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श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथजी

शंखेश्वर पार्श्वनाथ – शंखेश्वर

 

       भारतभर में  विधमान जिन-प्रतिमाओं में प्राय: सबसे अधीक प्राचीन श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है, जो करोड़ो देवताओं और मनुष्यों के द्वारा पूजी गयी है| जिसके दर्शन-वंदन-पूजन और भक्ति और हजारो-लाखो आत्माओं ने सम्यगदर्शन को प्राप्त किया है-प्राप्त सम्यगदर्शन को निर्मल बनाया है और अपने चरित्र के अंतरायो को तुडवाया है|

शंखेश्वर गाँव में सात फनों से अलंकृत श्वेतवर्णीय अत्यंत ही मनोहर यह प्रतिमाजी ७१” ऊँचे है| दर्शक के मन को प्रसन्नता से भर देनेवाले है|

अनेक पूर्वाचार्य महर्षियों ने अपने ग्रंथो के मंगलाचरण के रूप में श्री शंखेश्वर पार्श्वप्रभु को याद किया है|

अजोड महिमावंत इस प्रतिमा का इतिहास भी रोमांचित कर देनेवाले है|

जंबुद्वीप का यही भरत क्षेत्र !

गत उत्सापिर्नी काल में हुए नौवे तीर्थंकर परमात्मा दामोदर प्रभु का शासन |


 

एक बार अष्ट महा प्रातिहार्य और चौतीस अतिशयो से मुक्त दामोदर परमात्मा पृथ्वीतल को पावन करते हुए एक नगर में पधारे|

प्रभु के आगमन के साथ ही चारो निकाय के असंख्य देवताओं का आगमान हुआ…रत्न-सुवर्ण और राजमय गढ़ से मुक्त समवसरण की रचना हुई| प्रभु की दोशन सुनने के लिए हजारो नर-नारी और पशु-पंखी भी समवसरण में पधारे|

प्रभु के जगत के जीवों के उद्धार के लिए धर्म देशना दी| उस देशना को सुनकर हजारो आत्माओं में सम्यगज्ञान का प्रकाश पैदा हुआ…मिथ्यातत्व का अंधकार दूर हुआ|

उसी समय मानव-पर्षदा में रहे अषाटा श्रावक ने प्रभु को पूछा, “मुझे यह संसार अत्यंत ही भयंकर लग रहा है| हे प्रभो| मेरी आत्मा इस भाव बंधन से कब मुक्त बनेगी ?”\

असाढ़ी श्रावक के इस प्रश्न को सुनकर दामोदर परमात्मा ने कहा ” हे भाग्यशाली ! आगामी काहुबिसी के तेविस्वे पार्शवनाथ प्रभु के गंधार बनकर उसी भव में तुम मोक्ष में जाओगे |”

प्रभु के मुख से अपने भावी मोक्ष को जानकार असाढ़ी श्रावक का मन प्रसन्त्ता से भर आया| उसके अन्त्मर्ण में “पार्श्व प्रभु का नाम गूंजने लगा| उसने उसी दिन से पार्श्व प्रभु का नाम स्मरण द्वारा प्रभु की नाम-भक्ति चालु की…उसके बाद उसने पार्श्व प्रभु की प्रतिमा भरवाई और वह उसकी नियमित पूजा-भक्ति करने लगा|

उसके जीवन पर्यंत पार्श्वप्रभु की खूब भक्ति की| आसाढ़ी श्रावक मस्कर सौधर्म देवलोक में पैदा हुआ| ओने अवधिज्ञान द्वारा पूर्व भव में निर्मित पर्श्वप्रभु की प्रतिमा को देखा| वह देव उस प्रतिमा को देवलोक में ले गया| उस देवलोक में भी असंख्य वर्षो तक उस प्रतिमा की खूब पूजा भक्ति व् अर्चना की|

सौधर्म इंद्रने भी दीर्घकाल तक उसकी पूजा की … फिर सौधर्म इंद्र ने वह प्रतिमा ज्योतिष देवलोक के सूर्यदेव को प्रदान की| उसने भी दीर्घकाल तक उसकी पूजा भक्ति की| उसके बाद चन्द्र ने विमान में, फिर सौधर्म इर्शान व प्राणत देवलोक में दीर्घकाल तक पूजी गई| उसके बाद लावन समुद्र के अधिष्ठायाक वरुणदेव नागकुमार तथा भवनपति देवों ने पूजा भक्ति की|

एक बार , सेनपल्ली गाँव के पास कृष्ण वासुदेव और जरासंघ का भयंकर युद्ध हुआ| जरासंघ के पक्ष में अन्य सभी राजा थे जब की कृष्ण के पक्ष में ५६ कोटि यादव थे|

इस युद्ध में कृष्ण सैन्य के पराक्रम को देख जरासंघ ने कृष्ण के सैन्य पर जरा विधा का प्रयोग किया| उस विधा के प्रयोग से कृष्ण का सैन्य व्याधि व् जरावस्था से पीड़ित होकर मुर्छित सा हो गया|

