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श्री सोमप्रभसूरीश्वर्जी म.सा.

 

श्री सोमप्रभसूरीश्वर्जी म.सा.

 

जन्म १३१०, दीक्षा १३२१, आचार्यपद – १३३२, ज्ञान के तीव्र क्षयोपशम होने से शीघ्र ११ अंग कंठस्थ किये| इनके गुरु इनको मंत्र विज्ञान की पोथी देना चाहते थे, परन्तु इन्होनें कहा “आपके द्वारा मिला हुआ श्रुतज्ञान ही सबसे बड़ा मंत्र है, अत: मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है| अन्य योग्य साधु के अभाव में पोथी को जलशरण की| वि.सं. १३५२ में अन्य आचार्यो के साथ ये भी चातुर्मासार्थ भीलडीयाजी में विराजित थे, तब अपने ज्योतिषज्ञान से दुसरे कार्तिक मॉस में होने वाले नगरदाह को जाना|

अन्य आचार्यो की असम्मति होते हुए भी इन्होनें प्रथम कार्तिक मॉस की पूनम को विहार किया| इनके साथ विहार करके जाने वाले मुई भगवंत एवं श्रावकवर्ग जहां रुके, वह स्थान राधन\पुर नाम से प्रसिद्ध हुआ| भीलडीया में दुसरे कार्तिक में अग्री के उपद्रव से सबकुछ जलकर राख हो गया| शत्रुंजय तीर्थ के १५ वे उद्धार के समय ये शिष्य परिवार सहित वहां मौजूद थे| वि.सं. १३७३ में खंभात नगर में इनका देवलोक गमन हुआ|

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