,15000.-लाभार्थी- *सुखराजजी कब्दीं, धानसा(राज)*

14. *पात्रा-वोहराने का*-23,23000-लाभार्थी- *भेरूलालजी पुखराजजी गड़िया,आहोर(राज.)*

15. *लड्डू वोहराने का*-15,15000-लाभार्थी- *जयन्तीलालजी मूलचंदजी बाफना,भीनमाल*

16. *पूंजी वोहराने का*-14,14000-लभार्थी- *वालचंदजी विजयराजजी,सियाणा(राज.)*

17. *नवकरवाली(माला)*-20,20000-लभार्थी- *श्री शांतिभाई गोयप*

18. *पालकी को पहला(आगे)-कन्धा*-68,00,000-लभार्थी- *श्री जयेशभाई,थराद-दुबई*

19. *पालकी को दूसरा- कन्धा(आगे)*-42,42000-लाभार्थी- *माणकचंदजी कोठारी,भीनमाल*

20. *पालकी को तीसरा-कन्धा(पीछे)*-27,27000- लाभार्थी- *संघवी-परिवार,सुमेरपुर*

21. *पालकी को चौथा-  कन्धा(पीछे)*-20,20000-लाभार्थी–   *कांतिलालजी पुखराजजी,तखतगढ़(राज.)*

22. *झालर -बजाना*-5,11000.-लाभार्थी- * श्री सियाणा जैन संघ*

23. *धुप-पूजा*-6,66000-लाभार्थी- *श्री आहोर जैन संघ*

24. *दीपक-पूजा*-5,11000-लाभार्थी- *श्री सियाणा जैन संघ*

25. *गुरुदेव का वर्षीदान का चढ़ावा*-55,10000-लाभार्थी- *घेवरचंदजी हंजारिमलजी,सियाणा(राज.)

26.-गुरुदेव को *अग्नि समर्पित* करने का *अंतिम-चढ़ावा -1.25.लाभार्थी- *श्री बाबूलालजी मिश्रीमलजी वर्धन-परिवार,भीनमाल*

मिच्छामि-दुक्कडम

Vyaktitv(Chief Patron)
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