मात्र कृष्ण बलदेव व नेमिकुमार पर इस विधा का प्रभाव नहीं पड़ा|

अपने सैन्य की इस दुर्दशा को देखकर निराश हुए कृष्ण ने नेमिकुमार को जरा विधा की युक्ति का उपाय पुछा|

नेमिकुमार ने कहा “नागराज धर्नेन्द्र के पास रही प्रतिमा के न्ह्वनजल से तुम्हारे सैन्य की मुर्चा दूर हो जाएगी |”

श्री कृष्ण ने अट्टम तप किया| सैन्य के रक्षण की जवाबदारी नेमीकुमार ने ली|

अट्टम के प्रभाव से धर्नेंद्र ने पार्श्वप्रभु की प्रतिमा कृष्ण को प्रदान की| श्री कृष्ण खुश हो गए| पार्श्वप्रभु के न्ह्वनजल के छटकाव से कृष्ण का सैन्य पुन: जागृत हो गया| जरासंघ और कृष्ण के बीच पुन: युद्ध हुआ| उस युद्ध में कृष्ण की जय हुई|

युद्ध में विजय की प्राप्ति के प्रतिक रूप कृष्ण ने शंख बजाया| वहां पर शंखपुर नगर बसाया गया| उस गाँव में प्रभुजी का भव्य जिनालय तैयार कर उसमे प्रभुजी को बिराजमान किया गया|

उस गाँव के नाम से वे प्रभुजी शंखेश्वर पार्श्वनाथ के नाम से प्रख्यात हुए| लगभग ८६,५०० वर्ष से यह प्रतिमा यहाँ पूजी जा रही है|

१२वि.सदी में सिद्धराज के मंत्री सज्जन सेठ ने पू.आ. श्री देवचन्द्रसूरीजी म.सा. के उपदेश से इस तीर्थ का जिणोरद्वार कर नया मंदिर बनवाकर वि.सं. ११५५ में शंखेश्वर पार्श्व प्रभु की प्रतिष्ठा कराई |

अनुमान है की वि.सं. १७६० में पुन: इस मंदिर का जिणोरद्वार हुआ और विजयप्रभसूरीजी के वरद हस्ते से प्रतिष्ठा की गई|

वि.सं. १९६७ माघ शुक्ल पंचमी के दिन पांच प्रतिमाओं को छोड़ अन्य सभी देरियों की प्रतिष्ठा की गई| यहाँ पर लगे शिला लेखो में सबसे प्राचीन वि.सं. १११४ का व नविन लेख वि.सं. १९१६ का श्री शंखेश्वर पार्श्वप्रभु की प्रतिमा अत्यंत ही चमत्कारी व प्रभावशाली है |

चमत्कारी घटनाएँ :

वि.सं. १७५० में उपध्याय श्री उदयरत्नजी म. खेडा(गुज.) से संघ सहित शंखेश्वर पधारे| उस समय यह मंदिर नहीं था| शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा किसी ठोकर में कब्जे में थी| वह ठाकुर एक गिन्नी लेकर प्रभु के दर्शन करने देता था|

देरी हो जाने से पुजारी ने द्वार बाद कर दिया था| पू. उदयरत्नजी म. ने प्रतिज्ञा की, “जब तक प्रभु के दर्शन नहीं होंगे, तब तक अन्न जल नहीं लूँगा| संघ ने भी वैसे ही किया|

सच्चे ह्रदय से की गई इस प्रार्थना के फल स्वरुप अधिष्ठायाक देव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसी समय द्वार खोल दिए| संघ ने प्रभु के दर्शन किए|

वि.सं. १९९६ में चाणस्मा गाँव में आचार्य श्री मतिसागरसूरीजी का चातुर्मास था| उनका उपदेश सुनने के लिए जैन-अजैन सभी लोग आते थे| एक बार उन्होंने प्रवचन में शंखेश्वर प्रभु की महिमा का वर्णन किया| उस वर्णन को सुन वहां के जमीदार के मन में शंखेश्वर प्रभु की श्रद्धा दृढ़ हो गयी| एक बार उसके घर कोई मेहमान आए, जो आँख के मोतिया-बिंदु से परेशान थे| जमीदार ने उन्हें शंखेश्वर चलने के लिए प्रेरणा दी| वे दोनों शंखेश्वर पहुच गए| भाव पूर्वक प्रभु के दर्शन कर उन्होंने प्रभु का न्ह्वन जल अपनी आँखों पर लगाया और आश्चर्य हुआ-आंगतुक मेहमान का मोतिया बिंदु उतार गया….उन्हें स्पष्ट दिखाई देने लगे|

ऐसी एक नहीं , सैकड़ो चमत्कारी घटनाए आए दिन बनती रहती है| प्रभु की महिमा अपरम्पार है| बस, अटूट श्रद्धा और विश्वास चाहिए|

 

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