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श्री विजयदेवसूरीजी म.सा.

 

श्री विजयदेवसूरीजी म.सा.

 

आपका जन्म सं. १६३४ पोष सूद १३ सेठ स्थिरपाल की पत्नी रुपाइ की कुक्षी से हुआ| आप सं. १६४३ महा सूद १० को अहेमदाबाद में दीक्षित हुए एवं शीघ्र ही शास्त्र के पारगामी बने| अधिष्ठायक देव के संकेत द्वारा योग्य जानकर विजयसेनसूरीजी द्वारा सं. १६४६ वैशाख सुद ४ को आचार्य पद से अलंकृत किया| बादशाह जहांगीर द्वारा आपको “जहांगिरी महातपा” का बिरूद मिला|

सं. १६८७ में सूरत में नवाब माजर की सभा में शास्त्रार्थ विषयक आपने जीत हासिल की| आपकी अन्य गच्छ के साधुओं पर समवृति की वजह से खरतरगच्छीय वल्लभ पाठक ने “विजयदेव महात्मय” काव्यग्रंथ रचा| राजा जगतसिंह को प्रतिबोध कर मेवाड़ में गोवध बंद कराया, चतुर्दशी को अमारि प्रव्ताई | आपने ५ करोड़ श्लोक प्रमाण का स्वाध्याय किया| नित्य ५ विगई के त्यागी थे| ११ द्रव्य से ज्यादा नहीं लेते थे| विजयप्रभसूरीजी के पास अंतिम निर्यामणा कर आगमों का पाठ श्रवण करते हुए सं. १७१३ आषाढ़ सूद ११ को स्वर्गवासी हुए|

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