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Shree Sonana Khetlaji Tirth

श्री सोनाणा खेतलाजी तीर्थ (क्षेत्रपालजी)

                  राजस्थान प्रांत के पाली जिले में देसुरी गाँव के पास “श्री सोनाणा खेत्लाजी” का प्रसिद्ध मंदिर है| राजस्थान में भैरूजी के दो रूप बताए गए है, जो काला व् गोरा भैरूजी कहलाते है| चामुंडा माताजी को इनकी माताजी मन जाता है| गोरा भैरूजी को क्षेत्र्पाल्जी भी कहा जाता है| खेत्र को खेत्र भी कहते है| अत: इन्हें खेत्रपाल भी कहा जाता है| यह शब्द अपभ्रंश से खेत्लाजी हो गया| यह गाँव (क्षेत्र) और कुल के रक्षक देवता के रूप में प्रसिद्ध है|

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अरावली की पर्वत श्रुंकला में छोटी-छोटी २ पाहाडियां है| देसुरी, बाली, सुमेरपुर व रानी तहसील गोडवाड क्षेत्र कहलाता है| सोनाणा खेत्लाजी का मंदिर पहाड़ी की पूर्व दिशा में है| पश्चिम व् दक्षिण की तरफ सफ़ेद संगमर्मर की खान है, जिससे रणकपुर और कई पुराने मंदिर गोडवाड में निर्मित है| इस पहाड़ी खान के नाम से जाना जाता है| रणकपुर मंदिर १५ वि शताब्दी का बना हुआ है|

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संवत् १००० के आसपास नाडोल पर चौहानों का राज था| अल्हन व् कल्हन दो भाई थे| नाडोल अधिपति ने अपने छोटे भाई को नडूलाई(नारलाई), देव्सुरी(देसुरी), मोरखरा(मोरखा), काणासुत(काणा), सुमेल(सुमेर) सोनाणा सहित बारह गाँव जागीर में दिए| छोटे भाई ने फिर जालोर पर चढ़ाई की व सिवाना को विजय किया| जालोर की पाहाडी का नाम सोनगढ़ दिया गया| वहां से सोनीगरा चौहान कहलाए और नाडोल वाले नाडोल चौहान कहलाए| छोटे भाई ने चितौड़ भी विजय किया| फिर अपने को चितौड़ अधिपति के साथ भी किया| चितौड़ अधिपति राणा ने वापस चितौड़ पर कब्ज़ा कर लिया (जिसकी एक कथा प्रचलित है) और गोडवाड़ भी मेवाड़ के अधीन हो गया| सोनाणा नष्ट हो गया| प्रकृति प्रकोप नदी व बाढ़ से भी हो सकता है| भूकंप से भी हो सकता है| फिर सोनाणा को तीन भागों में विभाजित कर दिया गया- शौभावास, सारंगवास और सोनाणा|

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सोनाणा के क्षेत्रपाल का मंदिर सारंगवास में ही रहा| यह संवत् १४०० और १५०० के बीच की बात है| १६ वि शताब्दी की बात है, पुन: गोडवाड़, मेवाड़ से गोडवाड़ में चला गया| यह खान में सुरंग देनेवाले खान के पास ही रहते थे, इसलिए इसका नाम सारंगवास रख दिया गया| कुछ लोगो की धारणा के अनुसार, सर्प  के रूप में भी पूजा होती है| इसलिए सारंगवास का नाम दिया गया “सारंग” जो मोर और सर्प को भी कहते है| उसका नामकरण शौभावास हो गे| भारमल नदी, जो शौभावास पहाड़ी के पीछे है और जिसे उडी नदी कहते है, में ज्यादा पानी अर्तार्थ बाढ़ आ जाने से उसने अपना बहाव बदल दिया और सारंगवास एवं शौभावास के बीच में आज भी विधमान है| सोनाणा नष्ट होने के कारण यह भी हो सकता है| सोनाणा की पुरानी पहाड़ी के नीचे खुदाई में जैन मूर्तियों के अवशेष भी मिले, जिन्हें आना जैन मंदिर में रखा बताया गया है|

