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Sumer

सुमेर

(सोमेश्वर, शांतिनगर)

पाली-उदयपुर मेगा हाईवे पर देसुरी से जोजावर रोड पर ७कि.मी. दूर पूर्वोतर कोने में मरुधर की अरावली पर्वतमालाओ की हरी-भरी सुरम्य पहाड़ियों की गोद में स्थित “सुमेर” के सौधशिखरी जिनालय में १२०० वर्ष प्राचीन १६वे तीर्थंकर प्रभु ” श्री शांतिनाथ भगवान” की प्राचीन व चमत्कारिक एक साथ ऊँची (२१ इंची) श्वेत वर्ण की आकर्षक प्रतिमा विराजमान है| इस मंदिर को कब और किसने बनाया, इसके पक्के प्रमाण तो नहीं मिलते , परन्तु यहाँ लगे एक शिलालेख से ज्ञात होता है की इसका निर्माण सं. १२३४ में. फा.सु. २ को हुआ होगा|यही यहां की प्राचीनता का प्रामन है| इस शिखरबंध मंदिर का अंतिम जिनोर्द्वर सं. २००६ में हुआ, तब से यह तीर्थ पुन: जाहोजलाली पर है|

वि.सं. २००६ के पहले इस मंदिर के जिणोरद्वार व प्रतिष्ठा के आयोजन का कोई विस्तृत या संपक्षित विवरण भी प्राप्त नहीं हो रहा है|मूर्तियां इतनी प्राचीन है की उन पर लिखे हुए लेख पढ़ने लायक नहीं है| प्राचीन सोमेश्वर-तीर्थ वर्तमान का सुमेर तीर्थ है|कहते है कभी था, लेकिन लुटेरों के आतंक से तंग आकर, लोग अन्य गांवों में जा बसे| प्राचीन सुमेर उजड़ गया| इसके खंडहर आज भी खुदाई में मिलते है| मगर जब-जब आक्रान्ताओं ने सुमेर के जैन मंदिर को लुटा तथा उसे तोडा तब-तब इस क्षेत्र के श्रावकों ने इसका जिणोरद्वार करवाया, जिससे यह तीर्थ आज भी विधमान है| जैनों में “नाहर” गोत्र का उद्गम स्थान सुमेर ही है, जो आज सभी क्षेत्रों में बसे हुए है|इस तीर्थ के निर्माता भी एक “नाहर गोत्रीय ओसवाल” थे, जो इसी नगर के रहने वाले थे| १२०० वर्ष प्राचीन सुमेर नगरी प्राचीन काल में १२ कोस यानी ४० की.मी. तक फैली हुई थी| कहते है की सोमेश्वर तक उसका मुख्य द्वार था तथा बुसी के हनुमानजी भी सुमेर नगरी अंतगर्त आते थे| मगर आज यहाँ एक भी जैन घर नहीं है, तथापि भारतवर्ष का अदितीय चक्रवती जैन मंदिर है, जिसमें शांतिनाथ, कुन्थुअंत व अरनाथ प्रभु की मनभावन प्रतिमाएं विराजमान है|

करीब ९० वर्ष पूर्व यहां के अधिष्ठायकदेव ने इस तीर्थ का जिणोरद्वार कराने के लिए श्री पृथ्वीराजजी नवलखा को स्वप्न में प्रेरित का सं. २००६ में जेठ वद ६ को आचार्य श्री जिनेन्द्रसूरीजी की निश्रा में जिनोरद्वार व प्रतिष्ठा करवाई| हरी-भरी पहाड़ियों और घनघोर जंगल के बीच अकेला यह तीर्थ अपने चारों ओर की प्राकृतिक छठा के लिए प्रसिद्ध है| प्रभु के नाम के अनुरूप यहाँ आराधना में अपूर्व शांति मिलती है| प्रभु प्रतिमा में अलौकिक आकर्षण है, जिससे यहां बार-बार आने को मन करता है| जंगल में मंगल के समान तीर्थ अदितीय है| यहां के जागृत व स्वयंभू नागेन्द्रचक्र-अधिष्ठायकदेव तथा मणिभद्रदेव अति चमत्कारी है|समय-समय पर दर्शन देकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते है|एकांत में होने के कारण यहाँ ज्यादा भीड़ नहिओ होती| जेठ वद ६ को प्रतिवर्ष भव्य मेला होता है| श्रीमान् तेजराजजी पन्नालालजी हिराचंदजी नाहर परिवार द्वारा ध्वजा चढ़ाई जाती है| श्री देसुरी ओसवाल जैन संघ यहाँ की व्यवस्था देखते है|

गुरू मंदिर : मुख्य मंदिर के पास बगीची में शिखरबंध श्वेत पाषण से निर्मित गुरु मंदिर में आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी की प्रतिमा स्थापित है| जिसकी प्रतिष्ठा वि.सं. २०३९ के जेठ वद ५, रविवार को आ. श्री पद्मसूरीजी की निश्रा में संपन्न हुई थी|

मंदिर के पास सड़क की बायीं तरफ विशाल चबूतरे पर मोर,कबूतर, तोते आदि पक्षी भारी संख्या में दाना चुगने के लिए आते है|पेढ़ी की ओर से पक्षियों के लिए दाना व कुत्तों के लिए रोटी की व्यवस्था की जाती है|

सुमेर नाल व बावड़ी : यह नाल देसुरी से उत्तर की ओर बहुत लंबी व भयानक है| सुमेर नाल की प्राकृतिक रचना भी दुष्कर है|दोनों ओर प्रारंभ में घाटियों के बीच से मार्ग बनकर आगे कुछ दुरी तक समतल जंगल है, फिर दो पाहाड़ी मार्ग जाते आते है| पहाड़ी मार्ग को न जानने वाले आगे बीहड़ मार्ग में भटककर फंस जाते है| ठाकुर गोपीनाथ, सोलंकी विक्रम ने इसी नाल में अकबर की सेना को भगाया था|सेनापति तहवर खां जान बचाकर एक ब्रह्माण का वेश धारणकर भाग निकला था| आज भी इस सुमेर की नाल के जाते, दाहिने तरफ चबूतरे स्थान बने हुए नजर आते है| एक कुंड भी है व कालिया महादेव का मंदिर (मठ) भी है, जो शताब्दी वर्ष पूर्व का है| कुंड अति प्राचीन है| पर्यावरण की दृष्टी एवं प्राकृतिक रूप में यह स्थान देखते ही बनता है|यहां की प्रसिद्ध बावड़ी अति प्राचीन है| सुमेर से जोजावर मार्ग पर २ की.मी. दूर, दाई तरफ विशाल गेट से अंदर जाने पर झुब्बी बाबा की प्रसिद्ध दरगाह है| हिन्दू-मुस्लिम सभी यहाँ माथा टेकने आते है|

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