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अपना गाँव पंद्रहवी शताब्दी तक सोलंकियो के वंशज के पास अधीन रहा| १८वि सदी के अंत में सरदार सनन्द बाँध बनना शुरू हुआ तब भिथंडा महंतजी की जमीन बांध के लिए आने से उसके एवज में मारवाड़ नरेश ने उन्हें आना गाँव दिया|अर्थात सोनाणा गाँव जो बहुत बड़ा था, उसमे चार गाँव-सोनाणा, सारंगवास, शौभावास और आना कर दिया गए| परन्तु क्षेत्रपालजी मंदिर के लिए चारो गांवो का सामान अधिकार रहा एवं चारों गाँवों की सरहद की क्षेत्रपालजी की सरहद के रूप में मान्यता रही और सभी उन्हें पूजते रहे| ग्राम पंचायत के रूप में भी यह चार गाँव की पंचायत रही, जिसकी देखरेख में मंदिर के संपूर्ण कार्य की व्यवस्था rही| सन १९७८ में ट्रस्ट की स्थापना की गई, जिसका पूरा कार्य मंदिर के विकास को देखने का रहा और वे देखते आ रहे है|ज्यो-ज्यो कार्य बढ़ता गया त्यों-त्यों इन्ही कार्यक्रताओ की सलाह पर बाहर के समाजसेवियों को शामिल करते हुए विस्तार किया गया, जो आज सशक्त रूप में कार्य कर रहे है| जोधपुर से ट्रस्ट का रजीस्ट्रशन हो गे है| ऐसी मान्यता है की खेतलाजी की सरहद में जो कुआंरी कन्या आती है उसे विवाह उपसन्न (उपलक्ष) वर-वधु जुहार(जान) देना पड़ता है| पुत्र रत्न प्राप्ति हेतु भी मनौती करते है औए श्रद्धा रखने पर पुत्र रत्ना प्राप्ति के बाद जात और बच्चे को जडोले देने पड़ते है|

सन १९८२ से चैत्र सुदी १ को ट्रस्ट के निर्णयनुसार, महान भक्तराज शान्तिलालजी एवं शिवराजजी ने खेतलाजी महाराज के हुकुम से, हर वर्ष मेले का आयोजन करने का निश्चय किया, जो दिनोदिन विशाल रूप धारण करता जा रहा है|

तीर्थ का विकास इतनी तेज गति से होता आ रहा है की उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती| इसका सारा श्री भक्तराज शांतिलालजी एवं ट्रस्ट को जाता है| खेतलबाबा के चमत्कार से आज तक यहाँ इतने बड़े जनसमुदाय (सभी धर्म वर्ग के) के आते रहने के बावजूद एक ही परिवार जैसा माहौल बना रहता है|

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इसी क्रम में निर्माण एवं यात्रियों की व्यवस्था का कार्य सुचारू रूप से चला आ रहा है| ऐसा भी माना जाता है की ब्रह्मानजी ने भैरूजी को सराफ रुपी वरदान दिया था, जिससे घर-घर स्थापना की जाती है और जुहार(जात) मांग कर लेते है| ऐसा भी माना जाता है की मृत्युलोक में राक्षसों का नाश करके मानव की सृष्टि में भैरूजी का पूर्ण सहयोग रहा है| एक हजार नाम है| क्षेत्र और कूल की रक्षा करने वाले कुलदेव भैरूजी है, जो अपनी माता चामुंडाजी कुलदेवीजी के साथ में कुल में विराजमान रहते है| भैरूजी,खेतलाजी,क्षेत्रपालजी व् खेतलपालजी सभी एक ही माया है|

काशी से जब क्षेत्रपाल आए तब सबसे पहले मंडोर में विराजमान हुए, जो आज बड़ी गाडी मानी जाती है| फिर सोनाणाजी के पास तारीकी पहाड़ की गुफाओं में पधारे, वहा के थाजुर को चमत्कार दिखाने पर वे दरिया पुरोहितजी के आग्रह पर सोनाणा पधारे और पहाड़ी की गुफा में धुनी जगाई| मगर मेवाड़ का राज्य मारवाड़ में चले जाने के कारण चारणों के हस्तक आ गया और चारणों-पुरोहितो के आपसी झगड़े के कारण विनंती पर खेतलाजी सारंगवास की पाहाडी गुफा में आकर माँ के पास विराजमान हुए| जो आज महँ चमत्कारी कुलदेवता के रूप में पूजे जाते है|


 

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